उत्तर प्रदेश के शामली जिले में थाना भवन विधानसभा क्षेत्र, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कैराना बेल्ट में ग्रामीण, अर्ध-शहरी और छोटे कस्बों का मिला-जुला इलाका है. यहां भी खेती से जुड़ी परेशानियां, खेती के अलावा रोजगार के सीमित मौके और जाट-मुस्लिम व दलित राजनीति की उठा-पटक जैसी चुनौतियां हैं.
कैराना लोकसभा सीट के पांच हिस्सों में से एक है. यह शामली जिले का हिस्सा है. 2011 में शामली जिला बनने से पहले, यह मुजफ्फरनगर जिले का हिस्सा था. यह सीट 1969 से अस्तित्व में है और इसकी मौजूदा सीमाएं 2008 के परिसीमन आदेश से तय हुई थीं. इसमें मुख्य रूप से थाना भवन कस्बा और आस-पास के गांव शामिल हैं, साथ ही पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गन्ना-बहुल इलाके के सटे हुए ग्रामीण क्षेत्र भी इसमें आते हैं.
थाना भवन में कड़ी चुनावी टक्कर का लंबा इतिहास रहा है. 1969 में पहली बार चुनाव होने के बाद से यहां पार्टियों का दबदबा बदलता रहा है. कांग्रेस, जनता पार्टी, लोक दल, जनता दल, समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय लोक दल और बीजेपी सभी ने अलग-अलग समय पर यहां जीत हासिल की है. यहां अब तक 15 विधानसभा चुनाव हो चुके हैं, जिनमें 2000 का उपचुनाव भी शामिल है. कांग्रेस, बीजेपी, समाजवादी पार्टी और आरएलडी (जिसमें इसका पुराना रूप लोक दल भी शामिल है) ने तीन-तीन बार यह सीट जीती है, जबकि भारतीय क्रांति दल, जनता पार्टी और जनता दल ने एक-एक बार जीत हासिल की है.
हाल के चुनावों में यह सीट हाई-प्रोफाइल मुकाबलों का केंद्र रही है. 2012 में, बीजेपी के सुरेश कुमार राणा ने आरएलडी के अशरफ अली खान को 265 वोटों के मामूली अंतर से हराकर थाना भवन सीट जीती थी. राणा ने 2017 में भी यह सीट अपने पास बनाए रखी और बीएसपी के अब्दुल वारिस खान को 16,817 वोटों से हराया. 2022 के चुनाव में नतीजे बिल्कुल उलट गए और आरएलडी के अशरफ अली खान ने बीजेपी के राणा को हरा दिया. अशरफ अली को 103,751 वोट मिले, जबकि राणा को 92,945 वोट मिले. इस तरह अशरफ अली 10,806 वोटों के अंतर से जीते.
कैराना लोकसभा चुनावों में आए बदलावों का असर थाना भवन विधानसभा क्षेत्र में भी दिखा है. 2013 के मुजफ्फरनगर-शामली दंगों के बाद इस इलाके में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण हुआ था, जिसके बाद जाट-मुस्लिम राजनीतिक तालमेल को फिर से बनाने की कोशिशें हुईं. 2024 के लोकसभा चुनाव में, थाना भवन विधानसभा क्षेत्र में समाजवादी पार्टी ने बीजेपी पर 687 वोटों की मामूली बढ़त बनाई. समाजवादी पार्टी की इकरा चौधरी को 85,904 वोट मिले, जबकि बीजेपी के प्रदीप कुमार चौधरी को 85,217 वोट मिले. इससे पहले, 2009 में बीजेपी ने बीएसपी पर 5,766 वोटों की बढ़त बनाई थी. 2014 में समाजवादी पार्टी पर बीजेपी की बढ़त बढ़कर 47,089 वोट हो गई, फिर 2019 में यह घटकर 12,050 वोट रह गई, और आखिरकार 2024 में समाजवादी पार्टी ने वापसी की.
थाना भवन में मतदाताओं की एक बड़ी संख्या है, जो पिछले दशक में बढ़ी है. 2012 के विधानसभा चुनाव में, इस निर्वाचन क्षेत्र में 285,142 पंजीकृत मतदाता थे और मतदान प्रतिशत 61.41 था. 2017 तक, मतदाताओं की संख्या बढ़कर 311,405 हो गई और मतदान प्रतिशत 68.30 रहा. 2019 में यहां 325,230 मतदाता थे और मतदान प्रतिशत 62.18 था. 2022 में मतदाताओं की संख्या 326,817 थी और मतदान प्रतिशत 66.87 रहा। 2024 में मतदाताओं की संख्या 331,707 थी और मतदान प्रतिशत 56.51 रहा.
थाना भवन की सामाजिक संरचना जटिल है और यहां की राजनीति के लिए बहुत महत्वपूर्ण है. इस चुनाव क्षेत्र में मुस्लिम आबादी काफी ज्यादा है, जहां लगभग 1,10,000 वोटर हैं. इसके अलावा, यहां लगभग 80,000 जाटव, 50,000 जाट और अच्छी-खासी संख्या में ठाकुर और गैर-यादव OBC समुदाय के लोग भी रहते हैं. इस मिली-जुली आबादी की वजह से यह एक ऐसी सीट बन गई है जहां कोई एक समुदाय हावी नहीं हो सकता. इसके बजाय, जीतने वाले उम्मीदवारों और पार्टियों को हर चुनाव में जाट-मुस्लिम-दलित या व्यापक हिंदू जाति समूहों का गठबंधन बनाना पड़ता है. मुस्लिम वोटर कुल वोटरों का 25 प्रतिशत से ज्यादा हैं, जबकि अनुसूचित जातियों की आबादी लगभग 15.92 प्रतिशत है.
थाना भवन पश्चिमी उत्तर प्रदेश के उपजाऊ गन्ना बेल्ट में स्थित है. यहां की जमीन समतल है और खेती मुख्य रूप से सिंचाई पर निर्भर है, जिसमें गन्ना, गेहूं और धान मुख्य फसलें हैं. कई किसान पास की चीनी मिलों से जुड़े हैं, और गन्ने की कीमत, बकाया भुगतान और खेती की लागत जैसे मुद्दे अक्सर चुनावी माहौल पर असर डालते हैं. यहां बागवानी और डेयरी के छोटे-छोटे केंद्र भी हैं, जबकि खेती से अलग रोजगार मुख्य रूप से छोटे व्यापार, परिवहन, सेवाओं और पास के कस्बों व शहरों में काम करने तक सीमित है.
इस चुनाव क्षेत्र में बुनियादी सुविधाओं के तहत जिला और राज्य राजमार्गों से सड़क संपर्क की व्यवस्था है, जो थाना भवन को शामली, मुजफ्फरनगर और व्यापक कैराना क्षेत्र से जोड़ते हैं. यहां थाना भवन रेलवे स्टेशन के जरिए रेल सुविधा भी उपलब्ध है, जहां से शामली और सहारनपुर के लिए पैसेंजर ट्रेनें चलती हैं. सड़क मार्ग से लगभग 19 किलोमीटर दूर शामली रेलवे स्टेशन सबसे नजदीकी बड़ा जंक्शन है, जहां से दिल्ली और अन्य प्रमुख शहरी केंद्रों के लिए नियमित ट्रेनें मिलती हैं.
यहां बेसिक प्राइमरी और सेकेंडरी स्कूल, हेल्थ सेंटर और पुलिस स्टेशन तो हैं, लेकिन लोग अक्सर अंदरूनी गांवों में खराब सड़कों, बिजली की अनियमित सप्लाई, जल-जमाव, जल निकासी की समस्याओं और आस-पास उच्च शिक्षा व स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी की शिकायत करते हैं.
थाना भवन अहम कस्बों और शहरों से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है. जिला मुख्यालय शामली सड़क मार्ग से लगभग 19 किमी दूर है, जबकि मुजफ्फरनगर मुख्य सड़क नेटवर्क पर दक्षिण की ओर लगभग 34 किमी दूर है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश का एक प्रमुख शहरी और व्यापारिक केंद्र, मेरठ, लगभग 85 से 90 किमी दूर है. पश्चिम की ओर, हरियाणा की सीमा और पानीपत व करनाल जैसे शहर क्रमशः लगभग 50 किमी और 45 किमी की दूरी पर हैं, जिससे सीमा-पार व्यापार और आवागमन आसान हो जाता है. दिल्ली, जो लगभग 130 से 135 किमी दूर है, इस निर्वाचन क्षेत्र के कई परिवारों के लिए लंबी दूरी के पलायन, नौकरियों और उच्च शिक्षा का मुख्य केंद्र बनी हुई है.
राजनीतिक रूप से, थाना भवन पश्चिमी उत्तर प्रदेश की संवेदनशील सीटों में से एक है. यहां बीजेपी की संगठनात्मक पकड़ मजबूत है और उसने हाल के चुनावों में दो बार जीत हासिल की है, लेकिन 2022 के नतीजों ने दिखाया कि समाजवादी पार्टी-कांग्रेस गठबंधन के तहत जाट-मुस्लिम-दलित का एकजुट समूह उसे सत्ता से बेदखल कर सकता है. बीएसपी का कुछ दलित मतदाताओं के बीच प्रभाव बना हुआ है, जबकि कांग्रेस की ऐतिहासिक मौजूदगी रही है, हालांकि अब यह बहुत कम हो गई है.
2027 के विधानसभा चुनावों को देखते हुए, थाना भवन में मुकाबला इस बात पर निर्भर करेगा कि क्या विपक्ष अपने सामाजिक गठबंधन और स्थानीय एकता को बनाए रख सकता है, और क्या बीजेपी अपने सहयोगी आरएलडी के साथ मिलकर विकास के दावों, कल्याणकारी योजनाओं और पहचान की राजनीति के आधार पर अपना आधार मजबूत कर सकती है.
(अजय झा)