बड़े शहरों में घर खरीदार क्यों पीछे हट रहे हैं, क्या खत्म हो गया प्रॉपर्टी बाजार का बूम?

बाजार में उपलब्ध हाउसिंग इन्वेंट्री में पिछले वर्ष की तुलना में 10% की वृद्धि हुई है. अधिक इन्वेंट्री होने से खरीदारों को चुनने के लिए अधिक विकल्प मिलते हैं और तुरंत खरीदारी करने का दबाव कम होता है, जिससे मांग और सप्लाई के बीच एक स्वस्थ संतुलन बनता है.

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पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष ने सप्लाई चेन को प्रभावित किया है (Photo-ITG) पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष ने सप्लाई चेन को प्रभावित किया है (Photo-ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 29 जून 2026,
  • अपडेटेड 3:14 PM IST

पिछले कुछ सालों में भारत के हाउसिंग मार्केट ने अपनी मजबूती से हर किसी को हैरान किया है. होम लोन की दरें बढ़ने और संपत्तियों की कीमतों में लगातार इजाफा होने के बावजूद, खरीदार नए लॉन्च होने वाले प्रोजेक्ट्स की तरफ आकर्षित होते रहे. मजबूत मांग से उत्साहित होकर डेवलपर्स ने भी प्रमुख शहरों में नए प्रोजेक्ट्स लाना जारी रखा.

एनरॉक (ANAROCK) रिसर्च के अनुसार, 2026 की दूसरी तिमाही (Q2 2026) में भारत के शीर्ष सात शहरों में घरों की बिक्री में सालाना आधार पर 6% की गिरावट दर्ज की गई है. अप्रैल से जून के बीच लगभग 90,700 घर बेचे गए, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि के दौरान यह आंकड़ा 96,000 से अधिक था.क्वार्टर के आधार पर देखें तो बिक्री में 11% की और भी तेज गिरावट आई है. क्या इसका मतलब यह है कि हाउसिंग बूम खत्म हो गया है? ऐसा बिल्कुल नहीं है. इसके बजाय, विशेषज्ञों का मानना है कि बाजार अब एक अधिक संतुलित चरण में प्रवेश कर रहा है, जहां खरीदार निर्णय लेने में अधिक समय ले रहे हैं, जबकि डेवलपर्स दीर्घकालिक मांग पर अपना भरोसा बनाए हुए हैं.

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इस सुस्ती के पीछे सबसे बड़ी वजहों में से एक है अनिश्चितता. पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष ने सप्लाई चेन को प्रभावित किया है, कमोडिटी की कीमतों को लेकर चिंताएं बढ़ाई हैं और व्यापक आर्थिक सतर्कता की भावना को जन्म दिया है.

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इस अनिश्चितता ने व्यवसायों के साथ-साथ घर खरीदारों को भी प्रभावित किया है. घर खरीदना किसी भी परिवार के सबसे बड़े वित्तीय फैसलों में से एक होता है, और भू-राजनीतिक अस्थिरता का ऐसा दौर अक्सर लोगों को बड़े निवेश टालने के लिए प्रेरित करता हैय

एनरॉक के चेयरमैन अनुज पुरी का कहना है कि बाजार में यह नरमी काफी हद तक अपेक्षित थी. "ये आंकड़े उम्मीद के मुताबिक ही हैं, क्योंकि पूरे सेक्टर पर मध्य पूर्व युद्ध के प्रभाव बिल्कुल साफ थे. कारणों को अलग रख दें, तो वर्तमान में हमारे पास एक अधिक संतुलित हाउसिंग मार्केट है, जहां बिक्री की रफ्तार धीमी होने से नया सप्लाय अब एब्जॉर्प्शन के बराबर आ रहा है." उनके अनुसार, आज का हाउसिंग मार्केट अब घबराहट में की जाने वाली खरीदारी या 'फोमो' से नहीं चल रहा है. इसके बजाय, मांग अब अधिक नपी-तुली और वास्तविक सप्लाय के अनुरूप हो रही है.

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खरीदार बन रहे हैं अधिक सलेक्टिव

बाजार में सुस्ती का मतलब यह कतई नहीं है कि खरीदार गायब हो गए हैं. बल्कि, कई खरीदार इस समय 'देखो और इंतजार करो'का रुख अपना रहे हैं. पिछले दो वर्षों में संपत्तियों की बढ़ी हुई कीमतें, वैश्विक आर्थिक विकास को लेकर चिंताएं और आईटी (IT) व आईटी-इनेबल्ड सर्विसेज (ITeS) जैसे क्षेत्रों में अनिश्चितता ने परिवारों को अधिक सतर्क कर दिया है.

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अनुज का मानना है कि इसके पीछे एक और कारक भी काम कर रहा है- "मध्य पूर्व युद्ध के व्यवधानों और अनिवार्य रूप से आईटी/आईटीईएस क्षेत्र में एआई  से जुड़ी अनिश्चितताओं ने अधिक खरीदारों को कशमकश में डाल दिया है और वे फिलहाल फैसला टाल रहे हैं."

यह विशेष रूप से इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि बेंगलुरु, हैदराबाद और पुणे जैसे शहर तकनीकी पेशेवरों (Tech Professionals) पर बहुत अधिक निर्भर हैं, जो प्रीमियम सेगमेंट में घर खरीदारों का एक बड़ा हिस्सा हैं. चूंकि कंपनियां लगातार आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और बदलते हायरिंग ट्रेंड्स के साथ तालमेल बिठा रही हैं, इसलिए कई पेशेवर भविष्य की आय को लेकर पूरी तरह आश्वस्त होने तक बड़ी खरीदारी को टाल रहे हैं.

डेवलपर्स अभी रफ्तार धीमी नहीं कर रहे हैं

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दिलचस्प बात यह है कि जहां खरीदार अधिक सतर्क हो गए हैं, वहीं डेवलपर्स अभी भी सकारात्मक बने हुए हैं. इस तिमाही के दौरान नए रेजिडेंशियल लॉन्च में सालाना आधार पर 7% की बढ़ोतरी देखी गई, जिससे बाजार में लगभग 1.06 लाख नए घर शामिल हुए. मुंबई महानगरीय क्षेत्र (MMR) और बेंगलुरु की हिस्सेदारी कुल नए लॉन्च में आधे से अधिक रही. बड़े लिस्टेड डेवलपर्स, विशेष रूप से, उस जमीन पर प्रोजेक्ट लॉन्च करना जारी रखे हुए हैं जिसे उन्होंने मार्केट के अपसाइकल के दौरान खरीदा था.

पुरी इस रणनीति को स्पष्ट करते हुए कहते हैं, "दिलचस्प बात यह है कि Q2 2026 में सालाना आधार पर नए लॉन्च मजबूत बने रहे, क्योंकि बड़े और लिस्टेड डेवलपर्स ने 2025 में अधिग्रहित किए गए बड़े भूखंडों (land parcels) पर प्रोजेक्ट्स की झड़ी लगा दी."

हालांकि, शुरुआती संकेत बताते हैं कि डेवलपर्स भी अब अधिक सावधान हो रहे हैं. पिछली तिमाही की तुलना में, नए लॉन्च में 16% की गिरावट आई है, जिससे पता चलता है कि कई कंपनियों ने कमजोर मांग को देखते हुए प्रोजेक्ट की समय-सीमा में बदलाव करना शुरू कर दिया है. जैसा कि पुरी कहते हैं, "तिमाही आधार पर, शीर्ष शहरों में नया सप्लाई Q2 2026 में 16% गिर गया. अनिश्चितता के कारण कमजोर पड़े खरीदारों के सेंटिमेंट ने कई डेवलपर्स को नए सप्लाय की रफ्तार धीमी करने पर मजबूर किया होगा."

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प्रीमियम घरों का दबदबा बरकरार

भले ही कुल बिक्री में नरमी आई हो, लेकिन एक ट्रेंड पूरी तरह अपरिवर्तित रहा है. प्रीमियम हाउसिंग के लिए भारत की बढ़ती चाहत. 80 लाख रुपये से 1.5 करोड़ रुपये की कीमत वाले घरों की हिस्सेदारी नए सप्लाई में सबसे अधिक 27% रही. 1.5 करोड़ रुपये से 2.5 करोड़ रुपये की रेंज वाली संपत्तियों का योगदान 25% रहा, जबकि 2.5 करोड़ रुपये से अधिक की कीमत वाले घरों की हिस्सेदारी नए लॉन्च में 22% थी.

इसके विपरीत, किफायती आवास का दायरा लगातार सिकुड़ रहा है. 40 लाख रुपये से कम कीमत वाले घर अब शीर्ष सात शहरों में नए सप्लाई का केवल 6% रह गए हैं. यह पैटर्न खरीदारों की बदलती प्राथमिकताओं को दर्शाता है. कामकाजी पेशेवरों की बढ़ती आय, बेहतर फाइनेंसिंग विकल्प और बेहतर सुविधाओं वाले बड़े घरों की मांग ने डेवलपर्स को प्रीमियम प्रोजेक्ट्स पर ध्यान केंद्रित करने के लिए प्रोत्साहित किया है, जहां उनका मुनाफा भी बेहतर होता है.

बेंगलुरु और हैदराबाद जैसे शहरों में लगभग सभी नए लॉन्च प्रीमियम और लक्जरी श्रेणियों में केंद्रित देखे गए, जो यह दर्शाता है कि डेवलपर्स को भविष्य की मांग कहां नजर आ रही है. बाजार के सामान्य होने का एक और संकेत कीमतों में बढ़ोतरी की रफ्तार से मिलता है.

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शीर्ष सात शहरों में औसत आवासीय कीमतों में सालाना आधार पर 7% की वृद्धि हुई, लेकिन पिछली तिमाही की तुलना में यह वृद्धि केवल 1% रही. इससे पता चलता है कि कीमतें अभी भी बढ़ रही हैं, हालांकि उस तेज गति से नहीं जो महामारी के बाद की रिकवरी के दौरान देखी गई थी. NCR में सबसे तेज 13% की वार्षिक मूल्य वृद्धि दर्ज की गई, जिसके बाद बेंगलुरु 8% के साथ दूसरे स्थान पर रहा.

हाउसिंग के ये ताजा आंकड़े एक ऐसे बाजार की ओर इशारा करते हैं जो धीमा हो रहा है न कि धराशायी, रोजगार के मजबूत अवसरों वाले शहरों में मांग अभी भी स्वस्थ बनी हुई है, विशेष रूप से वे शहर जो ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स बुनियादी ढांचे  के विस्तार और प्रीमियम हाउसिंग की मांग से संचालित हैं. अकेले मुंबई और बेंगलुरु की हिस्सेदारी इस तिमाही के दौरान घरों की कुल बिक्री में लगभग आधी रही, जो भारत के सबसे बड़े शहरी बाजारों की निरंतर ताकत को रेखांकित करती है, जो बदला है, वह है खरीदारों का व्यवहार. परिवार अब खरीदारी का मूल्यांकन करने में अधिक समय ले रहे हैं, विकल्पों की सावधानीपूर्वक तुलना कर रहे हैं और सौदे पर हस्ताक्षर करने से पहले अधिक आर्थिक स्पष्टता का इंतजार कर रहे हैं.

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डेवलपरों के लिए इसका मतलब है कि वे केवल और प्रोजेक्ट्स लॉन्च करने के बजाय सही लोकेशन, सही कीमत और सही प्रोडक्ट मिक्स पर ध्यान केंद्रित करें. जैसे-जैसे भू-राजनीतिक तनाव कम होगा और आर्थिक विश्वास में सुधार होगा, हाउसिंग की मांग फिर से गति पकड़ सकती है. तब तक, भारत का प्रॉपर्टी बाजार एक अधिक परिपक्व चरण में प्रवेश करता हुआ दिखाई दे रहा है, यानी एक ऐसा दौर जहां जल्दबाजी या उत्साह के बजाय नपे-तुले फैसले खरीदारों और बिल्डरों दोनों को परिभाषित कर रहे हैं.


(रिपोर्ट- जैसमीन आनंद)

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