जम्मू-कश्मीर में एक बड़ी पर्यावरणीय आपदा आ रही है. नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (CAG) की नई रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि यहां की प्राकृतिक झीलें तेजी से खत्म हो रही हैं. 1967 से अब तक कुल 2851 हेक्टेयर झील क्षेत्र गायब हो चुका है. रिपोर्ट में साफ कहा है कि प्रशासन की लापरवाही, प्रदूषण और सरकारी विभागों की उदासीनता की वजह से यह संकट गहरा रहा है.
जम्मू-कश्मीर में कुल 697 प्राकृतिक झीलें थीं. इनमें से 315 झीलें पूरी तरह खत्म हो चुकी हैं. यानी 45 प्रतिशत झीलें अब अस्तित्व में नहीं हैं. इसके अलावा 203 झीलों का आकार काफी छोटा हो गया है. इनमें से 63 झीलों ने अपनी आधी से ज्यादा जगह खो दी है. वे विलुप्त होने के कगार पर पहुंच गई हैं.
2014 के भयानक बाढ़ से सीधा संबंध
सीएजी रिपोर्ट में साफ लिखा है कि झीलों के छोटे होने और गायब होने की वजह से 2014 में सितंबर की भयानक बाढ़ आई. झीलें प्राकृतिक रूप से बाढ़ को रोकने का काम करती हैं. इन्हें धरती की आंखें कहा जाता है. इनके नष्ट होने से कश्मीर घाटी का प्राकृतिक बचाव तंत्र पूरी तरह बर्बाद हो गया.
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रिपोर्ट में कई सरकारी विभागों की लापरवाही को सामने लाया गया है. जंगल, राजस्व, कृषि, आवास और पर्यटन विभागों के बीच जिम्मेदारी बंटी हुई है, लेकिन कोई भी विभाग ठीक से काम नहीं कर रहा. रिपोर्ट में इसे लापरवाह रवैया बताया गया है.
साल 2000 में ही झीलों की सुरक्षा के लिए एक केंद्रीय प्राधिकरण बनाने का ड्राफ्ट बिल तैयार कर लिया गया था. लेकिन 22 साल बीत जाने के बाद भी जम्मू-कश्मीर सरकार इसे कानून नहीं बना पाई. इस वजह से कोई मजबूत नियम-कानून नहीं बन सका.
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केवल 6 झीलों की देखभाल, बाकी 691 पर ध्यान नहीं
रिपोर्ट के अनुसार केवल छह प्रमुख झीलों - डल, वुलर, होकरसर, मानसबल, सुरिनसर और मानसर- के लिए ही रिस्टोरेशन प्रोग्राम चलाए गए. बाकी 691 झीलों के लिए न तो कोई संरक्षण योजना बनी. न ही कोई फंडिंग दी गई.
पर्यावरण और रिमोट सेंसिंग विभाग ने 31 साल में 697 झीलों में से किसी का भी जैविक या रासायनिक सर्वे नहीं किया. बिना वैज्ञानिक डेटा के झीलों को बचाना असंभव हो गया. वेटलैंड नियमों का उल्लंघन करते हुए सरकारी विभागों ने खुद 712 हेक्टेयर झील की जमीन दूसरे विभागों को ट्रांसफर कर दी. इस जमीन पर दफ्तर, आवासीय क्वार्टर और स्कूल बनाए गए.
झीलें बन गईं नाला, वुलर झील 45 प्रतिशत सिकुड़ी
63 झीलों के पानी की जांच में से 50 झीलों में बिना ट्रीटमेंट के सीवेज घुस रहा है। इससे झीलें गंदे तालाब में बदल रही हैं। श्रीनगर की प्रसिद्ध डल झील में भी सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट ठीक से काम नहीं कर रहे। कुछ प्लांट इतने खराब हैं कि वे पानी में नाइट्रेट की मात्रा और बढ़ा रहे हैं।
भारत की सबसे बड़ी मीठे पानी की झील वुलर पिछले सौ साल में करीब 45 प्रतिशत सिकुड़ चुकी है. निगरानी समिति कभी गठित ही नहीं की गई, जिससे केंद्र से मिलने वाला फंड भी नहीं आया. वेटलैंड्स की रानी कहलाने वाली होकरसर झील का सीमाकंन तक नहीं हुआ. इस वजह से 2528 कनाल से ज्यादा क्षेत्र पर अतिक्रमण हुआ.
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सीएजी ने सिफारिश की है कि पांच अलग-अलग विभागों की बजाय एक केंद्रीय विकास और नियामक प्राधिकरण बनाया जाए. झीलों को सिर्फ जमीन नहीं, बल्कि वैज्ञानिक पारिस्थितिकी तंत्र मानकर संरक्षित किया जाए. रिपोर्ट चेतावनी देती है कि अगर बजट में भारी बढ़ोतरी नहीं की गई (वर्तमान में सिर्फ 1 प्रतिशत कैपेक्स बजट झीलों पर खर्च होता है) और नीतिगत बदलाव नहीं किया गया तो बची हुई झीलें भी जल्दी ही गायब हो जाएंगी.
मीर फरीद