परावूर एक ऐसा विधानसभा क्षेत्र है, जहां राजनीति अपनी स्मृतियों को लंबे समय तक संजोकर रखती है. यह केरल के एर्नाकुलम जिले में स्थित है और एर्नाकुलम लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा है. दशकों तक इसकी राजनीति पर समुद्री मज़दूरों, मछुआरा समुदायों, कोयर उद्योग, छोटे उद्योगों, आंतरिक जलमार्गों और राजनीतिक रूप से जागरूक मज.दूर वर्ग का गहरा प्रभाव रहा है. लंबे
समय तक परावूर को मध्य केरल में कम्युनिस्ट आंदोलन का एक मजबूत गढ़ माना जाता था, जिसे ट्रेड यूनियनों, सहकारी संस्थाओं और स्थानीय निकायों पर नियंत्रण के जरिए खड़ा किया गया था.
समय के साथ यह राजनीतिक निश्चितता धीरे-धीरे कमजोर होती गई. यह बदलाव किसी अचानक विचारधारात्मक टूटन के कारण नहीं आया, बल्कि नेतृत्व की उस शैली के उभार से हुआ जिसने प्रतिनिधित्व को परखने का तरीका ही बदल दिया. आज परावूर की पहचान जितनी उसके वामपंथी अतीत से है, उतनी ही पहचान चार बार लगातार चुनाव जीतने वाले नेता वी. डी. सतीशन से भी जुड़ चुकी है.
परावूर का भूगोल पानी से गहराई से जुड़ा हुआ है. यह क्षेत्र मछुआरा गांवों, बैकवॉटर, नहरों और नीची बस्तियों में फैला है, जो वेम्बनाड जल प्रणाली से जुड़ी हैं. समुद्र यहां आजीविका देता है, लेकिन साथ ही असुरक्षा भी लाता है. तटीय कटाव, बाढ़, खारे पानी का जमीन में प्रवेश और मछली पकड़ने से जुड़ी आय की अनिश्चितता रोजमर्रा की राजनीतिक चिंताओं को जन्म देती है.
भीतरी इलाकों का रिश्ता कोच्चि की शहरी अर्थव्यवस्था से जुड़ा है, जहां लोग उद्योगों और सेवा क्षेत्रों में काम करते हैं. तटीय असुरक्षा और शहरी संपर्क का यह मिश्रण परावूर को एक जटिल सामाजिक-आर्थिक पहचान देता है, जो सीधे तौर पर चुनावी व्यवहार को प्रभावित करता है.
परावूर का मतदाता वर्ग एक सघन श्रमिक-आधारित सामाजिक ढांचे का प्रतिनिधित्व करता है. हिंदू, ईसाई और मुस्लिम समुदाय अक्सर एक-दूसरे के बेहद नजदीक रहते हैं, कई बार तो एक ही मछुआरा गांव या श्रमिक बस्ती में पारंपरिक जातिगत विभाजन यहां ऐतिहासिक रूप से वर्ग राजनीति और यूनियन संगठन के कारण अपेक्षाकृत कमजोर रहे हैं.
मछुआरा समुदाय, कोयर मजदूर, औद्योगिक श्रमिक, छोटे व्यापारी और खाड़ी देशों से लौटे परिवार मिलकर मतदान के रुझान तय करते हैं. पहचान की राजनीति मायने रखती है, लेकिन वह अकेले निर्णायक नहीं होती. रोजगार की सुरक्षा, कल्याणकारी योजनाओं तक पहुंच और नेता की विश्वसनीयता अक्सर पारंपरिक राजनीतिक निष्ठाओं पर भारी पड़ जाती है.
स्वतंत्रता के बाद के लंबे दौर तक परावूर कम्युनिस्ट राजनीति का मजबूत केंद्र रहा. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) ने यहां ऐसी संगठनात्मक संरचनाएं खड़ी कीं, जिन्होंने वर्गीय एकजुटता को चुनावी जीत में बदला. एक समय पर यहां के चुनाव विचारधारात्मक निरंतरता के लगभग तयशुदा उदाहरण हुआ करते थे.
लेकिन धीरे-धीरे यह प्रभुत्व कमजोर पड़ने लगा. मतदाताओं ने विचारधारा की विरासत और जनप्रतिनिधि के प्रदर्शन के बीच फर्क करना शुरू किया. परावूर ने वामपंथ की सामाजिक विरासत को पूरी तरह नहीं छोड़ा, लेकिन अब मतदाता पार्टी के प्रतीकों के बजाय रोजमर्रा के शासन और कामकाज के आधार पर नेतृत्व का मूल्यांकन करने लगे.
वी. डी. सतीशन की लगातार जीतों ने परावूर की राजनीति की दिशा ही बदल दी. एक ऐसे क्षेत्र से चार बार लगातार जीत दर्ज करना, जिसे कभी CPI का गढ़ माना जाता था, अपने-आप में एक बड़ा राजनीतिक संकेत था. सतीशन ने अपनी पहचान सहज उपलब्धता, लगातार क्षेत्रीय संपर्क और स्थानीय मुद्दों पर सटीक हस्तक्षेप के जरिए बनाई.
उनकी लोकप्रियता भाषणों से ज्यादा उनकी मौजूदगी पर आधारित रही. उन्होंने मछुआरा बस्तियों, श्रमिक इलाकों, व्यापारियों और मध्यम वर्गीय मोहल्लों में भरोसा कायम किया. समय के साथ परावूर के मतदाताओं ने प्रतिनिधित्व से जुड़ी अपनी अपेक्षाएं बदलीं और विचारधारात्मक पहचान की जगह प्रभावशीलता और जवाबदेही को प्राथमिकता दी.
सतीशन का उभार केरल की व्यापक राजनीति में आए उस बदलाव को भी दर्शाता है, जहां व्यक्तिगत विश्वसनीयता अब पार्टी की विरासत को टक्कर देने लगी है.
परावूर की राजनीति पर्यावरणीय असुरक्षा से अलग नहीं है. तटीय कटाव, मानसून के दौरान बाढ़, नहरों की खराब हालत और मछुआरों की आजीविका पर मंडराते खतरे हर मौसम में लौटते हैं. अंदरूनी इलाकों में जल निकासी की समस्याएं, सड़कों की हालत और पीने के पानी की गुणवत्ता प्रमुख मुद्दे बने रहते हैं.
यहां शासन का मूल्यांकन किसी एक घटना से नहीं, बल्कि लगातार सामने आने वाली चुनौतियों से होता है. इसलिए चुनाव एक बार का फैसला नहीं, बल्कि समय के साथ बने समग्र आकलन का परिणाम होते हैं.
तटवर्ती मछुआरा गांव परावूर के सबसे अहम चुनावी केंद्र हैं, मछली पकड़ने पर प्रतिबंध, बंदरगाह सुविधाएं, आवास सुरक्षा और आपदा मुआवजे से जुड़ी नीतियों पर यहां की प्रतिक्रिया तेज और सामूहिक होती है. दूसरे अहम क्षेत्र अर्ध-शहरी वार्ड और बाजार केंद्र हैं, जहां बुनियादी ढांचा, परिवहन और कल्याणकारी योजनाओं की चर्चा हावी रहती है. औद्योगिक और सेवा क्षेत्र से जुड़े श्रमिक इलाके ‘स्विंग जोन’ की तरह काम करते हैं, जहां रोजगार की स्थिरता और महंगाई अहम मुद्दे होते हैं. मछुआरों और असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए आजीविका की सुरक्षा सबसे बड़ा मुद्दा बनी हुई है. तटीय सुरक्षा, मछली पकड़ने के दौरान मिलने वाला मुआवज़ा और सुरक्षित आवास पर कड़ी निगाह रहती है.
दूसरा बड़ा मुद्दा बुनियादी ढांचा है, जिसमें सड़कें, जल निकासी, नहरों की देखरेख और पीने के पानी की व्यवस्था शामिल है. पेंशन, स्वास्थ्य सेवाएं और आवास सहायता जैसी कल्याणकारी योजनाएं भी मतदान के फैसले को प्रभावित करती हैं. नेतृत्व की विश्वसनीयता और उपलब्धता निर्णायक भूमिका निभाने लगी है. लंबे राजनीतिक अनुभव वाले इस क्षेत्र में मतदाता उन नेताओं को महत्व देते हैं जो चुनाव के बाद भी दिखाई देते हैं.
2021 के विधानसभा चुनाव में परावूर में कड़ा लेकिन निर्णायक मुकाबला देखने को मिला. कुल 2,01,317 मतदाताओं में से 78.78 प्रतिशत ने मतदान किया. डाले गए 1,58,594 वैध वोटों में से 1,113 वोट NOTA को मिले.
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के वी. डी. सतीशन ने 82,264 वोट हासिल कर जीत दर्ज की, जो कुल वोटों का 51.87 प्रतिशत था. CPI के एम. टी. निक्सन को 60,963 वोट मिले, जो 38.44 प्रतिशत रहे.
भारथ धर्म जन सेना के ए. बी. जयप्रकाश तीसरे स्थान पर रहे, जिन्हें 12,964 वोट (8.17 प्रतिशत) मिले. अन्य उम्मीदवारों को मिलाकर एक प्रतिशत से भी कम वोट प्राप्त हुए. सतीशन की जीत का अंतर 21,301 वोटों का रहा, जिसने उनकी मजबूत स्थिति को और स्पष्ट किया.
इस परिणाम ने सतीशन की निरंतर लोकप्रियता और मतदाताओं की उस सोच की पुष्टि की, जिसमें नेतृत्व को ऐतिहासिक निष्ठा से अलग करके देखा जा रहा है. यह साफ हो गया कि परावूर के मतदाता अब जवाबदेही, विश्वसनीयता और निरंतर संपर्क को प्राथमिकता देते हैं. वामपंथ के लिए यह नतीजा एक चेतावनी था कि सिर्फ संगठनात्मक विरासत के भरोसे इस क्षेत्र में दोबारा पकड़ बनाना अब आसान नहीं है.
भाजपा ने संगठनात्मक स्तर पर मौजूदगी बनाई है, लेकिन उसे चुनावी समर्थन में बदलने में सफलता नहीं मिली है. पहचान-आधारित राजनीति को परावूर के श्रमिक और तटीय सामाजिक ढांचे में सीमित स्वीकार्यता मिली है. मुकाबला मुख्य रूप से कांग्रेस और वामपंथ के बीच ही बना हुआ है.
परावूर उन नेताओं को चुनता है जो सेवा में निरंतरता रखते हैं, संकट के समय मौजूद रहते हैं और रोजमर्रा की समस्याओं से जुड़े रहते हैं. यहां शासन को एक स्थायी जिम्मेदारी माना जाता है, न कि केवल चुनावी गतिविधि. परावूर स्मृति के साथ वोट करता है, लेकिन विवेक के साथ भी. यह क्षेत्र अपने अतीत का सम्मान करता है, लेकिन उसका बंदी नहीं बनता. एक समय के CPI गढ़ से चार बार लगातार वी. डी. सतीशन को चुनकर परावूर ने केरल की राजनीति में आए उस गहरे बदलाव को रेखांकित किया है, जहां विचारधारा से ज्यादा विश्वसनीयता, मौजूदगी और प्रदर्शन को महत्व दिया जा रहा है.
(ए के शाजी)