ईरान-अमेरिका शांति के टेबल पर जरूर बैठे हैं, लेकिन दोनों ओर से मिसाइलें तनी हुई हैं!

ईरान और अमेरिका की ओमान में शांति वार्ता होनी है. परमाणु समझौते की बहाली पर चर्चा भी होगी. लेकिन एकदूसरे पर भरोसा इतना कम है कि ईरान ने खोर्रमशहर-4 जैसी एडवांस मिसाइलें तैनात कर दी हैं. अमेरिका ने मध्य पूर्व में डिफेंस सिस्टम मजबूत किए हैं. दोनों ओर मिसाइलें तनी हुईं.

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ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अर्घाची (बाएं) ओमान के मस्कट में अधिकारी से मिलते हुए. (Photo: Reuters) ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अर्घाची (बाएं) ओमान के मस्कट में अधिकारी से मिलते हुए. (Photo: Reuters)

ऋचीक मिश्रा

  • नई दिल्ली,
  • 06 फरवरी 2026,
  • अपडेटेड 12:04 PM IST

दुनिया की नजरें इस वक्त ईरान और अमेरिका के बीच चल रही वार्ताओं पर टिकी हैं. ओमान में हो रही इन बातचीतों को परमाणु समझौते की बहाली और क्षेत्रीय तनाव कम करने की दिशा में एक उम्मीद की किरण माना जा रहा है. लेकिन सच्चाई यह है कि शांति की मेज पर बैठते हुए भी दोनों देशों के बीच अविश्वास इतना गहरा है कि मिसाइलें अब भी एक-दूसरे की ओर तनी हुई हैं. 

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ईरान अपनी बैलिस्टिक मिसाइलों को लगातार अपग्रेड कर रहा है, जबकि अमेरिका मध्य पूर्व में अपने सैन्य अड्डों और मिसाइल डिफेंस सिस्टम को मजबूत बनाए हुए है. यह स्थिति 'शांति की बातें, युद्ध की तैयारी' का सटीक उदाहरण है.आइए समझते हैं कि आखिर यह सब हो क्या रहा है.

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परमाणु समझौता और टूटा भरोसा

ईरान और अमेरिका के रिश्ते दशकों से खराब हैं. 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद से दोनों देशों के बीच सीधा राजनयिक संबंध नहीं है. 2015 में बराक ओबामा प्रशासन के समय JCPOA (जॉइंट कॉम्प्रिहेंसिव प्लान ऑफ एक्शन) नामक परमाणु समझौता हुआ था. 

इसके तहत ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम को सीमित करने का वादा किया. बदले में अमेरिका और यूरोपीय देशों ने प्रतिबंध हटाए. लेकिन 2018 में डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने एकतरफा तरीके से समझौते से बाहर निकल गया. ईरान पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए.

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ईरान ने भी समझौते के कई नियम तोड़ने शुरू कर दिए. उसने यूरेनियम संवर्धन की मात्रा और स्तर बढ़ा दिया, जो परमाणु बम बनाने की दिशा में कदम माना जाता है. बाइडेन प्रशासन ने 2021 से समझौते को बहाल करने की कोशिश की, लेकिन बातचीत बार-बार अटक गई. मुख्य मुद्दे हैं – ईरान की मिसाइल कार्यक्रम पर लगाम, क्षेत्रीय मिलिशिया को समर्थन बंद करना और अमेरिका द्वारा सभी प्रतिबंध हटाना.

फरवरी 2026 में ओमान में अप्रत्यक्ष वार्ताएं फिर से शुरू हुई हैं. ओमान लंबे समय से दोनों देशों के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाता रहा है. ये बातचीत गोपनीय हैं, लेकिन सूत्रों के अनुसार परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों में राहत और क्षेत्रीय सुरक्षा पर फोकस है.

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दोनों पक्षों ने सकारात्मक संकेत दिए हैं, लेकिन कोई बड़ा ब्रेकथ्रू नहीं हुआ है. ईरान कहता है कि वह बातचीत के लिए तैयार है, लेकिन अपनी संप्रभुता और रक्षा अधिकारों पर समझौता नहीं करेगा.

ईरान की ओर से तनी मिसाइलें: प्रतिरोध की रणनीति

ईरान की सैन्य ताकत का मुख्य आधार उसका बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम है. हाल ही में IRGC ने खोर्रमशहर-4 मिसाइल की टेस्टिंग की है. जिसकी रेंज 2000 किलोमीटर और वॉरहेड 1500 किलोग्राम है.  यह हाइपरसोनिक स्पीड और मैन्यूवर क्षमता वाली है, जो दुश्मन की डिफेंस को चकमा दे सकती है.  

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ईरान का कहना है कि ये मिसाइलें सिर्फ रक्षा के लिए हैं. वह खुद को इजरायल और अमेरिका के खतरे से घिरा मानता है. अमेरिकी अड्डे सऊदी अरब, UAE, बहरीन, कतर और इराक में हैं, जो ईरान की मिसाइलों की रेंज में हैं. 

ईरान ने अपनी नीति को सक्रिय प्रतिरोध बताया है – यानी अगर हमला हुआ तो तुरंत और मजबूत जवाब. पिछले साल इजराइल के साथ 12 दिनों के युद्ध में ईरान ने सैकड़ों मिसाइलें दागी थीं। उस अनुभव से सीखकर अब वह आक्रामक रुख अपनाने की बात कर रहा है.

ईरान के नेता कहते हैं कि जब तक अमेरिका प्रतिबंध नहीं हटाता और सैन्य धमकी देता रहेगा, तब तक मिसाइल कार्यक्रम नहीं रुकेगा. वार्ता के दौरान भी ईरान ने नई भूमिगत मिसाइल सिटी का अनावरण किया, जो साफ संदेश है कि वह कमजोर नहीं पड़ेगा.

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अमेरिका की ओर से तनी मिसाइलें: क्षेत्रीय गठबंधन और डिफेंस

अमेरिका की ओर से भी मिसाइलें तनी हुई हैं – लेकिन ज्यादातर डिफेंसिव. मध्य पूर्व में उसके हजारों सैनिक और दर्जनों अड्डे हैं. पैट्रियट और THAAD जैसी मिसाइल डिफेंस सिस्टम तैनात हैं, जो ईरान की मिसाइलों को रोक सकती हैं. अमेरिका इजरायल, सऊदी अरब और UAE के साथ मिलकर सेंटकॉम के तहत सैन्य सहयोग करता है.

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ट्रंप के समय मैक्सिमम प्रेशर नीति अपनाई गई थी – प्रतिबंध, हत्यारे ड्रोन हमले (जैसे जनरल सुलेमानी की हत्या). बाइडेन ने बातचीत का रास्ता अपनाया, लेकिन प्रतिबंध बरकरार रखे. अमेरिका ईरान से तीन मुख्य मांगें करता है...

  • परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह सीमित.
  • बैलिस्टिक मिसाइलों पर लगाम.
  • हिजबुल्लाह, हमास और हूती जैसे ग्रुप्स को समर्थन बंद.

अमेरिका का डर है कि ईरान परमाणु बम बना लेगा और क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ेगी. वह इजरायल का पूरा समर्थन करता है, जिसके पास खुद परमाणु हथियार माने जाते हैं. हाल के वर्षों में अमेरिका ने ईरान पर साइबर हमले भी किए और उसके तेल निर्यात को रोका.

क्यों है यह दोहरा खेल?

यह स्थिति अविश्वास की राजनीति है. दोनों पक्ष बातचीत चाहते हैं क्योंकि युद्ध किसी के हित में नहीं. ईरान की अर्थव्यवस्था प्रतिबंधों से बुरी तरह प्रभावित है – महंगाई, बेरोजगारी चरम पर. अमेरिका भी नहीं चाहता कि मध्य पूर्व में नया युद्ध छिड़े, जो तेल कीमतें बढ़ाएगा और उसकी घरेलू राजनीति प्रभावित करेगा.

लेकिन अविश्वास इतना गहरा है कि दोनों तैयारी छोड़ना नहीं चाहते. ईरान को डर है कि अमेरिका कभी भी हमला कर सकता है. अमेरिका को डर है कि ईरान छिपकर परमाणु बम बना लेगा. इजरायल लगातार ईरान पर हमले की धमकी देता रहता है.

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आगे क्या हो सकता है?

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर वार्ताएं सफल हुईं तो एक नया समझौता हो सकता है – प्रतिबंधों में राहत के बदले ईरान का परमाणु कार्यक्रम सीमित. लेकिन मिसाइल कार्यक्रम पर समझौता मुश्किल है. अगर बातचीत टूट गई तो तनाव बढ़ सकता है – साइबर हमले, प्रॉक्सी युद्ध या सीधा टकराव.

दुनिया भर के देश (चीन, रूस, यूरोप) चाहते हैं कि समझौता हो, क्योंकि इससे तेल कीमतें स्थिर रहेंगी और क्षेत्रीय स्थिरता बनी रहेगी. लेकिन फिलहाल स्थिति नाजुक है. शांति की मेज पर बैठे दोनों पक्ष एक-दूसरे पर नजर रखे हुए हैं. मिसाइलें अभी भी तनी हुई हैं.

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