10 साल की जेल, बुलडोजर, 1 करोड़ जुर्माना... इतने कड़े कानून से भी क्यों नहीं डरे पेपर लीक के सौदागर?

साल 2024 में संसद ने पेपर लीक रोकने के लिए 'सार्वजनिक परीक्षा अधिनियम, 2024' पास किया था, जिसमें भारी जुर्माना और जेल की सजा का प्रावधान था. लेकिन दो साल बाद भी इस कानून का असर सीमित रहा है. बड़े माफिया और सरगना कानून की कमजोरियों का फायदा उठाकर बच निकल रहे हैं, जबकि छोटे क्लर्क और डमी कैंडिडेट्स ही फंसे हैं.

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NEET-UG लीक के आरोपी मोटेगांवकर के पुणे कैंपस पर चला प्रशासन का बुलडोजर (Photo: ITG) NEET-UG लीक के आरोपी मोटेगांवकर के पुणे कैंपस पर चला प्रशासन का बुलडोजर (Photo: ITG)

आजतक एजुकेशन डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 25 मई 2026,
  • अपडेटेड 2:26 PM IST

जब-जब देश में कोई परीक्षा लीक होती है, तब-तब हुक्मरानों की तरफ से एक ही घिसा-पिटा बयान आता है, 'हम नया कानून ला रहे हैं, दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा.' साल 2024 में जब पेपर लीक को लेकर युवाओं का गुस्सा सातवें आसमान पर था, तब सरकार ने संसद से 'सार्वजनिक परीक्षा अधिनियम, 2024' पास कराया था.

इस कानून को पार‍ित करने के साथ ही ढिंढोरा पीटा गया कि अब माफियाओं की खैर नहीं. लेकिन दो साल बीतते-बीतते नीट (NEET UG 2026) के ताजा संकट ने इस पूरे कानून की हवा निकाल दी है. ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि जिस कानून में 1 करोड़ रुपये के जुर्माने और 10 साल की जेल जैसे का खौफनाक प्रावधान था, वो आखिर जमीन पर 'ढाक के तीन पात' क्यों साबित हो रहा है?

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इस कानून में किस अपराध के लिए क्या सजा? 

कैटगरी A: व्यक्तिगत धांधली या नकल (Section 10(1))
अपराध: अगर कोई अकेला व्यक्ति या कुछ लोग मिलकर परीक्षा में नकल करते हैं, अवैध रूप से आंसर-की हासिल करते हैं या किसी कैंडिडेट की मदद करते हैं.
सजा: न्यूनतम 3 साल से लेकर अधिकतम 5 साल की जेल और साथ में 10 लाख रुपये तक का जुर्माना. अगर जुर्माना नहीं भरा, तो जेल की अवधि और बढ़ जाएगी.

कैटगरी B: परीक्षा कराने वाली कंपनी/सर्विस प्रदाता की मिलीभगत (Section 10(2) & 10(3))
अपराध: परीक्षा कराने वाली प्राइवेट एजेंसी, कंप्यूटर सेंटर या उनके बड़े अधिकारी (डायरेक्टर/सीनियर मैनेजमेंट) प्रश्नपत्र लीक कराने या सिस्टम हैक कराने की प्रक्रिया में शामिल पाए जाते हैं.
सजा: उस कंपनी पर 1 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया जाएगा और परीक्षा का पूरा खर्च भी उसी कंपनी से वसूला जाएगा. साथ ही, उस एजेंसी को 4 साल के लिए ब्लैकलिस्ट कर दिया जाएगा.

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अधिकारियों को जेल: अगर कंपनी के डायरेक्टर या इन-चार्ज की सहमति साबित हुई, तो उन्हें 3 से 10 साल तक की जेल और 1 करोड़ रुपये का व्यक्तिगत जुर्माना भुगतना होगा.

कैटगरी C: संगठित अपराध या सॉल्वर गैंग (Section 11)
अपराध: जब कोई पूरा सिंडिकेट, कोचिंग माफिया, प्रिंटिंग प्रेस या संगठित गिरोह मिलकर बड़े पैमाने पर पेपर लीक करता है या डमी कैंडिडेट (सॉल्वर) बैठता है.
सजा: इस एक्ट के तहत इसे सबसे बड़ा अपराध माना गया है. इसमें गिरोह के सदस्यों को न्यूनतम 5 साल से लेकर अधिकतम 10 साल की सख्त जेल की सजा है और कम से कम 1 करोड़ रुपये का जुर्माना तय है.
संपत्ति की कुड़की: इस श्रेणी में दोषी पाई जाने वाली संस्था या गिरोह की संपत्तियों को कुर्क और अटैच करने का भी कड़ा प्रावधान है.

यह सजा मिलती कैसे है?
इस कानून के तहत किसी भी अपराधी को सजा दिलाने के लिए कानूनन एक सख्त और तय प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है:

स्टेप 1: इस कानून के तहत आने वाले सभी अपराध संज्ञेय (कॉग्न‍िजेबल) और गैर-जमानती (नॉन बेलेबल) हैं. इसका मतलब है कि जैसे ही पेपर लीक की एफआईआर दर्ज होगी, पुलिस को आरोपी को गिरफ्तार करने के लिए किसी कोर्ट के वारंट की जरूरत नहीं होगी. आरोपी को थाने से बेल (जमानत) नहीं मिल सकती, उसे सीधे जेल जाना होगा.

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स्टेप 2: इस कानून के अंतर्गत मामलों की जांच छोटे स्तर के पुलिसकर्मी नहीं कर सकते. कानूनन, इसकी जांच डिप्टी एसपी (DSP) या असिस्टेंट कमिश्नर ऑफ पुलिस (ACP) रैंक के अधिकारी या उससे ऊपर के अधिकारियों द्वारा ही की जाएगी. केंद्रीय स्तर पर यह जांच सीधे सीबीआई जैसी बड़ी केंद्रीय एजेंसियों को सौंपी जाती है.

स्टेप 3: आरोपियों को सजा दिलाने के लिए सरकार इन मामलों को 'विशेष अदालतों' (स्पेशल कोर्ट) में चलाती है. यहां पुलिस द्वारा चार्जशीट दाखिल करने के बाद गवाहों और सबूतों की जांच होती है. जब अदालत में यह साबित हो जाता है कि आरोपी ने परीक्षा प्रणाली को दूषित करने की साजिश रची थी, तब कोर्ट ऊपर लिखी सजाओं का परिणाम (फैसला) सुनाता है.

नकल माफियाओं के लिए 'लूपहोल' बना यह कड़ा कानून
आइये समझते हैं कि वो कौन से कानूनी और प्रशासनिक झोल हैं, जिनकी वजह से बड़े सिंडिकेट इस एक्ट को ठेंगे पर रखते हैं. 

सद्भावना यानी गुड फेथ की आड़ में बचते हैं बड़े अफसर: इस कानून की सबसे कमजोर कड़ी इसकी वो धारा है, जो परीक्षा कराने वाली एजेंसियों (जैसे NTA या भर्ती बोर्ड) के अधिकारियों को 'सद्भावनापूर्वक किए गए कार्य' के नाम पर सुरक्षा देती है. जब भी कोई गड़बड़ी होती है, अधिकारी इसे 'तकनीकी खामी' या 'सिस्टम ग्लिच' बताकर साफ बच निकलते हैं, जबकि अंदर ही अंदर पूरी प्रणाली को दीमक खा चुका होता है.

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सिर्फ 'प्यादों' पर गाज, सरगना अब भी आजाद: पिछले दो साल के भीतर इस अधिनियम के तहत विभिन्न राज्यों में दर्जनों मुकदमे लिखे गए. लेकिन अगर आप गिरफ्तारियों की लिस्ट उठाएंगे, तो उसमें सिर्फ परीक्षा केंद्रों के छोटे-मोटे क्लर्क, कंप्यूटर ऑपरेटर या डमी कैंडिडेट्स ही मिलेंगे. जो असली मगरमच्छ पर्दे के पीछे बैठकर करोड़ों का वारा-न्यारा करते हैं, उन तक इस कानून के हाथ दो साल में भी नहीं पहुंच पाए.

कन्विक्शन रेट बहुत कम: इस कानून को गैर-जमानती तो बनाया गया, लेकिन हमारी सुस्त न्यायिक प्रक्रिया के कारण मामलों का परिणाम आने में सालों लग जाते हैं. दो साल में इस नए कानून के तहत एक भी बड़े सॉल्वर गैंग के सरगना को अदालत से अंतिम सजा नहीं दिलवाई जा सकी है. जब तक अपराधियों को हफ्तों के भीतर फास्ट-ट्रैक कोर्ट से सजा नहीं मिलेगी, तब तक कानून का कोई खौफ पैदा नहीं होगा.

क्या अफवाह या फेक न्यूज फैलाने वालों पर भी होगी कार्रवाई?
इस कानून का एक और अहम हिस्सा है जिस पर छात्रों को नजर रखनी चाहिए. कानून की धाराओं में साफ लिखा है कि यदि कोई व्यक्ति दुर्भावनापूर्ण तरीके से सोशल मीडिया या किसी अन्य प्लेटफॉर्म पर परीक्षा को लेकर फर्जी खबरें, नकली प्रश्नपत्र या भ्रामक आंसर-की फैलाता है, जिससे पूरी परीक्षा प्रक्रिया प्रभावित होती है, तो उसे भी 'अनुचित साधनों' को बढ़ावा देने का दोषी माना जाएगा. यानी कानून के दायरे में सिर्फ लीक करने वाले नहीं, बल्कि माहौल खराब करने वाले भी आते हैं.

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लेकिन बड़ा सवाल वही है जब कानून असली दोषियों का कुछ नहीं बिगाड़ पा रहा, तो सोशल मीडिया पर न्याय की गुहार लगा रहे छात्रों को डराने के लिए इन धाराओं का इस्तेमाल कितना जायज है? देश का युवा आज कागजी वादों से थक चुका है, उसे अब बयानों की नहीं, बल्कि जेल की सलाखों के पीछे बंद पेपर लीक के ठेकेदारों की रीयल-टाइम तस्वीरें देखनी हैं.

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