आधुनिक युद्ध के मैदान में ड्रोन तकनीक और लोइटरिंग म्यूनिशन की बढ़ती भूमिका को देखते हुए भारतीय वायु सेना (IAF) ने रक्षा क्षेत्र में एक बेहद क्रांतिकारी और बड़ा कदम उठाया है. वायु सेना ने भारतीय उद्योग जगत के साझेदारों के साथ मिलकर संयुक्त रूप से स्वदेशी लंबी दूरी के 'कामिकेज ड्रोन'विकसित करने की एक मेगा परियोजना शुरू की है.
इन ड्रोनों को 'वन-वे अटैक अनमैन्ड एरियल सिस्टम' (OWA-UAS) यानी एकतरफा हमला करने वाली मानव रहित प्रणाली भी कहा जाता है. इस परियोजना का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि भारतीय वायु सेना इस बार केवल एक खरीदार के रूप में काम नहीं करेगी, बल्कि ड्रोन के पूरे डिजाइन और बौद्धिक संपदा अधिकारों पर अपना पूर्ण नियंत्रण बनाए रखेगी.
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वायु सेना ने इस हाई-टेक परियोजना के लिए चुनिंदा भारतीय कंपनियों को एक सीमित निविदा पूछताछ जारी कर दी है. इस पूरे प्रोजेक्ट के समन्वय और देखरेख की जिम्मेदारी तमिलनाडु के कोयम्बटूर में स्थित वायु सेना के 5 बेस रिपेयर डिपो सुलूर को सौंपी गई है, जो इस परियोजना के लिए मुख्य नोडल एजेंसी के रूप में काम करेगा.
यह पहला मौका है जब वायु सेना खुद निर्माण प्रक्रिया के हर स्तर पर सीधे तौर पर शामिल हो रही है, जिससे भविष्य में किसी भी बाहरी वेंडर या विदेशी तकनीक पर भारत की निर्भरता पूरी तरह खत्म हो जाएगी.
वायु सेना खुद संभालेगी डिजाइन और IPR की कमान
आमतौर पर रक्षा क्षेत्र में होने वाली खरीदारियों में सशस्त्र बल केवल अपनी जरूरतें तय करते हैं और निजी या सरकारी उद्योग उस उत्पाद को विकसित करते हैं. लेकिन इस बार वायु सेना ने अपनी रणनीति पूरी तरह बदल दी है. इस परियोजना के तहत वायु सेना सीधे तौर पर डिजाइन और विकास प्रक्रिया का हिस्सा बनने जा रही है.
डिजाइन का मालिकाना हक खुद के पास होने से वायु सेना को भविष्य में अपनी बदलती परिचालन आवश्यकताओं के अनुसार ड्रोन में कोई भी संशोधन, अपग्रेड या कस्टमाइजेशन करने की पूरी आजादी होगी.
इसके लिए भारत को किसी विदेशी वेंडर या निजी कंपनी के आगे हाथ नहीं फैलाना पड़ेगा और न ही उनकी वेंडर-नियंत्रित तकनीकों के कारण काम रुकेगा. यह रणनीतिक स्वायत्तता युद्ध के समय भारतीय वायु सेना को दुश्मनों के मुकाबले कहीं अधिक तेज और सटीक क्षमता संवर्द्धन की शक्ति प्रदान करेगी.
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16,000 फीट की ऊंचाई और 30 किलो का वॉरहेड
वायु सेना द्वारा जारी तकनीकी आवश्यकताओं के अनुसार, यह कामिकेज ड्रोन तकनीकी रूप से दुनिया के बेहतरीन ड्रोनों को टक्कर देगा. इसे फिक्स्ड-विंग यानी विमान जैसे पंखों वाले फॉर्मेट में तैयार किया जा रहा है.
यह प्रणाली पूरी तरह से ऑटोनॉमस होगी. यह ड्रोन खुद से लॉन्च होने, वेपॉइंट्स (रास्तों) के जरिए नेविगेट करने, दुश्मन के इलाके के ऊपर मंडराने और मानवीय हस्तक्षेप के बिना खुद ही मिशन को अंजाम देने की क्षमता रखेगा. कुछ विशेष मिशनों की जरूरत को देखते हुए इसमें 'रिटर्न-टू-बेस' की तकनीक भी शामिल की जा सकती है.
चीनी पार्ट्स पर पूर्ण प्रतिबंध
वैश्विक भू-राजनीति और सुरक्षा चिंताओं को ध्यान में रखते हुए भारतीय वायु सेना ने इस निविदा में एक बेहद सख्त और अनिवार्य शर्त रखी है. इस ड्रोन को पूरी तरह से भारत में डिजाइन, विकसित और निर्मित किया जाना आवश्यक है, जिसमें स्वदेशी कंपोनेंट्स को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाएगी.
सबसे बड़ी बात यह है कि इस ड्रोन के निर्माण में चीन के मूल की किसी भी तकनीक, स्पेयर पार्ट्स या सामग्रियों का उपयोग पूरी तरह से प्रतिबंधित होगा.
वायु सेना का यह कड़ा रुख भारत की सैन्य प्रणालियों को साइबर हमलों, जासूसी और तकनीकी छेड़छाड़ से बचाने के लिए एक सुरक्षित और विश्वसनीय राष्ट्रीय आपूर्ति श्रृंखला सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया है.
यह पूरी पहल न केवल देश के घरेलू रक्षा-औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र को एक नई ऊर्जा देगी, बल्कि भविष्य के डिजिटल और रोबोटिक युद्धक्षेत्रों के लिए भारतीय वायु सेना को एक अत्यधिक स्केलेबल और घातक मारक क्षमता भी प्रदान करेगी.
शिवानी शर्मा