छोटे शहर से की केमिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई फिर भी गूगल में मिल गई नौकरी,

आपको नौकरी नहीं दें सकते क्योंकि आपने टियर-3 कॉलेज से पढ़ाई की है... आए दिन इस तरह की खबरें सोशल मीडिया पर वायरल होती हैं, लेकिन सिमरन वर्मा की कहानी कुछ और बताती है. उन्होंने दुनिया के सबसे बड़ी टेक कंपनी गूगल में नौकरी हासिल कर इस धारणा को गलत साबित कर दिया है. उनकी इस जर्नी ने कई लोगों को प्रोत्साहित किया है और आगे बढ़ने की सीख दी है. 

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टियर-3 कॉलेज से की पढ़ाई और गूगल में ले ली नौकरी. टियर-3 कॉलेज से की पढ़ाई और गूगल में ले ली नौकरी.

आजतक एजुकेशन डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 06 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 5:25 PM IST

कई लोगों के मन में सवाल होता है कि टियर-3 कॉलेज में पढ़ाई करके क्या दुनिया की सबसे बड़ी टेक कंपनी गूगल में नौकरी लग सकती है? कई लोग इसका जवाब हां में देंगे तो कई नहीं में. लेकिन सिमरन वर्मा के साथ कुछ ऐसा ही हुआ है. सिमरन ने केमिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और आज गूगल में प्रोजेक्ट मैनेजमेंट अप्रेंटिस के तौर पर काम कर रही हैं. इस बीच उन्होंने लिंक्डइन पर गूगल में काम करने के अपने 90 दिन के एक्पीरियंस को शेयर किया है. 

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सिमरन की ये जर्नी कॉर्पोरेट जगत में टियर-3 कॉलेजों के स्टूडेंट्स के सामने आ रही चुनौती के बारे में भी बताती है. ऐसा माना जाता है कि बड़े कंपनियों में काम करने वाले लोग आईआईटी या बड़े ब्रांड वाले संस्थानों से ही पढ़कर आते हैं. 

सिमरन के पोस्ट ने खींचा लोगों का ध्यान 

लेकिन ऐसा नहीं है. सिमरन वर्मा के पोस्ट ने इन सभी धारणाओं को तोड़ दिया है. उन्होंने अपनी पोस्ट की शुरुआत में लिखा कि 4 साल तक डिस्टिलेशन कॉलम की पढ़ाई की, लेकिन आज वह उसका इस्तेमाल नहीं कर रही हैं. टियर-3 कॉलेज से केमिकल इंजीनियरिंग करने के बाद, वैसे तो लोग इस फील्ड में ही काम ढूंढते हैं. लेकिन उन्होंने ऐसा करने के बजाय कुछ और करने की सोची. 

90 दिनों में बदल गई जिंदगी 

सिमरन वर्मा ने पोस्ट में बताया कि उनकी 3 महीने की गूगल का सफर भले ही चैलेंजिंग था लेकिन बेहतरीन था. पोस्ट में आगे लिखा कि 90 दिनों में उन्हें केमिकल इंजीनियरिंग की प्रोसेस ऑप्टिमाइजेशन की दुनिया से निकलकर टेक प्रोजेक्ट्स के ‘क्रॉस-फंक्शनल एजाइल एग्जीक्यूशन’ को समझना पड़ा. हालांकि, ये उनके लिए बहुत नया था लेकिन उन्होंने इसे एक मौके की तरह लिया. 

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कई बार हुआ सेल्फ डाउट 

सिमरन ने बताया कि इतनी बड़ी कंपनी के साथ काम करने पर उन्हें ‘इम्पोस्टर सिंड्रोम’ (खुद की काबिलियत पर शक होना) का सामना करना पड़ा. उनके इस कठिन समय में उनके दोस्तों, मेंटर्स और गूगल के साथी ने उनका साथ दिया. उन्होंने अपनी सफलता का श्रेय हर उन लोगों को दिया है जिन्होंने उस मुश्किल दौर में उनका हौसला बढ़ाया है.

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