Pagglait Review: 13 दिन में 13 तरह के इमोशन, काफी कुछ बताती है 'संध्या' की ये कहानी

पति की मौत के बाद संध्या ना दुखी है ना परेशान. अब या तो वो सदमें में है या पागल हो चुकी है. इसका जवाब ढूंढने के लिए आपको सान्या मल्होत्रा की फिल्म पगलैट देखनी होगी. लेकिन फिल्म देखने से पहले हमारा रिव्यू जरूर पढ़ लीजिए.

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सान्या मल्होत्रा (पगलैट) सान्या मल्होत्रा (पगलैट)

प्रिया शांडिल्य

  • नई द‍िल्ली ,
  • 27 मार्च 2021,
  • अपडेटेड 9:15 AM IST
फिल्म:Pagglait
2.5/5
  • कलाकार : सान्या मल्होत्रा, शयानी गुप्ता, रघुबीर यादव, आशुतोष राणा, शीबा चड्ढा, राजेश तैलंग
  • निर्देशक :उमेश ब‍िष्ट

पति की मौत पर भला रोना क‍िसे नहीं आता. हमसफर के बिछड़ने का गम पत्नी कैसे सह सकती है. पर पगलैट वो कहानी है जिसमें पति के निधन के बाद पत्नी की आंखों से ना एक कतरा आंसू का निकलता है और ना उसके जाने का गम उनके चेहरे पर कोई श‍िकन ही ला पाता है. अब या तो वो सदमें में है या पागल हो चुकी है. इन सब का जवाब ढूंढने के लिए आपको सान्या मल्होत्रा की पगलैट देखनी होगी. और हां, सान्या के पति कौन है इसका जवाब ना ही ढूंढे तो बेहतर होगा. 

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कहानी
 
अभी संध्या (सान्या मल्होत्रा) की शादी को पांच ही महीने बीते थे. इन पांच महीनों में वो अप‍ने पति आस्त‍िक गिरी को ठीक से जान भी नहीं पाई थी कि आस्त‍िक की मौत हो जाती है. शोकग्रस्त पर‍िवार में घर के रिश्तेदारों का आना शुरू होता है. सभी संवेदना जता रहे हैं लेक‍िन वहीं संध्या इन सबसे बिना प्रभाव‍ित‍ अपने कमरे में फेसबुक कमेंट्स पढ़ रही है. उसे तो यह भी पता है 'RIP' के 235 कमेंट्स आए हैं. उसे इस शोकाकुल माहौल में पेप्सी और मसालेदार चिप्स खाने की तलब होती है. संध्या की सास, मां, बाकी रिश्तेदार सभी को यही लगता है कि संध्या सदमे में है. इन्हीं में एक रिश्तेदार हैं रोशन सेठी (रघुवीर यादव) जो बात-बात में यही कहते सुने जाते हैं 'हम ओपन माइंडेड हैं, अब पुरानी सोच नहीं रखते'. मगर जब संध्या की दोस्त नाज‍िया जैदी (श्रुति शर्मा) उससे मिलने आती है तब उनका चेहरा देखने लायक होता है.

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संध्या को घर में क‍िसका कैसा मूड है इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, उसे तो नकली दुख भी जताना नहीं आता. पर धक्का उसे तब लगता है जब आस्त‍िक के ऑफ‍िस फाइल्स के बीच से उसे आस्त‍िक की गर्लफ्रेंड आकांक्षा (सयानी गुप्ता) की तस्वीर मिलती है. आस्त‍िक की जिंदगी के इस पहलु को जानने के लिए संध्या, आकांक्षा से मिलती है और उन जगहों पर जाती है जहां आस्त‍िक उसके साथ जाता था. आकांक्षा से मुलाकातों के बाद उसे समझ आता है कि आस्तिक धोखेबाज नहीं था. ऐसे में संध्या घर जाती है और रो पड़ती है. 

इधर आकांक्षा के मन का यह पन्ना तो पानी की तरह साफ हो चुका था, पर अभी उसकी खुश‍ियों के अन्य पहलुओं के पन्ने खुलने बाकी थे. एक दिन इंश्योरेंस वाले आते हैं और बताते हैं कि संध्या के नाम आस्त‍िक ने 50 लाख रुपये की पॉल‍िसी ले रखी थी. अब रिश्तेदार आस्त‍िक के मम्मी-पापा के कान भरने लगते हैं. उन्हें लगता है कि आस्त‍िक ने अपनी पत्नी के नाम ये कैसे लिख दिया. लोन पर लिए घर का कर्ज कैसे चुकाया जाएगा. दूसरी ओर आस्त‍िक के चाचा तरुण (राजेश तैलंग) बेटे आद‍ित्य (नकुल रोशन सहदेव) के लिए होटल खोलना चाहते हैं जिसके लिए उन्होंने अपने बड़े भाई शिबू उर्फ शिवेंद्र गिरी (आशुतोष राणा) से पहले भी बात की थी, अब संध्या के नाम 50 लाख रुपये देखकर वे चाहते हैं कि उनका बेटा आद‍ित्य, संध्या से शादी कर ले. 

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सभी को लगता है कि आद‍ित्य से शादी के लिए हां कहकर संध्या बस अपने बारे में सोच रही है. संध्या जो कि पढ़ी-लिखी मह‍िला है, अपने बारे में कोई फैसला लेना उसके हक की बात नहीं है. सोच‍िए जो लोग खुद को ओपन-माइंडेड समझते हैं, वो बहू हो या बेटी के इन फैसलों को भी अपना हक समझ रहे हैं, जहां सिर्फ और सिर्फ उनका अध‍िकार है. आस्त‍िक की 13वीं आती है, और फिर संध्या पूरा पासा पलट कर रख देती है. उसे समझ आता है कि अगर वो अपनी जिंदगी के फैसले नहीं लेगी तो कोई और ले लेगा.  

अभ‍िनय में बड़े तो बड़े इस बाल कलाकर का भी जवाब नहीं 

फिल्म में सान्या मल्होत्रा ने संध्या का किरदार शानदार निभाया है. वह दुखी नहीं है, ना ही उससे मगरमच्छ के आंसू निकाले जाएंगे. जहां गुस्सा आना चाह‍िए, वहां चेहरे का रंग साफ बता देता है. जहां खुश है उसकी हंसी यह बता देती है. सान्या ने संध्या के हर भाव को अच्छे से पेश किया है. आशुतोष राणा, शीबा चड्ढा और सयानी गुप्ता ने भी अच्छी परफॉर्मेंस दी है, पर शायद हमने आशुतोष के और बेहतरीन अभ‍िनय का लुत्फ उठाया है. रघुबीर यादव तो कमाल के निकले, क‍िरदारों को रियल कैसे दिखाना है, ये कला उनकी कोई नहीं छीन सकता. हर सीन में रघुबीर की एक्ट‍िंग लाजवाब है. राजेश तैलंग भी रघुबीर की तरह ही बड़े रियलिस्ट‍िक लगे. फिल्म में परचून की भूमिका में आस‍िफ अली का काम भी शानदार रहा. इन सबके बीच एक ऐसा चाइल्ड आर्ट‍िस्ट भी थे जिनकी एक्ट‍िंग नजर चुरा ही लेती है. बाला फिल्म में आयुष्मान खुराना के बचपन का क‍िरदार निभाने वाले सच‍िन चौधरी ने पगलैट में भी काब‍िले-तारीफ काम किया है. थोड़ा ही सही पर नौंवी कक्षा के रोमांट‍िक लड़के के रोल में सच‍िन खूब जंचे. डायलॉग डिलीवरी से लेकर अदाओं की पेशगी भी सच‍िन खूब जानते हैं. 

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बैकग्राउंड स्कोर और म्यूजिक

फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर बेहतरीन है. नीलेश मिश्रा और अर‍िजीत सिंह ने फिल्म के गानों के लिर‍िक्स लिखे हैं, जो कि कहानी के साथ तालमेल बिठाने में कामयाब दिखे. कहीं पति के साथ अजनबी का एहसास तो कहीं अपने सपनों को उड़ान देने की खुशी, फिल्म के म्यूजिक में ये सभी भावनाएं कूट-कूटकर भरी नजर आईं. 

कहां रही कमी 

फिल्म वैसे तो बढ़‍िया है. पर यहां जिस तरह से कई मुद्दों को दिखाने की कोश‍िश की गई है, वह काफी उलझ-सी गई है. एक जगह धर्म की, खुले विचारों की, दूसरी शादी की, मह‍िला के निजी फैसलों की, उसकी खुश‍ियों की, सब कुछ थोड़ी-थोड़ी मात्रा में परोसने की अच्छी कोश‍िश दिखी. संध्या आख‍िर आस्त‍िक के पुराने रिश्ते से परेशान है या वह अपने लिए जीना चाहती है, यह कहानी के अंत तक उलझा रहा. कहानी में सबसे लंबा पार्ट आस्त‍िक के पुराने रिश्ते वाला सीन ही रहा जो कि जरूरी नहीं लगा. 

ओवरऑल 

कुल मिलाकर कहा जाए तो फिल्म में मह‍िला और उसकी इच्छाओं को अहमियत देने और उसकी आजादी पर फोकस करने में कहानी ठीक-ठाक रही. निर्देशक उमेश बिष्ट ने लखनऊ के बैकग्राउंड में बनी इस कहानी को सहज तरीके से पेश किया है. कहानी के साथ-साथ कलाकारों ने भी इनमें जान भरने में कोई कसर नहीं छोड़ी. कहानी के अलावा फिल्म के डायलॉग्स को भी क्रेड‍िट देना होगा. क्योंकि कई जगह सिर्फ रघुबीर यादव के डायलॉग्स ने ही कहानी के मूल विषय को पूरा दम दिया है. तो 13 दिनों के इस सफर में फिल्म ने 13 तरह के इमोशंस बखूबी दिखाए.

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