एर्नाकुलम विधानसभा सीट (नंबर 82) केरल की उन चुनिंदा सीटों में है जो पूरी तरह शहर है. यह कोच्चि के व्यावसायिक और रिहायशी केंद्र का प्रतिनिधित्व करती है और एर्नाकुलम लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आती है. यह इलाका कॉम्पैक्ट, भीड़भाड़ वाला और लगातार शहरी दबाव में रहने वाला है. इसलिए यहां राजनीति विचारधारा या प्रतीकात्मक नारों से नहीं, बल्कि रोजमर्रा की
नागरिक सुविधाओं से तय होती है. एर्नाकुलम में मतदाता अपने प्रतिनिधि को हर दिन परखते हैं- ट्रैफिक जाम, पानी की सप्लाई, कचरा प्रबंधन, ड्रेनेज, फुटपाथ और सार्वजनिक सेवाओं के आधार पर.
इस सीट की भौगोलिक बनावट जवाबदेही को और तेज कर देती है. इसके वार्ड व्यस्त बाजारों, पुराने रिहायशी इलाकों और मिश्रित मोहल्लों में फैले हैं, जहां व्यापारी, नौकरीपेशा प्रोफेशनल, बंदरगाह से जुड़े मजदूर, परिवहन क्षेत्र के कर्मचारी और असंगठित क्षेत्र के कामगार एक-दूसरे के करीब रहते हैं. यहां इंफ्रास्ट्रक्चर पर दबाव लगातार बना रहता है. सड़कों की हालत, सफाई व्यवस्था, सार्वजनिक परिवहन और पीने का पानी सिर्फ चुनाव के समय उठने वाले मुद्दे नहीं हैं, बल्कि लोगों की दैनिक जिंदगी का हिस्सा हैं. यही कारण है कि शासन की कोई भी असफलता तुरंत दिखती है और जल्दी राजनीतिक मुद्दा बन जाती है.
एर्नाकुलम का मतदाता वर्ग शहरी विविधता का उदाहरण है. यहां हिंदू, ईसाई और मुस्लिम समुदाय महत्वपूर्ण संख्या में मौजूद हैं, लेकिन कोई भी समुदाय निर्णायक रूप से हावी नहीं है. साथ ही मध्यम वर्ग के प्रोफेशनल, छोटे व्यापारी, सेवा क्षेत्र के कर्मचारी, प्रवासी कामगार और लंबे समय से बसे शहरी परिवार भी बड़ी भूमिका निभाते हैं. यह विविधता यहां के राजनीतिक व्यवहार को कम वैचारिक और ज्यादा “परखने वाला” बनाती है. पहचान का असर जरूर होता है, लेकिन अक्सर उम्मीदवार की विश्वसनीयता, उपलब्धता और काम करने की क्षमता ज्यादा निर्णायक साबित होती है.
राजनीतिक रूप से एर्नाकुलम का झुकाव लंबे समय तक यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF), खासकर कांग्रेस की ओर रहा है. हालांकि यह सीट कभी पूरी तरह “सेफ” नहीं रही. समय के साथ यहां यह प्रवृत्ति भी मजबूत हुई है कि मतदाता मजबूत व्यक्तिगत उम्मीदवारों को मौका देने के लिए तैयार रहते हैं, चाहे वे पार्टी लाइन से बाहर ही क्यों न हों. यही कारण है कि एर्नाकुलम में पार्टी संगठन मायने तो रखता है, लेकिन वह अपने आप में जीत की गारंटी नहीं बनता.
2021 का विधानसभा चुनाव महामारी के बाद बने माहौल और शहरी थकान के बीच हुआ. कांग्रेस ने टी. जे. विनोद को मैदान में उतारा, जबकि मुख्य चुनौती स्वतंत्र उम्मीदवार शाजी जॉर्ज प्रनाता ने दी. भाजपा ने पद्मजा एस. मेनन को उम्मीदवार बनाया और शहर में अपनी मौजूदगी बनाए रखी, लेकिन वह मुख्य मुकाबले में नहीं आ सकी. चुनावी चर्चा पूरी तरह शहर के मुद्दों पर केंद्रित रही, ट्रैफिक, कचरा, पानी, ड्रेनेज, सार्वजनिक सेवाएँ और यह शिकायत कि जनप्रतिनिधि आम समस्याओं से दूर हो गए हैं.
नतीजों में कांग्रेस के टी. जे. विनोद ने 45,930 वोट (41.72%) हासिल कर जीत दर्ज की. स्वतंत्र उम्मीदवार शाजी जॉर्ज प्रनाता को 34,960 वोट (31.75%) मिले और भाजपा की पद्मजा एस. मेनन को 16,043 वोट (लगभग 14.57%) प्राप्त हुए. विनोद ने 10,970 वोटों के अंतर से जीत हासिल की. मतदान प्रतिशत 66.87 रहा, जो शहरी क्षेत्रों के अनुरूप माना जाता है.
यह परिणाम दोहरी तस्वीर दिखाता है. एक तरफ एर्नाकुलम ने कांग्रेस पर भरोसा बनाए रखा, लेकिन दूसरी तरफ स्वतंत्र उम्मीदवार के मजबूत प्रदर्शन ने यह स्पष्ट कर दिया कि मतदाता “रूटीन राजनीति” से संतुष्ट नहीं हैं. भाजपा का वोट शेयर जीत के लिए पर्याप्त नहीं था, लेकिन उसने मार्जिन को प्रभावित किया और शहर में एक स्थायी दूसरी ताकत के रूप में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई.
एर्नाकुलम में चुनावी उतार-चढ़ाव खासकर भीतरी शहर के व्यावसायिक और घने रिहायशी वार्डों में तेज देखा जाता है, जहां नागरिक समस्याओं पर तुरंत प्रतिक्रिया होती है. बाहरी रिहायशी हिस्से अक्सर स्विंग जोन बन जाते हैं, जहां पानी, सफाई और लोकल ट्रांसपोर्ट जैसे मुद्दे निर्णायक भूमिका निभाते हैं.
एर्नाकुलम में शासन एक स्थायी चुनाव अभियान जैसा है. यहां प्रतिनिधि को भाषणों से नहीं, बल्कि शहर की व्यवस्था को चलाने की क्षमता से आंका जाता है. यह सीट निरंतरता को महत्व देती है, लेकिन ढिलाई को माफ नहीं करती. यही वजह है कि एर्नाकुलम केरल की सबसे महत्वपूर्ण शहरी सीटों में बनी रहती है, जहां मतदाता तेजी से निर्णय करते हैं और जवाबदेही हमेशा केंद्र में रहती है.
(ए के शाजी)