बीते 28 फरवरी को पहली बार अमेरिका-इजरायल ने ईरान पर स्ट्राइक शुरू की थी और इसके बाद ईरान ने ताबड़तोड़ पलटवार शुरू कर दिया. मिडिल ईस्ट में युद्ध 100 दिन से ज्यादा चला और दुनिया इसकी आग में झुलसी. जून की शुरुआत राहत तब मिली, जब दोनों देश शांति वार्ता के लिए राजी हो गए और सीजफायर के साथ दुनिया की तेल जरूरतों के 20 फीसदी हिस्से को पूरा करने के लिए जरूरी होर्मुज स्ट्रेट पर से दो महीने की अमेरिकी नाकाबंदी हट गई और तेल-गैस के जहाज निकलने लगे.
हालांकि, ये राहत ज्यादा दिन तक कायम नहीं रही. US-Iran Peace Deal पर अगली वार्ता होने से पहले ही इस हफ्ते की शुरुआत में होर्मुज में जहाजों पर ईरानी अटैक की खबरें आईं, तो अमेरिका ने भी अटैक कर दिया. इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप फिर आगे आए और ईरान को लेकर बड़ा बयान देते हुए डील का The End कर दिया.
इसके बाद ईरानी ठिकानों पर नए सिरे से तेल अमेरिकी हमले शुरू हो गए हैं और ग्लोबल टेंशन एक बार फिर से चरम पर पहुंच गई है. अमेरिका-ईरान तनाव बढ़ने के साथ ही एक बार फिर से कच्चे तेल में आग लग गई और 70 डॉलर के आसपास ट्रेड कर रहा, Brent Crude एक झटके में 80 डॉलर प्रति बैरल के करीब आ गया.
समझौता खत्म, US अटैक शुरू
Hormuz Strait में एक के बाद एक तीन जहाजों पर ईरानी मिसाइल अटैक के बाद अमेरिका ने पलटवार किया और ट्रंप के बयान के बाद अब US-Iran Deal खत्म हो गई, क्योंकि ट्रंप के बयान के बाद अमेरिका ने ईरान के शहरों में जमकर हमले किए हैं.
Donald Trump ने कहा कि युद्ध को समाप्त करने का अंतरिम समझौता खत्म हो चुका है. इसके बाद बुधवार को ईरान के खिलाफ सैन्य हमलों की एक नई लहर शुरू की गई.
ट्रंप के बयान के मुताबिक, अमेरिकी सेना ने ईरान पर हमला बोलते हुए बंदर अब्बास और सीरिक समेत कई इलाकों में हमले किए हैं. ईरानी समाचार एजेंसी मेहर ने भी बंदर अब्बास में धमाकों की पुष्टि की है. एक अन्य एजेंसी इरना के मुताबिक ताजा हमलों के बाद चाबहार के कुछ हिस्सों में बिजली आपूर्ति ठप हो गई है. वहीं, ईरान के अक्काला में अमेरिका ने रेलवे ब्रिज उड़ा दिया गया है.
Hormuz टेंशन ने तेल के दाम में लगाई आग
ईरान पर अमेरिका की ओर से 90 ठिकानों पर की गई स्ट्राइक ने एक बार फिर कच्चे तेल की कीमतों में आग लगा दी है और होर्मुज स्ट्रेट बंद होने का खतरा बढ़ गया है. बता दें कि US-Iran War चरम पर होने के समय अप्रैल महीने में Brent Crude Price 120 डॉलर के करीब पहुंच गया था. इसका असर पाकिस्तान, बांग्लादेश, ब्रिटेन से लेकर भारत तक में देखने को मिला था. पेट्रोल, डीजल (Petrol-Diesel) से लेकर एलपीजी तक महंगी (LPG Price Hike) हो गई थी.
हालांकि, अमेरिका-ईरान में सुलह से जुड़े अपडेटों के साथ ये गिरते हुए 71 डॉलर तक भी आ गया था. अब फिर से ये डर गहराने लगा है कि ईरान होर्मुज बंद करता है, तो फिर Oil-Gas Crisis गहरा सकता है और महंगाई की तगड़ी मार पड़ सकती है.
कहां तक जा सकती है कच्चे तेल की कीमतें?
अमेरिका-ईरान में सीजफायर खत्म होने से फिर युद्ध तेज होने की आशंका बढ़ गई है. ऐसे में अगर कच्चे तेल की कीमतों में उछाल ऐसे ही जारी रहा और फिर से होर्मुज में रुकावट आई, तो तेल की कीमतें युद्ध के दौरान एक्सपर्ट्स द्वारा जताए गए अनुमानों तक जा सकती हैं.
बता दें कि अप्रैल 2026 महीने में रॉयटर्स की रिपोर्ट में हाईटॉन्ग फ्यूचर्स नोट के हवाले से कहा गया है कि अगर अमेरिका-ईरान वार्ता फेल होती है और जंग फिर तेज होकर लंबा खिंचती है, तो ब्रेंट की कीमतें 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं. नुवामा इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज ने भी कहा था कि होर्मुज ज्यादा समय तक बंद होने से कच्चा तेल 110 डॉलर से 150 डॉलर के बीच रह सकता है.
क्रूड का आम आदमी से कनेक्शन?
बता दें कि कच्चा तेल महंगा होने के कई साइड इफेक्ट देखने को मिलते हैं, जिन्हें बीते दिनों दुनिया के तमाम देशों ने देखा भी है. अगर भारत की बात करें, तो एक्सपर्ट बताते हैं कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर क्रूड की कीमत में होने वाला 1 डॉलर प्रति बैरल का भी इजाफा, देश में पेट्रोल-डीजल की कीमत में 50-60 पैसे प्रति लीटर की बढ़ोतरी कर सकता है.
तेल महंगा होने से इसके आयात का खर्च बढ़ता है और आयात के लिए ज्यादा डॉलर खर्च होते हैं. आयतित सामान महंगा होने से देश में जरूरी चीजों की कीमतों पर महंगाई की मार देखने को मिलती है. भारत अपनी जरूरत का ज्यादातर क्रूड आयात करता है और ऐसे तमाम अन्य तेल आयात पर निर्भर देशों के लिए इसका महंगा होना परेशानी का सबब बनता है.
आजतक बिजनेस डेस्क