अंधा कुआं, 96 घंटे और जिंदगी की जंग! ऐसे एक चमत्कार ने बचाई एक नौजवान की जान, हैरान कर देगी कहानी

ओडिशा के तुलसीराम बरिहा को दोस्तों ने पहले लूटा और फिर जमकर पीटा. बाद में उसे मरा समझकर अंधे कुएं में फेंक दिया. मगर कुदरत को कुछ और ही मंजूर था. 96 घंटे बाद उस कुएं में एक रेस्क्यू ऑपरेशन किया गया. इसके बाद जो हुआ, उसने सबको हैरान कर दिया. पढ़ें पूरी कहानी.

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तुलसीराम की कहानी सुनकर हर कोई हैरान है (फोटो-ITG) तुलसीराम की कहानी सुनकर हर कोई हैरान है (फोटो-ITG)

aajtak.in

  • भुवनेश्वर/बरगढ़,
  • 16 जून 2026,
  • अपडेटेड 5:38 PM IST

जिंदगी में जब इंसान पर आफत आती है. वो निराश या परेशान होता है. या फिर जब इंसान हर तरफ से टूट जाता है, तो एक ऊपर वाले का नाम और उम्मीद की डोर ही उसे आखिर तक लड़ने का हौसला देती है. यही हौसला उसे मुश्किलों से निकलने की ताकत देता है. फिर चाहे उसकी परेशानी कितनी भी बड़ी हो. कुछ ऐसी ही कहानी है ओडिशा में बरगढ़ जिले के नौजवान तुलसीराम बरिहा की. जिसे सुनकर दिल दहल जाता है.

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एक शख्स ने मोबाइल में कुछ तस्वीरें कैद की. तस्वीर आखिरी उम्मीद की. तस्वीरों में एक अनजान शख्स करीब 20 फीट गहरे कुएं में पिंडलियों तक कीचड़ से सने पानी में खड़ा है. उस शख्स को देख कर वैसे तो असलियत का सही-सही अंदाजा लगाना मुश्किल है, लेकिन जब आप उस आदमी की आपबीती सुनेंगे, तो रौंगटे खड़े हो जाएंगे. क्या आप यकीन करेंगे कि तुलसीराम नाम का वो नौजवान एक सुनसान इलाके में मौजूद एक अंधे कुएं में कोई घंटे-दो घंटे नहीं, बल्कि पूरे चार दिनों तक खड़ा रहा. जी हां, पूरे चार दिनों तक. यानी कुल 96 घंटे. 

ज़रा सोचिए इस भयानक गर्मी में जब इंसान के लिए बगैर दाना-पानी के चंद घंटे भी निकालना मुश्किल हो रहा हो, तब बगैर खाए पिए सोये या बैठे वो पूरे चार दिनों तक एक कुएं की गहराई में खड़ा रहा. और हर गुजरते घंटे के साथ उसकी उम्मीद की डोर कमजोर पड़ती रही. चूंकि कुएं के आस-पास दूर-दूर तक कोई आबादी नहीं थी, तो कुएं में गिरने के कुछ ही देर बाद उसकी उम्मीद भी टूटने लगी थी. 

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असल में कुएं में गिरने के बाद उसने पहले मदद के लिए जोर-जोर से आवाज लगाने की शुरुआत की. वो चीखा.. चिल्लाया. देर तक बचाओ-बचाओ का शोर मचाता रहा. लेकिन यहां सुनने वाला कोई नहीं था. उसकी उम्मीद की डोर बेशक टूटती जा रही थी, उसने ऊपरवाले पर आस्था की डोरी थामे रखी और लगातार भगवान को याद करता रहा. ये सिलसिला तकरीबन 96 घंटों तक यूं ही चला. 

और तब पूरे चार दिनों के बाद एकाएक करिश्मा हुआ. असल में इत्तेफाक से चार दिनों के बाद एक इलाकाई शख़्स वहां जलावन के लिए लकड़ियां बटोरने पहुंचा और उसके कानों में हे भगवान, हे भगवान की आवाज पड़ी. आवाज कुएं के अंदर से आ रही थी. इसके बाद तो उसने जो कुछ देखा उसे यकीन ही नहीं हुआ. उसने देखा कि कुएं में एक नौजवान पिंडलियों तक गंदे पानी में खड़ा मदद के लिए कातर निगाहों से ऊपर ताक रहा है.

अब जल्द ही बात पहले पास के गांव तक, फिर पुलिस तक और तब रेसक्यू वर्कर्स तक जा पहुंची. अगले चंद घंटों में तुलसीराम कुएं और पानी से बाहर आ चुका था. लेकिन चार दिनों तक पानी में भूखे, प्यासे, बगैर सोए खड़े-खड़े तुलसी राम की हालत अब ऐसी हो चुकी थी कि उसे अपना ही होश नहीं था. अपने कदमों पर खड़ा होना तो दूर की बात थी. 

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लिहाज़ा कुएं से बाहर आते ही वो निढाल हो कर पहले जमीन पर बैठ गया और फिर लेट गया. इसके बाद उसे स्ट्रेचर के सहारे अस्पताल तक ले जाया गया. जहां उसका इलाज शुरू हुआ. लेकिन चार दिनों की ये त्रासदी ऐसी थी कि वो अपनी मर्जी से अपना हाथ तक ऊपर नहीं उठा पा रहा था. ऊपर से चार दिनों तक कीचड़ भरे गंदे पानी में डूबे उसके पैर अब इन्फेक्शन का शिकार हो चुके थे.

ये तो रही उस नौजवान के अंधे कुएं में गिरने और चार दिनों के बाद उसके रेस्क्यू की कहानी. अब सवाल ये था कि आखिर तुलसीराम उस कुएं में कैसे पहुंचा तो जवाब है कुएं में किसी हादसे की वजह से नहीं बल्कि दोस्तों की गद्दारी के चलते पहुंचा. 

7 जून 2026 
यही वो तारीख थी, जिस दिन तुलसीराम अपने कुछ दोस्तों के साथ पार्टी करने निकला था. और सभी दोस्त बीजेपुर ब्लॉक के उस सुनसान कुएं के पास गए थे. लेकिन पीने-पिलाने के बाद उसके दोस्तों ने ही तुलसीराम के साथ गद्दारी की. पहले शराब के नशे में दोस्तों ने तुलसीराम के साथ लूटपाट की और उसे बुरी तरह पीटा गया. कुछ इतना पीटा कि तुलसीराम बेहोश हो गया. यही वो वक्त था, जब गद्दार दोस्तों को लगा कि शायद तुलसीराम की मौत हो गई है. बस, इसी के बाद दोस्तों ने तुलसीराम की लाश ठिकाने लगाने के इरादे से उसे उठा कर इस सुनसान इलाके में मौजूद अंधे कुएं में फेंक दिया. एक ऐसा कुआं जिसका सालों से कोई इस्तेमाल नहीं हुआ.

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कुएं के पानी में गिरते ही तुलसीराम को होश तो आ गया, लेकिन तब तक उसके गद्दार दोस्त फरार हो चुके थे. जबकि दूर-दूर तक उस इलाके में और कोई भी नहीं था. ऐसे में तुलसीराम की खुद के जिंदा रहने की उम्मीद भी खत्म होने लगी थी. ऐसे में उसके पास सिवाय ऊपरवाले को याद करने और मदद के लिए चीखने-चिल्लाने के सिवाय और कोई रास्ता ही नहीं था. 

लेकिन सच्चाई यही है कि वो मदद के लिए रोता-चिल्लाता रहा और एक-एक कर घंटे और दिन गुजरते रहे. हर लम्हे के साथ वो कमजोर, बीमार और हताश होता जा रहा था. लेकिन आखिरकार वो हुआ, जिसे करिश्मा ही कहा जाएगा. पास के एक गांव वाले ने एकाएक उसकी आवाज सुनी और चंद घंटों में तुलसीराम बाहर आ गया. फिलहाल, पुलिस ने तुलसीराम के गद्दार दोस्तों को कत्ल की कोशिश के इल्जाम में गिरफ्तार कर लिया है. अब तुलसीराम का इलाज चल रहा है, वो खतरे से बाहर है और उसके गद्दार दोस्त सलाखों के पीछे. लेकिन इस वारदात ने हर किसी को हैरान परेशान कर दिया है.

(अजय नाथ का इनपुट)

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