MY फैक्टर... लालू के तिलिस्म में बीजेपी के हिंदू और नीतीश के पसमांदा कार्ड ने कैसे लगाई थी सेंध?

नीतीश कुमार की अगुवाई वाली जनता दल (यूनाइटेड) और भारतीय जनता पार्टी के गठबंधन ने किस तरह बिहार में राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) का तिलिस्म तोड़ा? बिहार सीरीज में आज बात इसी की करेंगे.

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लालू यादव और नीतीश कुमार (फाइल फोटो: PTI) लालू यादव और नीतीश कुमार (फाइल फोटो: PTI)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 06 मई 2025,
  • अपडेटेड 7:13 AM IST

बिहार की सत्ता पर सियासी दलों के काबिज रहने का इतिहास रहा है. पहले वर्षों तक कांग्रेस की सरकार रही और फिर आया लालू यादव का दौर. लालू यादव और राबड़ी देवी के शासन की विदाई हुई तो दौर शुरू हुआ नीतीश कुमार का. सत्ता के 'सारथी' बदलते रहे लेकिन शीर्ष पर नीतीश ही रहे. बिहार की सत्ता के शीर्ष पर लंबे समय तक काबिज रहने के पीछे पार्टियों का अपना वोट गणित रहा. लालू यादव के लंबे शासन के पीछे मुस्लिम-यादव (एम वाई) समीकरण को क्रेडिट दिया जाता है. लालू यादव के एमवाई समीकरण क्या था और नीतीश कुमार की अगुवाई वाली जनता दल (यूनाइटेड)- भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की जोड़ी ने किस तरह बिहार में राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) का तिलिस्म तोड़ा? बिहार सीरीज में आज बात इसी की करेंगे.

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बिहार की सियासत में 1990 तक कांग्रेस की सरकार रही. जातियों के मकड़जाल में उलझी बिहार की सियासत में कांग्रेस लंबे समय तक शीर्ष पर रही तो इसके पीछे सवर्ण, दलित और मुस्लिम (एस डी एम) समीकरण रहा. मंडल पॉलिटिक्स की छांव में 1990 के विधानसभा चुनाव हुए और सामाजिक न्याय की बुनियाद पर जनता दल अन्य पिछड़ा वर्ग के मतदाताओं को अपने पक्ष में लामबंद करने में सफल रहा. बिहार चुनाव में जनता दल की जीत के बाद लालू यादव की अगुवाई में सरकार बनी और इसके बाद वह सामाजिक न्याय की सबसे मुखर आवाज बनकर उभरे.

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मंडल बनाम कमंडल की राजनीति के दौर में लालू यादव का फोकस ओबीसी में भी यादव पर ज्यादा हो गया. वह खुद भी इसी जाति से आते हैं. चरवाहा विद्यालय की स्थापना, तेल पिलावन लाठी घुमावन और भूरा बाल (भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण और लाला) साफ करो जैसे नारों ने ओबीसी पॉलिटिक्स का बड़ा चेहरा बनकर उभरे लालू यादव को ओबीसी के साथ ही मजबूत यादव नेता के तौर पर स्थापित करने में बड़ी भूमिका निभाई. 1989 के भागलपुर दंगों की पृष्ठभूमि में हुए 1990 के चुनाव में मुस्लिम वोटर्स का झुकाव भी जनता दल की ओर नजर आया, जो जनता परिवार के विघटन और लालू के आरजेडी बनाने के बाद भी जारी रहा. कानून व्यवस्था से लेकर भ्रष्टाचार तक, तमाम आरोप लगे लेकिन 15 साल तक सत्ता आरजेडी के ही पास रही तो लालू की सोशल इंजीनियरिंग और एम-वाई समीकरण को ही श्रेय दिया जाा है.

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बिहार में मुस्लिम-यादव वोटबैंक कितना ताकतवर

बिहार में मुस्लिम और यादव वोटबैंक की ताकत समझने के लिए आंकड़ों की चर्चा जरूरी है. राज्य सरकार की ओर से कराई गई जातिगत जनगणना के मुताबिक सूबे की कुल आबादी में 17.7 फीसदी मुस्लिम और 14 फीसदी यादव हैं. मुस्लिम और यादव आबादी का आंकड़ा ही सूबे की कुल आबादी का 32 फीसदी पहुंच जा रहा. बिहार विधानसभा की करीब 50 सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम मतदाताओं की तादाद 50 के आसपास या इससे ज्यादा है. दर्जनभर सीटों पर मुस्लिम आबादी 40 फीसदी के करीब है. यादवों को भी जोड़ दें तो सूबे की करीब छह दर्जन सीटों पर जीत हार तय करने में यादव और मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं. लालू यादव और उनकी पार्टी को इन दोनों की गोलबंदी का फायदा मिला और आरजेडी लगातार 15 साल तक सत्ता में रही.

जेडीयू और बीजेपी ने कैसे तोड़ा लालू का तिलिस्म

एम-वाई समीकरण और ओबीसी पॉलिटिक्स... लालू यादव की सोशल इंजीनियरिंग ऐसी थी कि एक समय बिहार में आरजेडी को हराना मुश्किल माना जाने लगा था. नीतीश कुमार की अगुवाई वाली जेडीयू और बीजेपी की जोड़ी ने साल 2005 के बिहार चुनाव में लालू का तिलिस्म तोड़ दिया. कानून-व्यवस्था के साथ विकास और हिंदुत्व ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) को बिहार की सत्ता के शीर्ष पर पहुंचा दिया. नीतीश की अगुवाई में एक बार सरकार बनी तो इसके बाद अपराध और अपराधियों पर एक्शन से लेकर सड़क निर्माण तक हुए कार्यों ने सीएम की सुशासन बाबू वाली इमेज गढ़ी.

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कहीं वर्ग तो कहीं जाति पर फोकस

एनडीए ने लालू की सोशल इंजीनियरिंग को काउंटर करने के लिए कहीं जाति तो कहीं वर्ग की राजनीति पर फोकस किया. बीजेपी ने अपने सवर्ण और वैश्य वोटबैंक के साथ हिंदू कार्ड के जरिये गैर यादव ओबीसी की लामबंदी पर फोकस किया. पार्टी ने नित्यानंद राय जैसे नेताओं को आगे करने के साथ ही कई साल तक भूपेंद्र यादव को प्रदेश प्रभारी बनाकर यादव वोटबैंक में सेंध लगाने की रणनीति पर भी काम किया. लालू के समीकरण में वाई पर बीजेपी तो एम में सेंध लगाने की रणनीति जेडीयू ने अपनाई.

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नीतीश कुमार की पार्टी ने लव-कुश (कोईरी-कुशवाहा) समीकरण के साथ ही महिला और मुस्लिम वोटबैंक, खासकर पसमांदा पर फोकस किया. भागलपुर दंगों की जांच, पीड़ितों को आर्थिक सहायता, कब्रिस्तान की बाउंड्री जैसे फैसलों से नीतीश ने मुस्लिम समाज के बीच पैठ बनाई. नरेंद्र मोदी की पीएम उम्मीदवारी का विरोध कर एनडीए का वर्षों पुराना साथ छोड़ने, बाढ़ राहत के लिए उनकी ओर से भेजे पैसे लौटाने के फैसलों ने मुस्लिमों के बीच नीतीश की राजनीतिक जमीन को और मजबूती दी. जातीय भावना से हटकर छात्राओं को साइकिल, शराबबंदी जैसे फैसलों से महिला मतदाताओं के एक बड़े वर्ग को अपने पाले में करने में भी वह सफल रहे. बिहार में कोईरी की आबादी 4.27 और कुर्मी आबादी 2.87 फीसदी है.

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