आते-आते 4 महीने लग गए, विदेशी निवेशकों के भारतीय बाजार में लौटने के पीछे ये 3 कारण

जुलाई के शुरुआती 10 दिनों में ही FPI ने भारतीय बाजार में करीब 24,662 करोड़ की भारी-भरकम पूंजी झोंक दी है, जिसमें से केवल इक्विटी में 15,157 करोड़ रुपये का निवेश आया है.

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भारतीय बाजार को लेकर विदेशी निवेशकों का बदला नजरिया. (Photo: ITG) भारतीय बाजार को लेकर विदेशी निवेशकों का बदला नजरिया. (Photo: ITG)

अमित कुमार दुबे

  • नई दिल्ली,
  • 14 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 3:42 PM IST

भारतीय शेयर बाजार में एक बार फिर 'बुल रन' की आहट सुनाई दे रही है. वैसे तो बाजार के लिए साल 2026 काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा है. लेकिन लगता है कि जुलाई के महीने में इंतजार खत्म होने वाला है. विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPI) इस महीने बाजार में बड़े खरीदार बनकर लौटे हैं.

दरअसल, पिछले चार महीनों से लगातार चौतरफा बिकवाली करने के बाद विदेशी निवेशकों ने जुलाई में अच्छी-खासी खरीदारी की है. जुलाई के शुरुआती 10 दिनों में ही FPI ने भारतीय बाजार में करीब 24,662 करोड़ की भारी-भरकम पूंजी झोंक दी है, जिसमें से केवल इक्विटी में 15,157 करोड़ रुपये का निवेश आया है.

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इससे पहले वैश्विक तनाव, हाई वैल्यूएशन और वैश्विक बाजारों में मची उथल-पुथल के कारण विदेशी निवेशक लगातार भारतीय बाजार से अपना पैसा निकाल रहे थे, जिससे घरेलू शेयर बाजारों पर भारी दबाव बना हुआ था. लेकिन जुलाई 2026 के आंकड़ों ने बाजार के सेंटिमेंट को पूरी तरह से बदल दिया है. पिछले हफ्ते लगातार कई दिनों के बाजार में तेजी देखने को मिली. इसके पीछे विदेशी निवेशकों की खरीदारी खास वजह रही है.  

क्यों बदला मूड?
ग्लोबल मार्केट्स में सेमीकंडक्टर शेयरों में आई गिरावट और भारतीय बॉन्ड मार्केट में सरकार की ओर से दी गई टैक्स और नीतिगत छूट ने विदेशी फंड्स का रुख दोबारा भारत की तरफ मोड़ दिया है. मजबूत भारतीय अर्थव्यवस्था ने भी विदेशों को निवेशकों को भारत लौटने के लिए मजबूर कर दिया है. 

इससे पहले फरवरी 2026 में विदेशी निवेशकों ने 22,615 करोड़ रुपये की खरीदारी की थी. फरवरी के बाद से विदेशी निवेशक पूरी तरह से बिकवाली के मूड में आ गए. मार्च- 2026 से जून- 2026, लगातार चार महीने भारतीय शेयर बाजार के इतिहास में विदेशी निवेशकों की सबसे आक्रामक और बड़ी बिकवाली के गवाह बने. आंकड़ों के मुताबिक, इन 4 महीनों में विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से करीब 2.60 लाख करोड़ रुपये निकाल डाले. विदेशी निवेशकों ने जून में 49,340 करोड़ रुपये, मई में 32,963 करोड़ रुपये और अप्रैल में 60,847 करोड़ रुपये की बिकवाली की थी. सबसे ज्यादा मार्च में करीब 1.17 लाख करोड़ रुपये निकाले थे. 
 
विदेशी निवेशकों के भारत लौटने के तीन मुख्य कारण

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ग्लोबल सेमीकंडक्टर और एआई स्टॉक्स में दबाव
पिछले कई महीनों से वैश्विक निवेशकों का पूरा ध्यान अमेरिका, ताइवान और दक्षिण कोरिया के सेमीकंडक्टर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से जुड़े एसेट-क्लास पर केंद्रित था. लेकिन पिछले कुछ दिनों में ताइवान और दक्षिण कोरिया के चिप मैन्युफैक्चरिंग और सेमीकंडक्टर शेयरों में बड़ी गिरावट और अस्थिरता देखने को मिली. जिसके बाद ग्लोबल फंड्स ने अपना जोखिम कम करने के लिए वहां से मुनाफावसूली की और एक स्थिर, लंबी अवधि वाले बाजार की तलाश में अपना रुख दोबारा भारत की तरफ कर लिया है. 

बॉन्ड मार्केट में टैक्स छूट और रुपये में सुधार
विदेशी निवेशकों को लुभाने के लिए भारत सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक ने घरेलू ऋण बाजार को बेहद आकर्षक बना दिया है. सरकार ने सॉवरेन बॉन्ड तक FPI की पहुंच आसान करने के साथ-साथ टैक्स से जुड़ी कई अड़चनों को दूर किया, जिससे भारतीय बॉन्ड में निवेश पर मिलने वाले ब्याज को टैक्स-फ्री जैसी राहतें मिलीं. इसके साथ ही मजबूत माइक्रो इकोनॉमी संकेत मिलने से भारतीय रुपया भी अमेरिकी डॉलर के मुकाबले थोड़ा स्थिर हुआ है, जिससे विदेशी निवेशकों का करेंसी रिस्क कम हो गया है. 

लगातार गिरावट से आकर्षक भारतीय बाजार
पिछले 4 महीनों की लगातार बिकवाली के कारण भारतीय शेयर बाजार में एक अच्छा-खासा सुधार देखने को मिला. इस कंसॉलिडेशन की वजह से कई मजबूत फंडामेंटल वाली भारतीय कंपनियों और खासकर लार्जकैप शेयरों के वैल्यूएशन अब काफी रीजनेबल और आकर्षक स्तर पर आ गए हैं. एक्सपर्ट्स का मानना है कि भारत का दूसरे इमर्जिंग मार्केट्स के मुकाबले जो प्रीमियम वैल्यूएशन था, वह ऐतिहासिक रूप से निचले स्तर पर आ चुका है, जिसने FPIs को चुनिंदा खरीदारी करने के लिए प्रेरित किया. 

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किन सेक्टर्स पर विदेशी निवेशक लगा रहे दांव?
जुलाई 2026 के आंकड़ों और बाजार विश्लेषकों की मानें तो विदेशी निवेशक इस बार बहुत ही चुनिंदा और लंबी अवधि का नजरिया रखकर विकास वाले सेक्टर्स पर दांव लगा रहे हैं. वैश्विक ब्रोकरेज फर्म्स के मुताबिक, चूंकि कोरिया और ताइवान के बाजार अस्थिर हैं, इसलिए भारत में आने वाले विदेशी फंड का एक बहुत बड़ा हिस्सा वित्तीय सेवाओं और बैंकिंग सेक्टर में जा रहा है. लार्जकैप बैंकों में पिछले दिनों विदेशी हिस्सेदारी दशक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई थी, जिससे अब वहां रोटेशन के जरिए खरीदारी हो रही है.

विदेशी निवेशक भारत की कैपेक्स और ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ी कहानी पर बेहद बुलिश हैं. वे पावर और यूटिलिटी सेक्टर्स को प्रीमियम एसेट मानकर लगातार पोर्टफोलियो में शामिल कर रहे हैं. रियल्टी और कंज्यूमर ड्यूरेबल्स भी विदेशी निवेशकों के लिए चुनिंदा सेक्टर्स हैं. वहीं फिलहाल विदेशी निवेशक आईटी सेक्टर से दूरी बनाए हुए हैं. 

क्या यह वापसी टिकाऊ है? 
जब मार्च से जून के बीच विदेशी निवेशक अंधाधुंध बिकवाली कर रहे थे, तब भारतीय बाजार क्रैश नहीं हुआ. इसका कारण हमारे घरेलू म्यूचुअल फंड्स, एलआईसी और आम रिटेल निवेशकों की एसआईपी की ताकत थी. घरेलू संस्थागत निवेशकों ने इस साल के शुरुआती 6 महीने में करीब 4.3 लाख करोड़ रुपये की खरीदारी करके विदेशी बिकवाली के दबाव को बिल्कुल कम कर दिया था.  

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अब जबकि घरेलू निवेशक पहले से ही बाजार को थामे हुए हैं, ऐसे में विदेशी निवेशकों की ये वापसी शेयर बाजार के लिए सोने पर सुहागा जैसा है. विश्लेषकों का मानना है कि वैश्विक फंड्स के पास भारतीय इक्विटी में एक्सपोजर बढ़ाने की अभी काफी जगह बची है, इसलिए आने वाले महीनों में यह निवेश और गति पकड़ सकता है. 

हालांकि, इस वापसी का पूरी तरह टिकाऊ होना कुछ वैश्विक फैक्टर्स पर निर्भर करेगा. खासकर अमेरिका में ब्याज दरों की कटौती को लेकर फेडरल रिजर्व का रुख क्या रहता है. भारतीय कंपनियों की पहली तिमाही के नतीजे भी एक कारक हैं. इसके अलावा सबसे अहम मिडिल-ईस्ट में मौजूदा हालात क्या रूप लेता है.

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