मध्य प्रदेश में बागी नेता बनेंगे गेमचेंजर! 2018 के नतीजे देते हैं गवाही

चुनाव में जब भी टिकट बंटता है और जिसका टिकट कटता है वो पहले कहता है- सत्य परेशान हो सकता है, पराजित नहीं. फिर उसका एक वीडियो कार्यकर्ताओं के साथ भावुकता भरे पलों का आता है और फिर प्रदेश अध्यक्ष से लेकर पार्टी कार्यालय तक धक्का-मुक्की, नारेबाजी, प्रदर्शन देखने को मिलते रहे हैं. बाद में नाराज नेता बगावत करते हैं और पार्टी की मुश्किलें खड़ी कर देते हैं. आंकड़े कहते हैं कि बागवत से पार्टियों के समीकरण बनते और बिगड़ते आए हैं.

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मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान और कमलनाथ के सामने बागियों को मनाने की चुनौती है. (फाइल फोटो) मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान और कमलनाथ के सामने बागियों को मनाने की चुनौती है. (फाइल फोटो)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 24 अक्टूबर 2023,
  • अपडेटेड 1:39 AM IST

मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है. बीजेपी, कांग्रेस समेत अन्य राजनीतिक दल अपने उम्मीदवारों की लिस्ट जारी कर रहे हैं. एक सीट पर कई दावेदार होने से पार्टियों में उथल-पुथल वाला माहौल देखने को मिल रहा है. बीजेपी से लेकर कांग्रेस तक में मान-मनोव्वल का दौर चल रहा है. नाराज नेता और उनके समर्थक विधानसभा क्षेत्र से लेकर भोपाल तक चक्कर काट रहे हैं. कुछ नेताओं ने बगावत करते हुए अपने ही दल के कैंडिडेट को हराने की कसम खाकर चुनाव में उतरने का ऐलान किया है. 

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पहले मध्य प्रदेश के 2018 का गणित जान लीजिए फिर पूरी कहानी समझते हैं. विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने 109 सीटें जीती थीं. कांग्रेस को 114 सीटें मिलीं. जबकि बहुमत के लिए जरूरी आंकड़ा 116 सीट होता है यानी सरकार बनाने के लिए ना बीजेपी के पास बहुमत था, ना कांग्रेस. इतना ही नहीं, 2018 के आंकड़े यह भी बताते हैं कि तब टिकट कटने के बाद उतरे बागी प्रत्याशियों ने कड़े मुकाबले में बीजेपी को 5 सीट और कांग्रेस को सात सीट हरवा दी थीं. यानी कटे हुए टिकट के बाद उतरा बागी जीतती सीट हरवा कर किसी के भी सरकार बनने के सपनों को काट सकता है. 

'सत्ता तक हिला सकता है बागी नेता'

मध्य प्रदेश में बीजेपी गुना और विदिशा को छोड़कर 228 सीटों पर प्रत्याशियों का नाम ऐलान कर चुकी है. लेकिन जिन नेताओं के टिकट कटे या जो दावेदारी करते रह गए, वो बगावत पर उतर आए हैं. प्रदेश की अब तक 26 सीटों पर टिकट कटने के बाद बीजेपी को चुनावी बगावत का सामना करना पड़ रहा है. इस बार भी अगर कांटे की टक्कर हुई तो टिकट कटने से बागी बनकर उतरा कैंडिडेट सिर्फ सीट ही नहीं बल्कि सत्ता भी हिला सकता है, इसीलिए पार्टी पूरी कोशिश में जुटी है कि जो नाराज हैं, उन्हें आगे एडजस्ट करने की समझाइश देकर फिलहाल बागी बनने से रोका जाए. 

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'बीजेपी को बागियों ने कर दिया था सत्ता से दूर!'

चूंकि 2018 में दमोह सीट पर बागी बीजेपी नेता 1,131 वोट पाए और बीजेपी का उम्मीदवार 798 वोट से हार गया था. पथरिया सीट पर टिकट कटने पर बागी बीजेपी नेता 8755 वोट पाए। और बीजेपी का कैंडिडेट 2205 वोटों से हारा था. ग्वालियर दक्षिण सीट पर बीजेपी की बागी कैंडिडेट 30 हजार से ज्यादा वोट पाईं और बीजेपी का अधिकृत उम्मीदवार 121 वोट से हारा. 2018 के कुल आंकड़ों में कांग्रेस से बीजेपी सिर्फ पांच सीट पीछे थी. और पांच सीट ही बीजेपी ने 2018 में बागी कैंडिडेट की वजह से गंवाई थी. 

'कांग्रेस में सबसे ज्यादा बगावत'

वहीं, मध्य प्रदेश में बीजेपी से ज्यादा टिकट बांट चुकी कांग्रेस का ज्यादा बागियों से भी सामना हो रहा है. कई नेता अब टिकट कटने के बाद खुद मैदान में उतरकर कमलनाथ के सपनों को पूरा ना होने देने का दावा करने लगे हैं. जबकि कांग्रेस दावा करती है कि अबकी बार जितनी पारदर्शिता से और ग्राउंड लेवल तक सर्वे कराके टिकट बांटा है, ऐसा पहले कभी मध्य प्रदेश में नहीं हुआ.

'जिनको टिकट मिला, वो भी परेशान'

टिकट कटने से नाराज नेता और उनके समर्थक भोपाल में डेरा डाल रहे हैं. यहां कांग्रेस दफ्तर के बाहर हनुमान चालीस का पाठ किया जा रहा है. जिनका टिकट कटा है, वे हनुमान भक्त कमलनाथ को अपनी ताकत दिखा रहे हैं. कांग्रेस के खेमे में कहीं प्रदर्शन का बम चुनावी युद्ध में फूट रहा है तो कहीं आंसुओं का रॉकेट चल रहा है. इतना ही नहीं, मंदसौर सीट से टिकट पाए परशुराम सिसोदिया को भी रोता देखा गया. उनका दर्द यह है कि जिनका टिकट कटा वो विरोध में माहौल बना रहे हैं. 

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'शीर्षासन वाला विरोध कर रहे हैं नेता समर्थक'

जैसे किसी युद्ध में अलग अलग हथियार इस्तेमाल होते हैं. वैसे ही चुनावी लड़ाई में होता है. अब जैसे भोपाल में कांग्रेस दफ्तर के बाहर ये शीर्षासन वाला विरोध है. जो निवाड़ी से रजनीश पटैरिया को टिकट ना मिलने पर समर्थक कर रहे हैं. यही समर्थक अगर चुनाव में आगे बगावत करके अपना नेता निर्दलीय लड़ा दें तो पार्टी कैंडिडेट को भी जीतने में सिर उल्टा पैर ऊपर करना पड़ जाए. 

'2018 में बागियों की वजह से सात सीटें हारी थी कांग्रेस'

2018 के नतीजे बताते हैं कि कांग्रेस बागी उम्मीदवारों की वजह से 7 सीट हारी थी. तीन सीट से उदाहरण समझिए. झाबुआ में कांग्रेस के बागी कैंडिडेट को 35,943 वोट मिले थे. कांग्रेस के कैंडिडेट जबकि 10437 वोट से हार गए थे. पंधाना सीट पर कांग्रेस के बागी उम्मीदवार को 25456 वोट मिले और कांग्रेस उम्मीदवार 23000 वोट से हार गए. उज्जैन दक्षिण सीट पर कांग्रेस के बागी कैंडिडेट को 19560 वोट मिले और कांग्रेस का अपना उम्मीदवार 18960 वोट से हार गया.

'सबसे बड़ा सवाल- कैसे रुक पाएगी बगावत?'

विरोध की यही आग बढ़ती जाए तो जीत के सारे दावे धरे के धरे रह जाते हैं. कमलनाथ के घर के बाहर नाराज नेताओं ने टायर जला दिया है, लेकिन इससे पहले जो हुआ वो और गंभीर है. बड़नगर से सिटिंग कांग्रेस विधायक मुरली मोरवाल के समर्थकों ने पेट्रोल डालकर आत्मदाह की कोशिश कर दी. जो अपने नेता का टिकट कटने से नाराज हुए, इन्हें तो रोक लिया गया, लेकिन टिकट कटी बगावत रुक पाएगी? ऐसे में कांग्रेस दफ्तर से लेकर कमलनाथ के घर तक कटे हुए टिकट वाले नेता के समर्थकों के विरोध को हल्के में नहीं लिया जाता सकता है.

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'40 से ज्यादा सीटों पर उतरेंगे कांग्रेस के बागी?'

बताते चलें कि मध्य प्रदेश की 230 सीट में से कांग्रेस 229 टिकट का ऐलान कर चुकी है. सिर्फ बैतूल जिले की एक सीट ही बची है. दावा है कि कांग्रेस के खेमे में 40 से ज्यादा सीट पर अब तक बागी खुद मैदान में उतरने का ऐलान करने लगे हैं.  कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह कहते हैं कि नाराज होना स्वभाविक है. सबको लगता है मैं ही कैंडिडेट बनूंगा. इतने पारदर्शी तरीके से पहले कभी चयन नहीं हुआ. 90 फीसदी सीट सर्वे के आधार पर तय हुई हैं. सभी से हाथ जोड़कर प्रार्थना करता हूं, भरोसा रखिए.

'हिमाचल में बागी को मनाने खुद पीएम ने किया था फोन?'

पिछले साल हिमाचल प्रदेश के चुनाव में भी टिकट कटने से नेताओं की नाराजगी सामने आई थी. दावा है कि वहां एक पुराने नेता को तो खुद प्रधानमंत्री तक ने फोन कॉल करके मनाने की कोशिश की. लेकिन ना नेता माने, ना हिमाचल में बीजेपी जीत पाई. टिकट कटते ही नेताओं के एकदम से जज्बात बदल जाते हैं. यही हाल राजस्थान में बीजपी और कांग्रेस दोनों के खेमे में नजर आ रहा है.

(आजतक ब्यूरो)

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