बड़ौत, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बागपत जिले में स्थित एक पुराना सब-डिविजन लेवल का शहर है, जिसका अपना म्युनिसिपल बोर्ड है. यह नेशनल कैपिटल रीजन (NCR) का भी हिस्सा है. यह शहर 19वीं सदी से ही इस इलाके का एक अहम शहरी केंद्र रहा है और ब्रिटिश शासन के दौरान सेंट्रल प्रोविंस में इसे एक परगना के तौर पर लिस्ट किया गया था.
विधानसभा सीट एक सामान्य, अनारक्षित सीट है और यह बागपत लोकसभा सीट के पांच हिस्सों में से एक है. अपने मौजूदा स्वरूप में, इसमें बड़ौत म्युनिसिपल बोर्ड की सीमाएं और बड़ौत व बागपत सब-डिविजन के कुछ चुनिंदा गांव शामिल हैं, जिससे इसका स्वरूप मुख्य रूप से ग्रामीण है.
बड़ौत विधानसभा सीट मूल रूप से 1951 में बनाई गई थी और 1952 के चुनावों में पहली बार यहां वोटिंग हुई थी. हालांकि, तब से अब तक यहां सिर्फ आठ विधानसभा चुनाव ही हुए हैं क्योंकि 1969 के चुनावों के बाद यह सीट खत्म कर दी गई थी. 'संसदीय और विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन आदेश, 2008' के तहत नई सीमाओं के साथ इसे फिर से बहाल किया गया.
चुनावों के पहले दौर (1952-1969) में इस इलाके के जाने-माने स्वतंत्रता सेनानी पंडित उमराव दत्त शर्मा का दबदबा रहा. पंडित जवाहरलाल नेहरू के कहने पर चुनाव लड़ने के बाद, उन्होंने 1952 का चुनाव निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर भारी अंतर से जीता. एक कार्यकाल के बाद वे सक्रिय राजनीति से हट गए, लेकिन उनके समर्थित उम्मीदवार 1969 तक जीतते रहे.
2012 से शुरू हुए दूसरे दौर में ज्यादा कड़े मुकाबले देखने को मिले. 2012 में बहुजन समाज पार्टी (BSP) के लोकेश दीक्षित ने राष्ट्रीय लोक दल (RLD) के अश्वनी कुमार को 5,676 वोटों से हराया. पिछले चुनाव में चौथे स्थान पर रहने के बाद 2017 में BJP ने जबरदस्त वापसी की, जब कृष्णपाल मलिक ने RLD के साहब सिंह को 26,486 वोटों से हराया. मलिक ने 2022 में भी यह सीट बरकरार रखी, हालांकि RLD के जयवीर सिंह तोमर के खिलाफ जीत का अंतर बहुत कम, सिर्फ 315 वोटों का था. उन्हें 90,931 वोट मिले, जबकि तोमर को 90,616 वोट मिले. लोकसभा चुनावों के दौरान बड़ौत इलाके में वोटिंग के रुझानों से पता चलता है कि बीजेपी और उसके सहयोगी दल RLD ने अच्छा प्रदर्शन किया है. 2009 में, RLD (जिसे बीजेपी का समर्थन था) ने BSP पर 7,940 वोटों की बढ़त बनाई थी. 2014 में, बीजेपी ने RLD पर 46,058 वोटों की बढ़त हासिल की. 2019 में भी इसने RLD पर 14,381 वोटों की बढ़त बनाए रखी. 2024 में, RLD के NDA में वापस आने के बाद, इस गठबंधन ने समाजवादी पार्टी पर 38,390 वोटों की बढ़त हासिल की. RLD के राजकुमार सांगवान को 93,595 वोट मिले, जबकि समाजवादी पार्टी के अमरपाल शर्मा को 55,205 वोट मिले.
बड़ौत विधानसभा क्षेत्र में रजिस्टर्ड वोटरों की संख्या लगातार बढ़ी है. 2012 में यह संख्या 251,139 थी, जो 2017 में बढ़कर 288,052 और 2019 में 296,151 हो गई. इसके बाद 2022 में यह संख्या बढ़कर 304,200 और 2024 के लोकसभा चुनावों में 307,657 हो गई.
2024 में गिरावट आने से पहले, वोटिंग प्रतिशत आम तौर पर 60 से 65 प्रतिशत के बीच रहा है. यह 2012 में 58.29 प्रतिशत, 2017 में 64.29 प्रतिशत, 2019 में 62.53 प्रतिशत और 2022 में 64.57 प्रतिशत था, लेकिन 2024 में गिरकर 53.41 प्रतिशत हो गया.
बड़ौत हिंदू-बहुसंख्यक निर्वाचन क्षेत्र है जहां जाट समुदाय का दबदबा है. यहां मुस्लिम वोटर भी अच्छी-खासी संख्या में हैं, जबकि अनुसूचित जातियों की आबादी कुल वोटरों का लगभग 10 प्रतिशत है. यह मुख्य रूप से एक ग्रामीण सीट है, जिसमें बड़ौत नगरपालिका क्षेत्र का छोटा सा शहरी हिस्सा भी शामिल है.
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बाकी हिस्सों की तरह, बड़ौत इलाके का भी एक लंबा इतिहास रहा है. यह गंगा-यमुना दोआब के प्राचीन बसावटों का हिस्सा था और बाद में मुगलों सहित कई शासकों के प्रभाव में आया. ब्रिटिश शासन के दौरान, यह इलाके के एक अहम शहर के तौर पर विकसित हुआ और खेती-बाड़ी का एक मजबूत केंद्र बना रहा.
बड़ौत पश्चिमी उत्तर प्रदेश के उपजाऊ मैदानी इलाकों में बसा है. यहां जिला और राज्य राजमार्गों के जरिए अच्छी सड़क कनेक्टिविटी है. दिल्ली-सहारनपुर लाइन पर इसका अपना रेलवे स्टेशन है. बागपत यहां से लगभग 25 किमी, मेरठ करीब 45-50 किमी, दिल्ली लगभग 50-60 किमी और राज्य की राजधानी लखनऊ लगभग 500 किमी दूर है.
यहां की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से खेती पर आधारित है, जिसमें गन्ना, अनाज और बागवानी मुख्य फसलें हैं. डेयरी फार्मिंग भी बड़े पैमाने पर होती है. मतदाताओं के मुख्य मुद्दों में गन्ने की कीमतें, सिंचाई, बिजली की आपूर्ति, रोजगार के मौके और बेहतर सड़क कनेक्टिविटी शामिल हैं.
चाहे बीजेपी बड़ौत सीट से चुनाव लड़े या आरएलडी, दोनों पार्टियों के एक साथ आने से सत्ताधारी नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस (NDA) को काफी बढ़त मिली है. जहां बीएसपी के अकेले चुनाव लड़ने की संभावना है, वहीं समाजवादी पार्टी के नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन को बड़ौत में जीत हासिल करने के लिए अपनी ताकत से ज्यादा जोर लगाना पड़ सकता है.
(अजय झा)