दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री रास्तों में से एक है स्ट्रेट ऑफ होर्मुज. यहां से दुनिया का करीब 20-21 प्रतिशत तेल गुजरता है. अप्रैल 2026 में अमेरिका ने ईरान के बंदरगाहों पर नौसैनिक ब्लॉकेड लगा दिया है. इसके बाद चीन और अमेरिका के बीच तनाव बढ़ता नजर आ रहा है. चीन को तेल की जरूरत के लिए होर्मुज पर निर्भर रहना पड़ता है. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि समंदर में चीन कितना पावरफुल है?
समंदर में चीन की नौसेना: संख्या में दुनिया नंबर 1
चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी नेवी यानी PLAN दुनिया की सबसे बड़ी नौसेना है. ग्लोबल फायरपावर इंडेक्स 2026 के अनुसार चीन के पास कुल 841 युद्धपोत हैं. यह संख्या रूस (747) और अमेरिका (465) से कहीं ज्यादा है. चीन ने पिछले 10-15 सालों में तेजी से नई पनडुब्बियां, डेस्ट्रॉयर और फ्रिगेट बनाए हैं. उसके पास 3 एयरक्राफ्ट कैरियर हैं. 4 हेलीकॉप्टर कैरियर भी हैं.
कुल 61 पनडुब्बियां हैं जिनमें कुछ परमाणु ऊर्जा से चलने वाली भी शामिल हैं. चीन के पास 53 डेस्ट्रॉयर, 46 फ्रिगेट और करीब 50 कॉर्वेट हैं. नौसेना में सक्रिय नाविकों की संख्या करीब 2.5 लाख से ज्यादा है. चीन की नौसेना मुख्य रूप से एशिया-पैसिफिक क्षेत्र में मजबूत है.
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वह दक्षिण चीन सागर में अपने दावों को मजबूती से रखती है. लेकिन ग्लोबल स्तर पर यानी पूरी दुनिया में युद्ध लड़ने की क्षमता अभी भी सीमित है क्योंकि उसके पास उतने बड़े कैरियर स्ट्राइक ग्रुप नहीं हैं जितने अमेरिका के पास हैं.
ग्लोबल पावर इंडेक्स: US-चीन नौसेना की तुलना
अगर ग्लोबल फायरपावर इंडेक्स 2026 की बात करें तो संख्या में चीन आगे है लेकिन क्वालिटी, टेक्नोलॉजी और ग्लोबल पहुंच में अमेरिका अभी भी काफी मजबूत है. अमेरिका की नौसेना के पास कुल 465 युद्धपोत हैं लेकिन इनका कुल टनेज (वजन) 82 लाख टन से ज्यादा है जबकि चीन का सिर्फ 31 लाख टन.
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अमेरिका के पास 11 एयरक्राफ्ट कैरियर हैं जो दुनिया में सबसे ज्यादा हैं. ये सुपर कैरियर पूरी दुनिया में अमेरिका की ताकत दिखाते हैं. अमेरिका के पास 9 हेलीकॉप्टर कैरियर भी हैं. कुल 66 पनडुब्बियां हैं जिनमें ज्यादातर परमाणु ऊर्जा वाली हैं. अमेरिका के पास करीब 50 से ज्यादा परमाणु पनडुब्बियां हैं जबकि चीन के पास अभी सिर्फ 6-8 परमाणु पनडुब्बियां हैं. अमेरिका के पास 83 डेस्ट्रॉयर हैं जबकि चीन के 53.
नौसैनिकों की संख्या अमेरिका में करीब 3 लाख से ज्यादा है. कुल मिलाकर नौसेना की क्षमता में अमेरिका अब भी नंबर 1 माना जाता है क्योंकि उसके जहाज ज्यादा आधुनिक, ज्यादा ताकतवर और पूरी दुनिया में कहीं भी जाकर लड़ने लायक हैं. चीन संख्या में आगे है लेकिन अमेरिका की नौसेना की क्वालिटी और अनुभव ज्यादा है.
होर्मुज स्ट्रेट पर बढ़ता तनाव: अमेरिका ने ब्लॉकेड क्यों लगाया?
फरवरी 2026 से अमेरिका और इजरायल के साथ ईरान का संघर्ष चल रहा है. अप्रैल 2026 में पाकिस्तान में अमेरिका-ईरान की शांति बातचीत फेल हो गई. इसके बाद अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने होर्मुज स्ट्रेट में ईरानी बंदरगाहों आने-जाने वाले सभी जहाजों पर नौसैनिक ब्लॉकेड लगा दिया.
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अमेरिका का कहना है कि ईरान ने समंदर में बारूदी सुरंगें बिछाई हैं. तेल के रास्ते को बंद करने की कोशिश की है. इसलिए अमेरिकी नौसेना अब बारूदी सुरंगें साफ करने और सुरक्षित रास्ता बनाने का काम कर रही है. चीन इस ब्लॉकेड से सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहा है क्योंकि चीन ईरान से सबसे ज्यादा तेल खरीदता है.
चीन ने इसे अंतरराष्ट्रीय व्यापार के खिलाफ बताया है और शांति की अपील की है. दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ रहा है लेकिन अभी तक कोई सीधा सैन्य टकराव नहीं हुआ है.
चीन और अमेरिका की तैनाती: कितने जहाज और कहां?
अप्रैल 2026 में अमेरिका की तैनाती काफी मजबूत है. 11 अप्रैल को दो अमेरिकी गाइडेड मिसाइल डेस्ट्रॉयर USS फ्रैंक ई. पीटरसन और USS माइकल मर्फी ने पहली बार होर्मुज स्ट्रेट पार किया. ये जहाज पर्सियन गल्फ में गए और अब बारूदी सुरंगें साफ करने का काम शुरू कर दिया है. अमेरिका की 5वीं फ्लीट पूरे क्षेत्र में सक्रिय है.
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बहरीन में इसका मुख्यालय है. पर्सियन गल्फ, अरब सागर और होर्मुज के आसपास कुल 10 से 20 से ज्यादा युद्धपोत तैनात हैं. इनमें 1-2 एयरक्राफ्ट कैरियर स्ट्राइक ग्रुप भी शामिल हैं जैसे अब्राहम लिंकन कैरियर ग्रुप. पहले से ही 18 युद्धपोत क्षेत्र में थे. अब और बढ़ाए गए हैं. चीन की तैनाती ज्यादा बड़ी नहीं है.
मार्च 2026 में चीन ने जिबूती बेस से अपना 48वां फ्लीट भेजा था. इसमें टाइप 052DL डेस्ट्रॉयर तांगशान, टाइप 054A फ्रिगेट दाकिंग और सप्लाई शिप ताइहू शामिल थे. ये मुख्य रूप से संयुक्त अभ्यास के लिए थे. अपने तेल टैंकरों की सुरक्षा के लिए. अभी अप्रैल 2026 में चीन का कोई बड़ा फ्लीट होर्मुज में नहीं दिख रहा है. चीन मुख्यतः डिप्लोमेसी और बातचीत पर जोर दे रहा है.
क्या दोनों नौसेनाएं आमने-सामने आएंगी?
फिलहाल दोनों नौसेनाओं के बीच सीधा टकराव की संभावना कम है. अमेरिका का फोकस मुख्य रूप से ईरान पर है. चीन ब्लॉकेड को गलत बता रहा है लेकिन वो डायरेक्ट युद्ध नहीं चाहता क्योंकि उसकी अर्थव्यवस्था पर असर पड़ेगा. अगर अमेरिका चाइनीज टैंकरों को रोकने की कोशिश करता है तो तनाव और बढ़ सकता है.
चीन ने चेतावनी दी है कि वैश्विक हितों को खतरा है. लेकिन दोनों देश जानते हैं कि पूरा पैमाना US vs China युद्ध तक पहुंचने से दोनों को बहुत नुकसान होगा. चीन डिप्लोमेसी और आर्थिक दबाव का रास्ता चुन रहा है. अमेरिका भी चीन के साथ सीधा टकराव टालना चाहता है. इसलिए अभी दोनों नौसेनाएं होर्मुज में आमने-सामने आने की बजाय नजर रख रही हैं. लेकिन स्थिति बदलती रहती है.
अगर ब्लॉकेड लंबा चला तो तनाव और बढ़ सकता है. समुद्र में चीन संख्या में बहुत ताकतवर है लेकिन अमेरिका की नौसेना अभी भी ग्लोबल पावर के मामले में आगे है. होर्मुज का तनाव पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर रहा है.
ऋचीक मिश्रा