बेंगलुरु या वियतनाम, ₹35 हजार किराए में कहां मिलता है बेहतर फ्लैट, वीडियो वायरल

दास के मुताबिक, भारतीय महानगरों के माहौल ने युवाओं के दिमाग में यह बात डाल दी है कि करियर में सफल होने के लिए मुश्किल हालातों में रहना बेहद जरूरी है.

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वायरल पोस्ट ने खोली मेट्रो शहरों की पोल (Photo-ITG) वायरल पोस्ट ने खोली मेट्रो शहरों की पोल (Photo-ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली ,
  • 02 जून 2026,
  • अपडेटेड 4:38 PM IST

एक ट्रेवल ब्लॉगर प्रणव दास की पोस्ट ने इंटरनेट पर एक नई बहस छेड़ दी है. उन्होंने सोशल मीडिया पर वियतनाम के घर की बेंगलुरु के फ्लैट से तुलना की है. उन्होंने दावा किया है कि ₹35,000 के मासिक किराए में बेंगलुरु से कहीं बेहतर घर इस शहर में मिल सकता है. उन्होंने बताया है वियतनाम के तटीय शहर दा नांग (Da Nang) में इतने ही पैसों में कैसी लाइफस्टाइल मिल सकती है.

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इंस्टाग्राम पर शेयर की गई एक पोस्ट में, दास ने तर्क दिया कि भारतीय महानगरों ने युवाओं के लिए महंगी लागत और खराब लाइफस्टाइल को एक सामान्य बात बना दिया है. दूसरी तरफ, दुनिया के अन्य हिस्सों में लोग इतने ही पैसों में कहीं ज्यादा आरामदायक जिंदगी का आनंद ले रहे हैं.

बेंगलुरु के रेंटल मार्केट का जिक्र करते हुए दास ने लिखा कि अगर आपकी किस्मत बहुत अच्छी रही, तभी ₹35,000 महीने में आपको इंदिरानगर या कोरमंगला जैसी जगहों पर 1BHK फ्लैट मिल पाएगा, उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि यहां किरायेदारों को भारी-भरकम सिक्योरिटी डिपॉजिट और लगातार बढ़ते किराए का बोझ उठाना पड़ता है और इसके बदले में पार्किंग जैसी बुनियादी सुविधाएं भी नहीं मिलतीं. ऊपर से मकान मालिक चाबी हाथ में देने से पहले 10 महीने का एडवांस डिपॉजिट मांगेगा, इस इलाके में पिछले पांच सालों में किराया दोगुना हो चुका है, लेकिन अपार्टमेंट का साइज नहीं बढ़ा. आप बस उन्हीं चार दीवारों के लिए पहले से कहीं ज्यादा पैसे चुका रहे हैं."

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दा नांग की आलीशान जिंदगी

इसके विपरीत, वियतनाम के दा नांग शहर में उतने ही बजट में मिलने वाली सुविधाओं का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि वहां इस रकम में एक स्टूडियो अपार्टमेंट मिल जाता है, जिसमें ये सब शामिल होता है, समुद्र के किनारे का नजारा, रूफटॉप पूल और जिम की सुविधा मिलती है. उन्होंने वहां की तनावमुक्त जिंदगी पर बात करते हुए लिखा- "न तो डिपॉजिट का कोई झंझट है और ना ही पीजी में तीन लोगों के साथ कमरा शेयर करने की मजबूरी. सुबह की कॉफी पीने से पहले ही आपके दिन के दो घंटे ट्रैफिक और सफर में बर्बाद नहीं होते." दास का मानना है कि यह तुलना सिर्फ रहने की जगह को लेकर नहीं है, बल्कि उस जिंदगी के स्तर के बारे में है जो इसके साथ मिलती है.

उन्होंने लिखा-"भारतीय मेट्रो शहरों ने सालों से युवाओं को यह बात बेची है कि आपकी महत्वाकांक्षा और कामयाबी की कीमत ये मुश्किलें ही हैं. उन्होंने हमें यकीन दिला दिया है कि 22 से 28 साल की उम्र आईटी पार्क के पास एक बिना खिड़की वाले डिब्बे जैसे कमरे में बिताने के लिए ही होती है और अच्छा नजारा तो लाइफ में बाद में मिलता है जब आप उसे कमाने के लायक हो जाते हैं."

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बता दें कि पिछले कुछ सालों में लगातार देश के महानगरों से लोगों की बढ़ते किराए को लेकर शिकायतें सुनने को मिलती है अक्सर सोशल मीडिया पर लोग अपना गुस्सा जाहिर करते नजर आते हैं कि कैसे उनकी कमाई का बड़ा हिस्सा किराए में खत्म हो रहा है.

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