पेरुम्बावूर केवल एक विधानसभा क्षेत्र नहीं है, बल्कि यह एक सक्रिय कार्यशील इलाका है, जो व्यापार, उद्योग और लगातार होने वाली मानवीय आवाजाही से आकार लेता रहा है. यह केरल के एर्नाकुलम जिले में स्थित है और चालाकुडी लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा है. लंबे समय से पेरुम्बावूर लकड़ी, प्लाइवुड, रबर, मसालों के व्यापार और छोटे पैमाने के उद्योगों का एक महत्वपूर्ण
केंद्र रहा है. समय के साथ इस आर्थिक भूमिका ने यहां बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूरों को आकर्षित किया, बसावट के पैटर्न बदले और राजनीति की सोच को भी धीरे-धीरे व्यापक बनाया.
पेरुम्बावूर की राजनीति जमीन से जुड़ी और व्यावहारिक है. यहां मतदाता विचारधारा से ज्यादा काम, मजदूरी, आवास, प्रदूषण, परिवहन और सरकारी योजनाओं तक पहुंच जैसे मुद्दों पर सोचते हैं. विचारधारा का महत्व है, लेकिन उससे ज्यादा महत्व प्रदर्शन और उम्मीदवार की व्यक्तिगत विश्वसनीयता को दिया जाता है.
पेरुम्बावूर का भौगोलिक स्वरूप एक घने नगर क्षेत्र और उसके आसपास के कृषि व अर्ध-औद्योगिक इलाकों का मिश्रण है. यहां औद्योगिक इकाइयां, लकड़ी के गोदाम, वेयरहाउस और वर्कशॉप रिहायशी वार्डों और पुराने ग्रामीण इलाकों के साथ-साथ मौजूद हैं. जिन सड़कों से माल ढोया जाता है, वही सड़कें लोगों, उनकी उम्मीदों और रोजमर्रा की परेशानियों को भी ढोती हैं.
तेज शहरीकरण के कारण पानी की आपूर्ति, कचरा प्रबंधन, आवास और सार्वजनिक परिवहन पर दबाव बढ़ गया है उद्योगों ने रोजगार तो दिया है, लेकिन साथ ही प्रदूषण, जमीन के गलत इस्तेमाल और कमजोर नियामक व्यवस्था को लेकर चिंताएं भी बढ़ी हैं. पेरुंबवूर में विकास कोई सैद्धांतिक बहस नहीं, बल्कि रोजमर्रा का अनुभव है.
यह विधानसभा क्षेत्र एर्नाकुलम की बहुलतावादी सामाजिक संरचना को दर्शाता है. हिंदू, मुस्लिम और ईसाई समुदाय यहां नगर वार्डों और आसपास की पंचायतों में आपस में घुले-मिले रहते हैं. देश के अलग-अलग हिस्सों से आए प्रवासी मजदूर यहां बड़ी संख्या में मौजूद हैं, जो आर्थिक रूप से बेहद अहम हैं और श्रम संबंधों व नागरिक प्राथमिकताओं को बदल रहे हैं.
हालांकि जाति और समुदाय अब भी संगठनात्मक राजनीति को प्रभावित करते हैं, लेकिन मतदान का फैसला ज्यादातर रोजमर्रा की जरूरतों, जैसे नौकरी की सुरक्षा, महंगाई, आवास, स्वास्थ्य सेवाएं और कल्याणकारी योजनाओं की डिलीवरी के आधार पर होता है. मिश्रित अर्थव्यवस्था के कारण यहां कठोर राजनीतिक निष्ठाएं कमजोर रहती हैं और चुनाव अक्सर कड़े मुकाबले में बदल जाते हैं.
पेरुम्बावूर कभी राजनीतिक रूप से सुस्त नहीं रहा. लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (LDF) और यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) दोनों ही यहां लगातार प्रतिस्पर्धी रहे हैं. नतीजे उम्मीदवार की छवि, संगठन की ताकत और स्थानीय विश्वसनीयता पर निर्भर करते हैं.
यह क्षेत्र प्रतीकात्मक राजनीति को इनाम नहीं देता. यहां के प्रतिनिधियों से अपेक्षा की जाती है कि वे श्रम विवादों, बुनियादी ढांचे की विफलताओं, प्रदूषण की शिकायतों और कल्याणकारी योजनाओं में देरी जैसे मामलों में सक्रिय रूप से हस्तक्षेप करें. अनुपस्थिति या दूरी तुरंत नोटिस की जाती है.
पेरुम्बावूर की राजनीति में पर्यावरणीय प्रशासन एक स्थायी चिंता बना रहता है. औद्योगिक अपशिष्ट, कचरा निपटान, जल प्रदूषण और जमीन के रूपांतरण जैसे मुद्दे हर चुनाव में उठते हैं. सड़कें, जल निकासी और सार्वजनिक परिवहन जैसी बुनियादी सुविधाओं पर दबाव इतना है कि रोजमर्रा की छोटी-छोटी विफलताएं भी राजनीतिक फैसले का आधार बन जाती हैं.
यहां छोटे उद्योगों और अनौपचारिक श्रम पर निर्भरता के कारण नियमन और रोजगार सुरक्षा के बीच संतुलन पर मतदाता करीबी नजर रखते हैं.
पेरुम्बावूर नगर और उससे जुड़े औद्योगिक वार्ड मुख्य चुनावी हॉटस्पॉट हैं. यहां मतदाताओं की घनत्व अधिक है, प्रवासी मजदूरों की बड़ी मौजूदगी है और व्यापारिक गतिविधियां केंद्रित हैं. इन इलाकों में बुनियादी ढांचे की विफलता, श्रम विवाद और नागरिक सेवाओं की खराबी पर मतदाता तेजी से प्रतिक्रिया देते हैं और नतीजे अक्सर यहीं तय होते हैं.
नगर के बाहर के अर्ध-शहरी पंचायत क्षेत्र और पुराने कृषि इलाके द्वितीयक हॉटस्पॉट का काम करते हैं. यहां जमीन विवाद, प्रदूषण और कल्याणकारी योजनाओं की डिलीवरी निर्णायक भूमिका निभाती है. जिन बूथों पर औद्योगिक कचरे, पानी की कमी या सड़क उपेक्षा की समस्या रही है, वहां विरोध स्वरूप मतदान देखने को मिला है.
प्रवासी आबादी वाले इलाकों में भले ही सीधा राजनीतिक प्रतिनिधित्व कम हो, लेकिन श्रम नेटवर्क और स्थानीय अर्थव्यवस्था के जरिये वे अप्रत्यक्ष रूप से चुनावी माहौल को प्रभावित करते हैं.
पेरुम्बावूर में रोजगार सुरक्षा सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा है. मतदाता छोटे उद्योगों, श्रम नियमों, फैक्ट्री निरीक्षण और अनौपचारिक क्षेत्र की स्थिरता से जुड़ी नीतियों पर नजर रखते हैं. मजदूरी या उद्योगों में किसी भी तरह की रुकावट तुरंत चुनावी चर्चा बन जाती है.
दूसरा बड़ा मुद्दा शहरी बुनियादी ढांचा है जिनमें सड़कें, जल निकासी, कचरा प्रबंधन और पेयजल आपूर्ति शामिल है. तेजी से फैलते शहर में असमान सेवाएं राजनीतिक नुकसान पहुंचाती हैं. पर्यावरणीय नियंत्रण भी लगातार चिंता का विषय है, खासकर उन इलाकों में जहां औद्योगिक प्रदूषण और जमीन के बदलाव का असर पड़ा है. मतदाता चाहते हैं कि विकास स्वास्थ्य और रहने की स्थिति की कीमत पर न हो.
कल्याणकारी योजनाओं की डिलीवरी, जैसे पेंशन, स्वास्थ्य सेवाएं और आवास सहायता, अनौपचारिक कामगारों और प्रवासी परिवारों के लिए निर्णायक रहती है. देरी या प्रशासनिक बाधाएं सीधे असंतोष में बदल जाती हैं. नेतृत्व की विश्वसनीयता भी एक संवेदनशील मुद्दा बन चुकी है. व्यक्तिगत आचरण, उपलब्धता और जवाबदेही, खासकर महिलाओं और युवाओं के बीच, वोटर राय को प्रभावित करती है. यहां कम अंतर से जीत-हार तय होती है, इसलिए ऐसे मूल्यांकन निर्णायक हो सकते हैं.
2021 के विधानसभा चुनाव ने पेरुंबवूर की प्रतिस्पर्धी प्रकृति को फिर साबित किया. कांग्रेस के एडवोकेट एल्दोस कुन्नप्पिल्ली ने 53,484 वोट हासिल कर सीट जीती. उन्होंने केरल कांग्रेस (एम) के बाबू जोसेफ पेरुम्बावूर को 2,899 वोटों के अंतर से हराया, जिन्हें 50,585 वोट मिले.
भाजपा उम्मीदवार टी. पी. सिंधुमोल करीब 15,000 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहीं. मतदान प्रतिशत ऊंचा रहा, जो इस क्षेत्र की राजनीतिक सजगता को दर्शाता है. यह नतीजा किसी बड़े वैचारिक बदलाव का संकेत नहीं था, बल्कि एक सशर्त समर्थन था. एल्दोस कुन्नप्पिल्ली की जीत उनके स्थानीय हस्तक्षेप, उपलब्धता और कांग्रेस की शहरी-अर्धशहरी इलाकों में समर्थन जुटाने की क्षमता को दर्शाती है. वहीं कम अंतर यह भी बताता है कि पेरुम्बावूर में राजनीतिक निष्ठा स्थायी नहीं है.
लेफ्ट और केरल कांग्रेस (एम) के लिए यह परिणाम मजबूत संगठनात्मक मौजूदगी दिखाता है, लेकिन बदलते श्रम और आर्थिक हालात के बीच उनकी सीमाएं भी उजागर करता है.
एल्दोस कुन्नप्पिल्ली की राजनीतिक स्थिति 2022 में दर्ज गंभीर आपराधिक मामलों के बाद जटिल हो गई. उन पर यौन उत्पीड़न और यौन शोषण के आरोप लगे, जिसके आधार पर कई मामले दर्ज हुए. उन्हें गिरफ्तार किया गया और बाद में जमानत मिली. ये मामले अभी अदालत में विचाराधीन हैं और एल्दोस ने आरोपों को राजनीतिक साजिश बताते हुए खारिज किया है. कांग्रेस पार्टी ने अदालत के फैसले तक उनका समर्थन किया है. लेकिन पेरुंबवूर की राजनीतिक संस्कृति में यह मुद्दा अब केवल कानूनी प्रक्रिया तक सीमित नहीं रहा. यह व्यक्तिगत आचरण, जवाबदेही और राजनीतिक दलों द्वारा तय किए जाने वाले नैतिक मानकों पर सार्वजनिक चर्चा का विषय बन चुका है.
पेरुम्बावूर उन नेताओं को महत्व देता है जो सुलभ हों, संकट के समय मौजूद रहें और विभिन्न सामाजिक समूहों से लगातार जुड़ाव बनाए रखें. जो नेता श्रम विवाद, नागरिक समस्याओं और कल्याणकारी मामलों में सक्रिय रहते हैं, वे भरोसा बनाते हैं.
(ए के शाजी)