लंदन को दुनिया के सबसे जीवंत और पसंदीदा शहरों में गिना जाता है, लेकिन इसके बावजूद बीते कुछ समय में हजारों लोग इसे छोड़कर जा रहे हैं. रिपोर्ट्स के मुताबिक चार दशकों में यह केवल तीसरा मौका है जब लंदन की कुल आबादी में गिरावट देखी गई है. शहर से दूरी बनाने वालों में सबसे बड़ी संख्या 30 से 40 वर्ष की उम्र के उन कामकाजी युवाओं और परिवारों की है, जो बेहतर जिदगी की तलाश में यहां से बाहर रुख कर रहे हैं.
आमतौर पर माना जाता है कि महंगे शहरों में भारी टैक्स या बढ़ता अपराध लोगों के पलायन की वजह बनते हैं, लेकिन लंदन के मामले में ऐसा नहीं है. यहां न्यूयॉर्क की तरह भारी स्थानीय टैक्स नहीं वसूला जाता और न ही शहर में अपराध की कोई लहर है. ऑक्सफोर्ड स्ट्रीट जैसी व्यस्त जगहों पर फोन झपटने की छिटपुट घटनाओं को छोड़ दें, तो सुरक्षा के लिहाज से लंदन आज भी काफी बेहतर और सुरक्षित शहर है.
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नए मकानों की भारी कमी
लोगों के शहर छोड़ने की सबसे मुख्य और बड़ी वजह है रहने के लिए सही और किफायती मकानों का न मिलना. लंदन में नए रिहायशी प्रोजेक्ट्स का निर्माण लगभग ठप हो चुका है. आंकड़ों के मुताबिक, आने वाले सालों में यहां बनने वाले नए घरों की संख्या पिछले 80 वर्षों के सबसे निचले स्तर पर पहुंचने वाली है, जिससे मार्केट में नए और अच्छे मकानों का संकट खड़ा हो गया है.
ऊंची कीमत और निराशाजनक घर
समस्या केवल पैसों की नहीं है, बल्कि उस कीमत के बदले मिलने वाली क्वालिटी की है. जो लोग मोटा किराया या बड़ी रकम चुकाने को तैयार भी हैं, उन्हें भी छोटी खिड़कियों वाले तंग फ्लैट या विक्टोरियन ज़माने की पुरानी प्लंबिंग वाले बेजान मकान ही नसीब हो रहे हैं. सख्त सरकारी नियमों (Planning Rules) और बिल्डरों की कमी के कारण मकानों के डिज़ाइनों में कोई नयापन या विविधता नहीं बची है.
जब हर महीने भारी रकम खर्च करने के बाद भी सिर्फ 800 स्क्वायर फीट का एक छोटा सा डिब्बेनुमा फ्लैट ही मिलना हो, तो लोग शहर के भीतर रहने का मोह छोड़ रहे हैं. यही वजह है कि अपने करियर और ज़िंदगी के सबसे बेहतरीन पड़ाव पर खड़े लोग अब रोज़ाना थोड़ी लंबी यात्रा का कष्ट सहकर भी शहर के बाहरी इलाकों और दूसरे कस्बों में बसना ज्यादा पसंद कर रहे हैं.
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