... US की वो कमजोरी जिसने ट्रंप को ईरान संग बातचीत की टेबल पर ला दिया

अमेरिका और ईरान के बीच अंतिम समझौते के लिए बातचीत तेज हो गई है. इजरायल को बचाने में अमेरिका का मिसाइल स्टॉक आधा खाली होने के बाद यह मोड़ आया है, जिससे शांति की उम्मीदें जगी हैं.

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ईरान के साथ जंग में कुछ ऐसा हुआ है अमेरिका के साथ कि अब उसे बातचीत की टेबल पर आना पड़ा है. (File Photo: Reuters) ईरान के साथ जंग में कुछ ऐसा हुआ है अमेरिका के साथ कि अब उसे बातचीत की टेबल पर आना पड़ा है. (File Photo: Reuters)

ऋचीक मिश्रा

  • नई दिल्ली,
  • 22 मई 2026,
  • अपडेटेड 11:21 AM IST

मिडिल ईस्ट में महीनों से जारी भीषण तनाव और युद्ध के बाद वैश्विक राजनीति से एक बेहद चौंकाने वाली और राहत भरी खबर सामने आ रही है. लंबे समय से एक-दूसरे के कड़े दुश्मन रहे अमेरिका और ईरान इस समय एक अंतिम समझौते का मसौदा तैयार करने के लिए बेहद गंभीर और इनडायरेक्ट बातचीत में जुटे हैं. 

ईरान की समाचार एजेंसी इशना (ISNA) की रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों देश इस समय ओमान और अन्य मध्यस्थों के जरिए लगातार संदेशों और समझौतों के ड्राफ्ट का आदान-प्रदान कर रहे हैं. इस बात की पुष्टि तब और मजबूत हो गई जब ईरान के एक शीर्ष अधिकारी ने अल जजीरा चैनल को बताया कि दोनों पक्षों के वार्ताकार एक ऐतिहासिक सहमति पर पहुंचने के बेहद करीब हैं.

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हालांकि, कूटनीतिक जानकारों और अल जजीरा की रिपोर्टों का यह भी कहना है कि बातचीत बहुत आगे बढ़ चुकी है, लेकिन यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि क्या दोनों देश अंतिम समझौते पर हस्ताक्षर कर ही देंगे. इस पूरी बातचीत के बीच एक और बड़ी हलचल देखी गई है.

पाकिस्तान के वरिष्ठ अधिकारी मोहसिन नकवी इस समय विशेष मध्यस्थता मिशन के तहत ईरान के दौरे पर हैं, जहां वे दोनों देशों के बीच तनाव का मुख्य केंद्र रहे स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के समुद्री रास्ते को सुरक्षित और खुला रखने के लिए चर्चा कर रहे हैं. इस समझौते को लेकर डोनाल्ड ट्रंप ने भी एक बड़ा बयान देकर हलचल बढ़ा दी है.

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क्यों समझौते को मजबूर हुआ वॉशिंगटन?

इस बेहद गोपनीय और अचानक शुरू हुई बातचीत के पीछे एक ऐसा सैन्य कारण सामने आया है जिसने अमेरिकी सुरक्षा खेमे में हड़कंप मचा रखा है. अमेरिकी अखबार द वाशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, इजरायल-ईरान युद्ध में इजरायल की रक्षा करते-करते अमेरिका का अपना खुद का आधुनिक मिसाइल डिफेंस इन्वेंट्री (हथियारों का स्टॉक) लगभग खाली होने की कगार पर पहुंच गया है. 

अमेरिकी अधिकारियों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि पेंटागन ने इजरायल को ईरानी मिसाइलों से बचाने के लिए अपनी क्षमता से बाहर जाकर अंधाधुंध गोला-बारूद और इंटरसेप्टर मिसाइलें दागी हैं, जिससे खुद अमेरिका पर गंभीर संकट खड़ा हो गया है.

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आंकड़ों के मुताबिक, अमेरिका ने इजरायल की रक्षा के लिए 200 से अधिक टर्मिनल हाई एल्टीट्यूड एरिया डिफेंस (THAAD) इंटरसेप्टर लॉन्च किए. इसके अलावा, पूर्वी भूमध्य सागर में तैनात अमेरिकी युद्धपोतों से 100 से अधिक स्टैंडर्ड मिसाइल-3 (SM-3) और स्टैंडर्ड मिसाइल-6 (SM-6) इंटरसेप्टर दागे गए. 

इस भारी गोलाबारी के कारण पेंटागन के पास मौजूद कुल मिसाइल स्टॉक का लगभग आधा हिस्सा पूरी तरह खत्म हो चुका है. चौंकाने वाली बात यह है कि खुद इजरायल ने अपने बचाव में अपनी एरो मिसाइलों के 100 से भी कम और डेविड्स स्लिंग के केवल 90 इंटरसेप्टर फायर किए. यानी इजरायल से ज्यादा अमेरिकी हथियारों का नुकसान हुआ है, जिसने वॉशिंगटन को ईरान के साथ टेबल पर आने के लिए मजबूर कर दिया.

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ट्रंप का रुख: ईरान के पास नहीं रहेगा यूरेनियम

भले ही अमेरिका कूटनीतिक समझौते की राह पर बढ़ रहा है, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का तेहरान के प्रति रुख अभी भी बेहद आक्रामक और स्पष्ट है. वॉशिंगटन में मीडिया से बात करते हुए ट्रंप ने साफ कर दिया कि इस समझौते के तहत ईरान को परमाणु हथियार बनाने की अनुमति कतई नहीं दी जाएगी. 

ट्रंप ने कड़े लहजे में कहा कि ईरान के पास जो भी एनरिच यूरेनियम है, वह उसे अपने पास नहीं रख पाएगा. हम उस पूरे यूरेनियम को अपने कब्जे में ले लेंगे. हमें उसकी जरूरत नहीं है, न ही हम उसे चाहते हैं. हम उसे हासिल करने के बाद शायद पूरी तरह नष्ट कर देंगे. लेकिन हम उसे ईरान के पास नहीं रहने दे सकते.

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इसके साथ ही ट्रंप ने अमेरिकी जनता को आर्थिक मोर्चे पर बड़ी राहत का वादा करते हुए इस बातचीत को अपनी एक बड़ी जीत के रूप में पेश किया. उन्होंने कहा कि ईरान का यह पूरा विवाद बहुत जल्द, बेहद जल्द खत्म होने वाला है. जैसे ही यह युद्ध और गतिरोध समाप्त होगा, वैश्विक बाजार स्थिर हो जाएगा.

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ट्रंप ने कहा कि आपके देश में पेट्रोल-डीजल की कीमतें पहले की तुलना में बहुत नीचे गिर जाएंगी. ट्रंप के इस बयान से साफ है कि वे इस समझौते के जरिए मिडिल ईस्ट में शांति लाकर अमेरिकी अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देना चाहते हैं.

क्या टल जाएगा मिडिल ईस्ट का संकट?

वर्तमान में चल रही यह वार्ता एक ऐसे नाजुक मोड़ पर है जहां दोनों देशों के पास खोने के लिए बहुत कुछ है. ईरान जहां अमेरिकी आर्थिक प्रतिबंधों और इजरायली हमलों से पस्त हो चुका है. अपनी अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए प्रतिबंधों से राहत चाहता है, वहीं अमेरिका यूक्रेन, ताइवान और अब मिडिल ईस्ट में त्रिकोणीय सैन्य दबाव झेलने के बाद अपने सैन्य संसाधनों को दोबारा सुरक्षित करना चाहता है.

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे रणनीतिक जलमार्ग पर व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा भी इस डील का एक बड़ा हिस्सा है, क्योंकि दुनिया का एक-तिहाई तेल इसी रास्ते से गुजरता है. यदि यह समझौता सफल रहता है, तो इसे इस दशक की सबसे बड़ी कूटनीतिक कामयाबी माना जाएगा. हालांकि, इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू इस डील को लेकर क्या रुख अपनाते हैं. यह देखना अभी बाकी है.

क्योंकि इजरायल हमेशा से ईरान के साथ किसी भी तरह के समझौते का विरोध करता रहा है. लेकिन फिलहाल, वॉशिंगटन और तेहरान के बीच बढ़ रही यह नजदीकी इस बात का साफ संकेत है कि दोनों पक्ष युद्ध की तबाही से थक चुके हैं. अब बंदूकों को छोड़कर बातचीत के जरिए हल निकालने की आखिरी कोशिश में जुटे हैं.

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