मीरगंज, जिसे मिरगंज भी लिखा जाता है, उत्तर प्रदेश के बरेली जिले का तहसील स्तर का एक कस्बा है और मीरगंज तहसील का मुख्यालय है. यह जिले के पश्चिमी हिस्से में रोहिलखंड क्षेत्र में स्थित है. लंबे समय से यह आसपास के गांवों के लिए एक छोटा प्रशासनिक और व्यापारिक केंद्र रहा है. यह एक सामान्य, यानी अनारक्षित विधानसभा क्षेत्र है और बरेली लोकसभा क्षेत्र के
पांच विधानसभा खंडों में से एक है. मुख्य रूप से ग्रामीण स्वरूप और बड़ी मुस्लिम आबादी के साथ मीरगंज पश्चिमी उत्तर प्रदेश के इस हिस्से की मिश्रित सामाजिक संरचना को दर्शाता है.
वर्तमान विधानसभा क्षेत्र 2008 के परिसीमन के बाद अस्तित्व में आया. इससे पहले इस क्षेत्र का अधिकांश हिस्सा पुरानी कवर सीट के अंतर्गत आता था. नया विधानसभा क्षेत्र मीरगंज तहसील को शामिल करता है, जिसके कारण इसका स्वरूप मुख्य रूप से ग्रामीण है.
नया विधानसभा क्षेत्र होने के कारण मीरगंज में अब तक केवल तीन विधानसभा चुनाव और चार लोकसभा चुनाव हुए हैं. इस सीट पर आम तौर पर बीजेपी को समर्थन मिला है, हालांकि पार्टी का इस सीट पर पूरा नियंत्रण नहीं रहा है. खास बात यह है कि दो नेता यहां बार-बार एक-दूसरे के सामने चुनाव मैदान में उतरे हैं और दोनों को अलग-अलग समय पर सफलता मिली है. बहुजन समाज पार्टी (BSP) ने 2012 में हुए पहले विधानसभा चुनाव में सुल्तान बेग को उम्मीदवार बनाकर जीत हासिल की थी. बेग ने बीजेपी के डीसी वर्मा को 7,921 वोटों से हराया था. पांच साल बाद परिणाम पूरी तरह बदल गया और 2017 में वर्मा ने बीजेपी के टिकट पर सीट जीत ली, जबकि मौजूदा विधायक बेग 54,500 वोटों से पीछे रह गए. 2022 में वर्मा की जीत का अंतर कम हुआ, हालांकि यह फिर भी काफी बड़ा रहा. इस चुनाव में बेग ने पाला बदलकर समाजवादी पार्टी का दामन थाम लिया और बीजेपी की बढ़त को कुछ कम किया. वर्मा को 1,16,435 वोट मिले, जबकि बेग को 83,955 वोट मिले. इस तरह बीजेपी ने 32,480 वोटों के अंतर से सीट बरकरार रखी.
लोकसभा चुनावों के दौरान भी मीरगंज विधानसभा क्षेत्र में बीजेपी को शीर्ष स्थान हासिल करने में कुछ समय लगा. 2009 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी तीसरे स्थान पर रही थी, जबकि कांग्रेस ने BSP पर 4,362 वोटों की बढ़त बनाई थी. पांच साल बाद बीजेपी अपने प्रतिद्वंद्वियों से आगे निकलकर पहले स्थान पर पहुंच गई और उसके बाद से यह स्थिति बरकरार है. 2014 में बीजेपी ने समाजवादी पार्टी पर 51,409 वोटों की बढ़त बनाई, 2019 में यह बढ़त 46,952 वोट और 2024 में 27,034 वोट रही. सबसे हालिया चुनाव में बीजेपी के उम्मीदवार छत्रपाल सिंह गंगवार को 1,20,977 वोट मिले, जबकि समाजवादी पार्टी के प्रवीण सिंह एरन को 93,943 वोट मिले.
मीरगंज में मतदाताओं की संख्या विधानसभा क्षेत्र बनने के बाद लगातार बढ़ी है. 2012 में पंजीकृत मतदाताओं की संख्या 2,77,034 थी, जो 2017 में बढ़कर 3,24,812, 2019 में 3,29,129, 2022 में 3,39,587 और 2024 में 3,48,323 हो गई. इस अवधि में मतदान प्रतिशत भी उल्लेखनीय रूप से ऊंचा रहा और हर चुनाव में 60 प्रतिशत से अधिक रहा. 2012 में मतदान 66.39 प्रतिशत, 2017 में 64.74 प्रतिशत, 2019 के लोकसभा चुनाव में 63.84 प्रतिशत, 2022 के विधानसभा चुनाव में 67.33 प्रतिशत और 2024 के लोकसभा चुनाव में 63.18 प्रतिशत मतदान हुआ.
मीरगंज हिंदू बहुल सीट है, जहां मुस्लिम आबादी भी काफी महत्वपूर्ण है. मुस्लिम मतदाता कुल आबादी का 30.40 प्रतिशत हैं और एक महत्वपूर्ण वोट बैंक बनाते हैं, जबकि अनुसूचित जाति के मतदाताओं की हिस्सेदारी 12.44 प्रतिशत है. गैर-मुस्लिम समुदायों में लोधी राजपूत, कुर्मी और गंगवार प्रमुख प्रभावशाली समुदायों में शामिल हैं. इसके अलावा ठाकुर, ब्राह्मण और अन्य छोटे समुदाय भी यहां मौजूद हैं. विधानसभा क्षेत्र मुख्य रूप से ग्रामीण है, जहां 82.32 प्रतिशत आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है, जबकि 17.68 प्रतिशत आबादी मीरगंज कस्बे में रहती है.
मीरगंज का विकास 18वीं शताब्दी के मध्य में रोहिल्ला काल के दौरान एक छोटे बस्ती क्षेत्र के रूप में हुआ और करीब 1794 के आसपास के रिकॉर्ड में इसका शुरुआती उल्लेख मिलता है. व्यापक बरेली क्षेत्र ऐतिहासिक रूप से पांचाल का हिस्सा था और बाद में कथेहरिया राजपूत प्रमुखों के अधीन आया. इसके बाद यह मुगल और रोहिल्ला शासन का हिस्सा बना. 1801 में अंग्रेजों द्वारा रोहिलखंड पर अधिकार किए जाने के बाद इस क्षेत्र को बरेली जिले के प्रशासन के अंतर्गत लाया गया. इसके बाद मीरगंज स्थानीय बाजार और प्रशासनिक केंद्र के रूप में विकसित हुआ और आगे चलकर इसे अलग तहसील का मुख्यालय बनाया गया. आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों के लिए सेवा केंद्र के रूप में इसकी भूमिका आज भी बनी हुई है.
मीरगंज विधानसभा क्षेत्र की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से कृषि पर आधारित है. उपजाऊ मैदानी क्षेत्र और व्यापक सिंचाई व्यवस्था यहां गन्ना, धान और गेहूं की खेती में मदद करती है. स्थानीय कृषि अर्थव्यवस्था में गन्ने की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण है. मीरगंज में एक चीनी निर्माण इकाई भी है, जिसकी गन्ना पेराई क्षमता प्रतिदिन 5,000 टन है. यह इकाई बड़ी संख्या में स्थानीय गन्ना किसानों से अपनी आपूर्ति प्राप्त करती है. चीनी से जुड़ी गतिविधियों ने पूरी तरह कृषि आधारित अर्थव्यवस्था में औद्योगिक क्षेत्र को भी जोड़ा है.
मीरगंज में सड़क और रेल दोनों की अच्छी कनेक्टिविटी है. यह बरेली को मुरादाबाद और रोहिलखंड के उत्तरी हिस्सों से जोड़ने वाले सड़क मार्ग पर स्थित है. वहीं पास का नगरिया सादात रेलवे स्टेशन लखनऊ-मुरादाबाद रेल मार्ग से कनेक्टिविटी उपलब्ध कराता है. जिला मुख्यालय बरेली करीब 35 किलोमीटर दूर है, जबकि रामपुर करीब 45 किलोमीटर, मुरादाबाद करीब 80 किलोमीटर और पीलीभीत करीब 75 किलोमीटर की दूरी पर है. शाहजहांपुर मीरगंज से करीब 115 किलोमीटर दूर है, जबकि नई दिल्ली लगभग 260 किलोमीटर और लखनऊ करीब 290 किलोमीटर दूर है. बरेली-मुरादाबाद क्षेत्र में स्थित होने के कारण मीरगंज को पश्चिमी और उत्तरी उत्तर प्रदेश के व्यापक व्यापारिक और परिवहन नेटवर्क तक पहुंच मिलती है.
2014 के बाद हुए पिछले पांच प्रमुख चुनावों में बीजेपी के लगातार मजबूत प्रदर्शन को देखते हुए, जिसमें उसने विधानसभा में लगातार दो कार्यकाल जीते हैं और लगातार तीन लोकसभा चुनावों में मीरगंज विधानसभा क्षेत्र में सबसे आगे रही है, पार्टी को उम्मीद है कि 2027 के चुनाव में भी यहां के मतदाता उसके साथ बने रह सकते हैं. बीजेपी की जीत के अंतर और बढ़त भी मजबूत रही है, हालांकि इन्हें बहुत बड़ा नहीं कहा जा सकता. हालांकि बीजेपी अपने स्तर पर किसी तरह की ढिलाई नहीं कर सकती, खासकर तब जब यहां मुस्लिम मतदाताओं की संख्या काफी महत्वपूर्ण है और विपक्ष के पास मुकाबले को कड़ा बनाने की क्षमता मौजूद है, बशर्ते वह अपने सामाजिक समीकरण और संगठनात्मक तंत्र को मजबूत तरीके से तैयार करे. BSP भी चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है, क्योंकि पार्टी ने उत्तर प्रदेश की सभी 403 विधानसभा सीटों पर नए उत्साह के साथ चुनाव लड़ने का फैसला किया है. इससे प्रमुख दलों के बीच वोटों के बंटवारे पर असर पड़ सकता है. बीजेपी को जहां अपनी सतर्कता बनाए रखनी होगी, वहीं विपक्ष को यह सुनिश्चित करना होगा कि पिछले चुनावों में बीजेपी द्वारा हासिल किए गए बड़े अंतर उसे 2027 में विपक्ष की पहुंच से बाहर न कर दें.
(अजय झा)