डेविड धवन के डायरेक्शन में बनी 'है जवानी तो इश्क होना है' एक रोमांटिक कॉमेडी फिल्म है, जिसमें वरुण धवन, मृणाल ठाकुर और पूजा हेगड़े लीड रोल्स में हैं. फिल्म 5 जून से सिनेमाघरों में लग चुकी है, और हमने भी आपकी खातिर इसे देख डाला है. तो चलिए बताते हैं हमारे इस रिव्यू में कि ये फिल्म आपकी उम्मीदों पर खरी उतरने की कितनी हिम्मत रखती है.
फिल्म की कहानी
कहानी जैज (वरुण धवन), उसकी पत्नी बानी (मृणाल ठाकुर) और उसकी नई मोहब्बत प्रीत (पूजा हेगड़े) के इर्द-गिर्द घूमती है. जैज और बानी तलाक की प्रोसेस में हैं. वजह है दोनों की अलग-अलग प्रायोरिटीज- जहां जैज को बेबी चाहिए, क्योंकि उसपर परिवार का प्रेशर है, वहीं बानी अपने करियर पर फोकस करना चाहती है. कोर्ट उन्हें 6 महीने का समय देता है. इसी दौरान जैज की जिंदगी में प्रीत की एंट्री होती है और मामला तब और उलझ जाता है जब दोनों खुद को प्रेग्नेंट बताती हैं. इसके बाद शुरू होता है झूठ, गलतफहमियों और छुपाने-दिखाने का लंबा सिलसिला.
कॉमेडी या कन्फ्यूजन?
फिल्म का जॉनर भले ही कॉमेडी हो, लेकिन हंसी के मौके काफी कम नजर आते हैं. कई जगहों पर कॉमेडी पुराने फॉर्मूलों पर बेस्ड लगती है. जोक्स और सिचुएशन इतनी घिसी पिटी हैं जो आज के दौर में खास असर नहीं छोड़तीं. फिल्म लगातार तेज रफ्तार से भागती रहती है, लेकिन दर्शक भावनात्मक रूप से उससे जुड़ नहीं पाते. हंसी पैदा करने की कोशिश तो होती है, मगर वो असरदार साबित नहीं होती. फिल्म में सबकुछ शराब के नशे में हो रहा है- चाहे वो शादी हो या प्रेग्नेंट होना.
किरदार और परफॉर्मेंस
वरुण धवन, मृणाल ठाकुर और पूजा हेगड़े की तिकड़ी कागज पर दिलचस्प लगती है, लेकिन स्क्रीन पर उनकी केमिस्ट्री पूरी तरह जमती नहीं दिखती. तीनों कलाकार अपनी तरफ से कोशिश करते हैं, लेकिन कमजोर राइटिंग उनके काम को सीमित कर देता है.
फिल्म में मनीष पॉल, जिम्मी शेरगिल, अली असगर, मौनी रॉय, राकेश बेदी, चंकी पांडे, आयशा रजा, जॉनी लीवर, मनोज पाहवा, राजपाल यादव जैसे सपोर्टिंग स्टारकास्ट की लंबी फेहरिस्त मोजूद जरूर है, लेकिन किरदारों को यादगार बनने का मौका नहीं मिलता. कई कलाकार सिर्फ कहानी को आगे बढ़ाने के लिए आते-जाते नजर आते हैं. दिल से कहूं तो- दुख होता है जब ऐसे अच्छे एक्टर्स का मिस-यूज होता दिखता है.
फिल्म अपने किरदारों को स्टाइलिश दिखाने की भी पूरी कोशिश करती है. डिजाइनर कपड़े, विदेशी लोकेशन और ग्लैमरस सेटअप मौजूद हैं, लेकिन कई बार ये सब कहानी से ज्यादा ध्यान खींचता है. कुछ दृश्यों में डायलॉग और लिप सिंक भी पूरी तरह सहज नहीं लगते. गाने भी ऐसे नहीं हैं जो फिल्म खत्म होने के बाद याद रह जाएं. डांस नंबर और म्यूजिक कहानी को खास मजबूती नहीं दे पाते.
हमारा फाइनल वर्डिक्ट!
डेविड धवन का नाम सुनते ही 'कूली नं. 1', 'आंखें', 'हीरो नं. 1' और 'हसीना मान जाएगी' जैसी फिल्मों की याद आती है. उनकी फिल्मों की पहचान रही है हल्की-फुल्की कॉमेडी, मजेदार किरदार और यादगार मनोरंजन. लेकिन 'है जवानी तो इश्क होना है' उस जादू को दोबारा पैदा नहीं कर पाती. फिल्म में भागदौड़ तो बहुत है, मगर वो अपने आप आने वाली हंसी और दिल को छू लेने वाला मनोरंजन नजर नहीं आता जिसकी उम्मीद दर्शक उनके नाम से करते हैं.
'है जवानी तो इश्क होना है' एक ऐसी रोमांटिक कॉमेडी है जो बड़े स्टारकास्ट और कई कॉमिक सिचुएशन्स के बावजूद पूरी तरह असर नहीं छोड़ पाती. अगर आपको सच में हंसना खिलखिलाना है तो डेविड की पुरानी फिल्में ही उठाकर देख लीजिए. ज्यादा मजा आएगा. क्योंकि यहां तो न इमोशन्स कनेक्ट हो रहे हैं और न ही कॉमेडी!
आरती गुप्ता