केरल में कितने चुनावी रणक्षेत्र, कितने सेनापति, कौन कहां भारी... समझें पूरा गुणा-गणित

केरल विधानसभा की 140 सीटों के लिए 883 उम्मीदवार मैदान में हैं, जिनकी किस्मत का फैसला गुरुवार को करीब पौने तीन करोड़ मतदाता तय करेंगे. केरल की चुनावी लड़ाई यूडीएफ बनाम एलडीएफ है, लेकिन बीजेपी उसे त्रिकोणीय बनाने में जुटी है. आइए जानते हैं केरल की 140 सीटों का गुणा-गणित.

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केरल चुनाव की लड़ाई क्या त्रिकोणीय बन पाएगी (Photo-ITG) केरल चुनाव की लड़ाई क्या त्रिकोणीय बन पाएगी (Photo-ITG)

कुबूल अहमद

  • नई दिल्ली,
  • 08 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 1:59 PM IST

केरल विधानसभा चुनाव के लिए 9 अप्रैल को यानि गुरुवार को मतदान है.  लेफ्ट के अगुवाई वाले लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) और कांग्रस नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) के बीच सीधी मुकाबला है, लेकिन बीजेपी उसे त्रिकोणीय बनाने में जुटी है. वामपंथ के सामने अपने एकलौते सियासी दुर्ग को बचाए रखने की जंग है तो कांग्रेस के सामने 10 साल के सियासी वनवास को खत्म करने की चुनौती? 

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राज्य की 140 विधानसभा सीटों पर 883 उम्मीदवार किस्मत आजमा रहे हैं. केरलम का चुनाव इस बार यूडीएफ और एलडीएफ दोनों के लिए करो-मरो वाला बन गया है. इसीलिए कांग्रेस और वामपंथी दोनों पार्टियों के नेताओं ने पूरा जोर केरल पर ही लगा रखा था. 

मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने 2021 में 40 साल से चले आ रहे सत्ता परिवर्तन की रिवायत को बदलकर इतिहास रच दिया था. विजयन सरकार के विकास और योजनाओं के दम पर लेफ्ट सत्ता की हैट्रिक लगाना चाहती है तो गांधी परिवार के सहारे कांग्रेस सत्ता में वापसी के ताना बना बुना है. ऐसे में देखना है कि केरल की चुनावी लड़ाई किसकी किस्मत का फैसला करती है? 

केरल में किस पार्टी के कितने उम्मीदवार
केरल की 140 विधानसभा सीटों पर 833 कैंडिडिटे की किस्मत का फैसला 9 अप्रैल को होगा. यूडीएफ की तरफ से देखें तो कांग्रेस से 92, मुस्लिम लीग से 26, केरल कांग्रेस से 8 और आरएसपी से 4 उम्मीदवार मैदान में है.केरल कांग्रेस (जे), आरएमपीआई और सीपीएम से एक-एक उम्मीदवार और 7 निर्दलीय प्रत्याशी को यूडीएफ का समर्थन हासिल है. 

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वहीं, लेफ्ट के नेतृत्व वाले एलडीएफ की तरफ से सीपीएम से 80, सीपीआई 21, केरल कांग्रेस (एम) से 12, एनसीपी (एसपी) से 3 और आरजेडी से 3 प्रत्याशी चुनाव लड़ रहे हैं. इसके अलावा इंडिया नेशनल लीग, एसएजपी सहित तीन छोटी पार्टियों से एक-एक उम्मीदवार मैदान में है, जिनको UDF का समर्थन है. 

एनडीए में बीजेपी 98, भारतीय धर्म जनसेना से 22 और 20-20 पार्टी से 19 उम्मीदवार है. इसके अलावा आम आदमी पार्टी 60 सीट पर चुनाव लड़ रही है तो 145 उम्मीदवार गैर-पंजीकृत दलों से और 282 निर्दलीय उम्मीदवार किस्मत आजमा रहे हैं.

केरल का सियासी समीकरण क्या है?
केरल के 140 सीटों पर 883 उम्मीदवारों की किस्मत का फैसला गुरुवार को पौने तीन करोड़ मतदाता तय करेंगे. राज्य में कुल 2,71,42,952 मतदाता तय करेंगे, जिसमें पुरुष मतदाता 1,32,20,811, महिला मतदाता 1,39,21,868 और थर्ड जेंडर मतदाता 273 हैं. राज्य की 140 सीटों के लिए 25  हजार 147 पोलिंग स्टेशन बनाए गए हैं.

राज्य की 140 सीटों से 14 अनुसूचित जाति (SC) और 2 अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित हैं. इसके अलावा 124 सीटें सामान्य वर्ग के लिए हैं. 2021 के चुनाव में,LDF ने 99 सीटें जीतकर बड़ी सफलता हासिल की थी, लेकिन इस बार के सियासी हालत अलग है. केरल तीन सियासी इलाके में बंटा हुआ है, जिसमें नार्थ, साउथ और सेंट्रल केरल है. इन तीनों से अपने-अपने सियासी समीकरण है, जिससे सत्ता की दशा और दिशा तय होती है.  

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केरल के किस इलाके में किसका पलड़ा भारी
उत्तर केरल में 6 जिले और 60 विधानसभा सीटें है, जो मुस्लिम लीग और लेफ्ट का गढ़ माना जाता है. उत्तर केरल क्षेत्र में कासरगोड, कन्नूर, वायनाड, कोझिकोड, मलप्पुरम और पलक्कड़ जिले आते हैं. यह इलाका केरल की सत्ता की चाबी माना जाता है, यहां मुस्लिम आबादी काफी प्रभावी है. केरल का मलप्पुरम जैसे जिलों में IUML (इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग) का दबदबा है, जबकि कन्नूर और कासरगोड में CPIM (वामपंथ) का काडर बेहद मजबूत है, बीजेपी के लिए पलक्कड़ एक मजबूत गढ़ बनकर उभरा है, जिसके चलते मुकाबला रोचक हो गया है. 

मध्य केरल में चार जिले आते हैं और 41 विधानसभा सीटें है. इस इलाके में त्रिशूर, एर्नाकुलम, इडुक्की और कोट्टायम जिले आते हैं. इसे 'ईसाई बेल्ट' कहा जाता है, यहां कैथोलिक और अन्य ईसाई समुदायों का वोट निर्णायक होता है. रबर की खेती करने वाले किसान मध्य केरल की राजनीति की दिशा तय करते हैं. पारंपरिक रूप से यह UDF खासकर कांग्रेस का मजबूत गढ़ माना जाता है, लेकिन पिछले दो चुनावों में एलडीएफ ने 'केरल कांग्रेस (एम)' के साथ गठबंधन कर सेंधमारी की है. 

केरल तीसरा इलाका दक्षिण केरल कह लाता है, जिसमें चार जिले और 39 विधानसभा सीटें आती हैं. इस बेल्ट में अलाप्पुझा, पतनमतिट्टा, कोल्लम और तिरुवनंतपुरम जिले की सीटें आती हैं. यहां की सियासत में हिंदू समुदाय, विशेषकर नायर और एझावा वोटबैंक सबसे महत्वपूर्ण हैं. सबरीमाला मंदिर का मुद्दा इसी क्षेत्र (पतनमतिट्टा) से जुड़ा है.  हालांकि, राजधानी तिरुवनंतपुरम और आसपास के इलाकों में बीजेपी चुनाव को त्रिकोणीय मुकाबला बनाने में जुटी है, जिसके चलते मुकाबला रोचक हो गया. 

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केरल में चुनाव लड़ाई किस दिशा जाएगी?
केरल में दस साल से लेफ्ट का कब्जा है, जिसके चलते विजयन सरकार के खिलाफ संभावित एंटी-इनकम्बेंसी मानी जा रही है. राज्य में पिछले 10 बरसों से वाम मोर्चा सत्ता में है और विपक्ष इसी को हथियार बना रहा है. कांग्रेस का दावा है कि हालिया निकाय चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव में उसके बेहतर प्रदर्शन के आधार पर अपने सत्ता में वापसी की उम्मीद लगाए हुए हैं. 
वहीं, मुख्यमंत्री पिनराई विजयन का लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट के लिए यह चुनाव करो या मरो की लड़ाई बन गया है. और विजयन के विकास और योजनाओं के बूते LDF तीसरी बार सत्ता में लौटने का दावा कर रहा है, क्योंकि उन्हें लेफ्ट मुक्त भारत से बचाने की जंग लड़नी पड़ रही है.  

हालांकि, UDF के लिए उसका अपना संगठन और पार्टी नेताओं की गुटबाजी सियासी बाधा बन सकती है,  लेकिन जिस तरह से राहुल गांधी से लेकर प्रियंका गांधी तक ने ताकत झोंक रखी थी. इसके अलावा कांग्रेस के तमाम नेता चुनाव में प्रचार करते दिखे हैं, उससे साफ जाहिर है कि यूडीएफ कोई गुंजाइश नहीं छोड़ रही

केरल चुनाव में प्रचार के दौरान राहुल गांधी ने नेताओं की आपसी कलह दूर करने की कोशिश तो की है, लेकिन यह प्रयास सफल होता है या नहीं यह चुनावी नतीजों से पता चलेगा. केरल में मुसलमान और ईसाइयों की भूमिका निर्णायक है और UDF का झुकाव इनमें ज्यादा है. केरल में बीजेपी भले अब तक सत्ता से दूर है,लेकिन उसका सियासी ग्राफ बढ़ा है. ऐसे में देखना है कि केरल की किस दिशा में जाता है.

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