जियो पॉलिटिकल टेंशन के बीच चीन ने फिर से एक बड़ चाल चल दी है. हीलियम एक्सपोर्ट पर प्रतिबंध लगाते हुए चीन ने पूरी दुनिया को चौंका दिया है. चीन हीलियम का 80 फीसदी तक एक्सपोर्ट करता है, लेकिन अब चीन के रोक के बाद चिप सेक्टर पर नया संकट हावी हो चुका है.
हीलियम एक ऐसी गैस है, जो सेमीकंडक्टर प्लांट में काफी यूजफुल मानी जाती है. अगर ये प्रतिबंध लंबे समय तक जारी रहता है तो सेमीकंडक्टर निर्माताओं के लिए उच्च लागत का सामना करना पड़ेगा और आपूर्ति रिस्क को लेकर चिंता बढ़ सकती है. सेमीकंडक्टर की लागत बढ़ने से इलेर्क्टॉनिक्स और चिप यूज वाली सभी चीजों के दाम बढ़ सकते हैं. इतना ही नहीं सेमीकंडक्टर पर चलने वाली पूरी इंडस्ट्री पर संकट छा सकता है.
सेमीकंडक्टर के लिए कितनी खास है ये गैस?
चिप निर्माता की ऑपरेशन लागत में हीलियम का हिस्सा बहुत कम होता है, लेकिन उत्पादन के कई चरणों में इसका यूज होता है. उद्योग विशेषज्ञों का कहना है कि कई महत्वपूर्ण सेमीकंडक्टर प्रक्रियाओं में इस गैस का कोई व्यावहारिक विकल्प नहीं है, जिसके कारण कुल उत्पादन खर्चों में कम हिस्सेदारी होने के बावजूद यह एक तरह से महत्वपूर्ण गैस बन जाती है. एडवांस चिप्स बनाना स्पेशल केमिकल्प और इंडस्ट्रियल गैसों पर भी निर्भर करता है. हीलियम अपनी खास फिजिकल प्रॉपर्टीज की वजह से सबसे जरूरी गैसों में से एक है.
कतर से सप्लाई होने की थी उम्मीद
इस साल की शुरुआत में कतर के रास लाफान प्रॉसेसिंग प्लांट को हुए सैन्य हमलों के बाद यह ताजा रुकावट पैदा हुई है. रास लाफान दुनिया के सबसे बड़े हीलियम सेंटर्स में से एक है. हालांकि जंग रुकने के बाद आपूर्ति में सुधार की उम्मीद जगी थी, लेकिन चीन द्वारा हीलियम निर्यात रोकने के फैसले ने पहले से ही सीमित बाजार को और भी तंग कर दिया है.
कहां होता है इस गैस का इस्तेमाल
टेकइनसाइट्स के सेमीकंडक्टर एनालिस्ट मनीष रावत ने कहा कि हीलियम अपनी हाई थर्मल कंडक्टिविटी, केमिकल इनर्टनेस और अल्ट्रा-लो बॉइलिंग पॉइंट की वजह से सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग के लिए एक स्ट्रेटेजिक रूप से जरूरी गैस बनी हुई है. यह वेफर बैकसाइड कूलिंग, लीक डिटेक्शन, क्रायोजेनिक सिस्टम, इनर्ट पर्जिंग और सिलेक्शन इम्प्लांटेशन और मेट्रोलॉजी प्रोसेस के लिए जरूरी है.
हालांकि हीलियम फैब्रिकेशन कॉस्ट का सिर्फ एक छोटा सा हिस्सा देता है, रावत ने कहा कि यह एक जरूरी सिंगल-पॉइंट डिपेंडेंसी दिखाता है जो सप्लाई कम होने पर प्रोडक्शन में रुकावट डाल सकता है. इस गैस का इस्तेमाल GPUs, AI एक्सेलरेटर, लॉजिक चिप्स, DRAM, NAND फ्लैश, हाई-बैंडविड्थ मेमोरी (HBM), ऑटोमोटिव चिप्स, RF कंपोनेंट्स और पावर सेमीकंडक्टर की मैन्युफैक्चरिंग में किया जाता है.
चीन का यह कदम क्यों मायने रखता है?
ग्रेहाउंड रिसर्च के चीफ़ एनालिस्ट और CEO संचित वीर गोगिया ने कहा कि झगड़े से पहले, सप्लाई का मैप छोटा और एकतरफ़ा था. 2025 में ग्रेड-A और गैसीय हीलियम की US सेल्स लगभग 81 मिलियन क्यूबिक मीटर तक पहुंच गई, जबकि कतर ने दुनिया के कुल 190 मिलियन क्यूबिक मीटर में से लगभग 63 मिलियन क्यूबिक मीटर का प्रोडक्शन किया. इसलिए दो देशों ने मार्केट का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा सप्लाई किया, जिसमें रूस 18 मिलियन क्यूबिक मीटर, अल्जीरिया 11 मिलियन और कनाडा छह मिलियन क्यूबिक मीटर पर था, जो कुछ दूरी पर था.
दक्षिण कोरिया, जो दुनिया के सबसे बड़े सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग हब में से एक है, अपने हीलियम इंपोर्ट का लगभग 65% क़तर से सोर्स करता है, जिससे इंडस्ट्री की कुछ ही सप्लायर्स पर निर्भरता का पता चलता है. गोगिया के मुताबिक, अकेले रास लाफन पर हुए हमलों से हर महीने ग्लोबल सप्लाई से पांच मिलियन क्यूबिक मीटर से ज़्यादा हीलियम हट जाता था, जिससे चीन के नए कदम से पहले ही मार्केट में दिक्कतें आ रही थीं.
चीन दुनिया के सबसे बड़े हीलियम प्रोड्यूसर में से नहीं है, लेकिन यह पूरे एशिया में सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरर्स को हीलियम की रिफाइनिंग, डिस्ट्रीब्यूशन और सप्लाई में अहम भूमिका निभाता है.
आजतक बिजनेस डेस्क