क्या आपने कभी सोचा है कि जिस पेट्रोल को आप अपनी कार या बाइक में भरवा रहे हैं, वह आखिर किसके हित में बदल रहा है? सरकार कहती है E20 भारत की एनर्जी सेफ्टी को मजबूत करेगा. पेट्रोल में लगातार बढ़ते इथेनॉल के डोज से इंपोर्टेड कच्चे तेल पर निर्भरता कम होगी. किसान आर्थिक रूप से मजबूत होंगे और प्रदूषण कम होगा. लेकिन दूसरी तरफ करोड़ों वाहन मालिकों के मन में एक सवाल लगातार उठ रहा है. अगर E20 इतना ही बेहतर है, तो E5 और E10 जैसे विकल्प बाजार से लगभग गायब क्यों कर दिए गए?
सवाल सिर्फ इथेनॉल ब्लेंडिंग का नहीं है. सवाल उस भरोसे का है जिसके आधार पर लोगों ने लाखों रुपये खर्च कर अपने वाहन खरीदे थे. सवाल उस कंज्यूमर राइट का है जिसमें ग्राहक को अपनी जरूरत और अपने वाहन के हिसाब से फ्यूल चुनने की आजादी मिलनी चाहिए. भारत आज इथेनॉल क्रांति के दौर से गुजर रहा है, लेकिन इस रेवोल्यूशन के बीच यह चर्चा भी उतनी ही जरूरी है कि, क्या हम सही दिशा में बढ़ रहे हैं, या फिर जल्दबाजी में ऐसा फैसला लागू कर रहे हैं जिसकी असली कीमत आने वाले सालों में वाहन मालिकों को चुकानी पडेगी.
पेट्रोल पंप पर गाड़ी रुकती है. नोजल टैंक में जाता है. मीटर दौड़ता है और ग्राहक एक भरोसे के साथ पेट्रोल भरवा लेता है. लेकिन अब ये भरोसा दरकने लगा है. देश भर में कई वाहन मालिक इस बात की शिकायत कर रहे हैं कि, E20 फ्यूल के इस्तेमाल से वाहन का माइलेज गिरा है और मेंटनेंस कॉस्ट बढ़ा है. कुछ सालों में ही गाड़ियों की परफॉर्मेंस में भी भारी गिरावट देखने को मिली है. रही बात सरकार की तो वो भी माइलेज गिरने की बात से पूरी तरह से इंकार नहीं कर सकी है.
दिलचस्प बात यह है कि, फ्यूल को लेकर हो रही यह बहस सिर्फ इंजन, माइलेज या प्रदूषण की नहीं है. यह बहस नीति और पसंद की भी है. दुनिया के कई देशों में लोग आज भी अलग-अलग इथेनॉल ब्लेंड वाले फ्यूल चुन सकते हैं. लेकिन भारत ने अब न्यूनत E20 फ्यूल को अनिवार्य करते हुए E85 और E100 का भी रास्ता साफ कर दिया है. जिससे नए और पुराने दोनों वाहन खरीदारों की चिंता बढ़ा दी है. पुराने गाड़ी मालिक इसलिए परेशान हैं, क्योंकि उनका वाहन E20 कम्प्लायंट नहीं है, और नए इस बात से दुविधा में हैं आगे भविष्य में कितनी ब्लेंडिंग मिलती रहेगी.
सरकार इसे ऊर्जा आत्मनिर्भरता का रास्ता बता रही है, जबकि लोग पूछ रहे हैं कि, कहीं इस बदलाव की रफ्तार जरूरत से ज्यादा तेज तो नहीं है? आखिर E20 पर इतना जोर क्यों है, E5 और E10 का विकल्प क्यों नहीं? उन पुरानी गाड़ियों का क्या जो अप्रैल 2023 से पहले खरीदी गई. क्योंकि इस तारीख के बाद से ही देश में E20 कम्प्लायंट व्हीकल्स का आना शुरू हुआ. दरअसल, भारत का इथेनॉल सफर एक झटके में तय नहीं हुआ है. इसकी टाइमलाइन को देखें तो समझ आता है कि ये यात्रा कितने अहम पड़ाव से गुजरी है.
2003
वाजपेयी सरकार के दौरान 9 राज्यों में पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर 5% इथेनॉल ब्लेंडिंग (E5) का लक्ष्य रखकर इसकी शुरुआत की गई थी. लेकिन सप्लाई और इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी के कारण अगले एक दशक तक ब्लेंडिंग का स्तर 1.5% के आसपास ही अटका रहा.
2014-2018
साल 2014 के बाद सरकार ने इथेनॉल की खरीद प्रक्रिया को आसान बनाया. 2018 में 'नेशनल पॉलिसी ऑफ बायोफ्यूल' (National Policy on Biofuels) पेश की गई, जिसने चीनी मिलों और डिस्टिलरीज को सीधे गन्ने के रस और भारी मोलासेस से इथेनॉल बनाने की अनुमति दी. पहले 20% ब्लेंडिंग का लक्ष्य साल 2030 रखा गया था.
2021-2022
जून 2021 में सरकार ने गेम प्लान बदला और E20 के लक्ष्य को 2030 से घटाकर 2025-26 कर दिया. जून 2022 में भारत ने तय समय से 5 महीने पहले ही पेट्रोल में 10% इथेनॉल ब्लेंडिंग (E10) का नेशनल टार्गेट पूरा कर लिया.
2025-2026
नवंबर 2025 में सरकार ने ऐलान किया कि, भारत ने पेट्रोल में 20% इथेनॉल ब्लेंडिंग का अपना टार्गेट समय से पहले ही पूरा कर लिया है. इसके बाद 1 अप्रैल 2026 से पूरे देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में ऑयल कंपनियों के लिए E20 फ्यूल बेचना अनिवार्य कर दिया गया. अब E25, E27 और E30 फ्यूल को बाजार मे उतारने की तैयारी हो रही है.
इथेनॉल ब्लेंडिंग को अपनाने से भारत को कोई गुरेज नहीं है. देश ने हमेशा से नई तकनीकी का स्वागत किया है. भारतीय ग्राहकों ने CNG अपनाई, ऑटोमैटिक ट्रांसमिशन अपनाया और अब EV की तरफ भी बढ़ रहा है. ऐसे में ग्राहक हायर इथेनॉल ब्लेंडेड फ्यूल अपनाने में भी पीछे नहीं हटेगा. लेकिन उसे उसके घर पर खड़ी गाड़ी के हिसाब से फ्यूल चुनने का भी अधिकार मिलना चाहिए. जैसा दूसरे देशों में मिलता आया है. बात जब भी इथेनॉल की होती है तो सबसे पहला नाम ब्राजील, अमेरिका और यूरोपीय देशों का आता है. जहां पर हायर इथेनॉल ब्लेंडिंग को बढ़ावा दिया गया, साथ ही लोअर ब्लेंडेड फ्यूल को भी पेट्रोल पंपों पर जगह दी गई.
प्रमुख देशों में फ्यूल में इथेनॉल की ब्लेंडिंग
| देश | स्टैंडर्ड ब्लेंडिंग (%) | अधिकतम/फ्लेक्स फ्यूल विकल्प | इथेनॉल का मेन सोर्स |
| ब्राजील | E27 (न्यूनतम 27% अनिवार्य) | E100 (100% शुद्ध इथेनॉल) | गन्ना |
| अमेरिका | E10 से E15 (10% - 15%) | E85 (85% इथेनॉल फ्लेक्स फ्यूल) | मक्का |
| पराग्वे | E10 | E85 (चुनिंदा शहरों में) | गन्ना |
| थाईलैंड | E10 से E85 (E20% पर जोर) | E85 (चुनिंदा शहरों में) | गन्ना |
| फ्रांस | E10 (स्टैंडर्ड) | E85 (यूरोप का सबसे बड़ा मार्केट) | अनाज |
ब्राजील इथेनॉल ब्लेंडिंग के मामले में दुनिया का सबसे परिपक्व बाजार है. वहां 1970 के दशक के तेल संकट के बाद से ही इथेनॉल पर काम शुरू हो गया था. आज ब्राजील में कोई भी गाड़ी प्योर पेट्रोल (E0) पर नहीं चलती. सामान्य पेट्रोल में लगभग 27 प्रतिशत इथेनॉल मिलाया जाता है और E30 पर भी काम चल रहा है. कई वाहन 100 प्रतिशत इथेनॉल (E100) पर भी चल सकते हैं. वहां न्यूनतम सीमा ही E27 है. इसके अलावा, ब्राजील की अधिकांश कारें 'फ्लेक्स-फ्यूल' (Flex-Fuel) हैं, यानी जरूरत हो तो इन गाड़ियों में 100% शुद्ध इथेनॉल (E100) भी भरवाया जा सकता है. सबसे बड़ी बात यह है कि ब्राजील ने पहले फ्लेक्स-फ्यूल वाहन बनाए, फिर हायर ब्लेंडेड फ्यूल को लागू किया.
दूसरी ओर अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा इथेनॉल उत्पादक है. वहां के आम पेट्रोल पंपों पर मिलने वाले फ्यूल में 10% से 15% (E15) इथेनॉल मिक्स होता है. अमेरिका अपने बड़े मक्का उत्पादन का एक बड़ा हिस्सा इथेनॉल बनाने में इस्तेमाल करता है और वहां E85 (85% इथेनॉल) का एक बड़ा रिटेल नेटवर्क मौजूद है. लेकिन बावजूद इसके ग्राहकों को E10 का भी विकल्प मिलता है.
इसके अलावा थाईलैंड में भी न्यूनतम 10 प्रतिशत इथेनॉल ब्लेंडिंग के साथ E10 फ्यूल का विकल्प है और ये देश भी E20 की उपयोगिता पर जोर दे रहा है. ख़ास बात ये है कि, यहां E20 और E85 एक साथ उपलब्ध हैं. वाहन मालिक अपनी गाड़ी के अनुसार फ्यूल चुन सकते हैं. पराग्वे की बात करें तो यहां पेट्रोल में 10 प्रतिशत इथेनॉल ब्लेंडिंग स्टैंडर्ड है. चूंकि यहां पर फ़्लेक्स फ्यूल गाड़ियों की संख्या भी तेजी से बढ़ रही है तो समस्या बहुत ज्यादा नहीं होती है.
फ्रांस में 10 प्रतिशत इथेनॉल ब्लेंडिंग होती है, लेकिन सबसे बड़ा यूरोपीय बाजार होने के नाते यहां E85 वाहन भी उपलब्ध हैं. फ्रांस में जब इथेनॉल ब्लेंडिंग की शुरुआत हुई तब रेगुलर पेट्रोल इंजन वाली कारों को E85 पर चलाने के लिए जरूरी कन्वर्जन किट को कानूनी मंजूरी (होमोलोगेशन) नहीं मिली थी. करीब 2015 के बाद स्थिति बदलने लगी, जब सरकार ने इन कन्वर्जन किट को कानूनी मान्यता दी तब E85 फ्यूल की डिमांड बढ़ने लगी. इसके अलावा फ्रांस में रेगुलर पेट्रोल और हायर इथेनॉल ब्लेंडेड फ्यूल की कीमतों में तकरीबन आधे का अंतर देखने को मिलता है.
इसका एक तर्क ये हो सकता है कि, यदि पूरे देश में E5, E10 और E20 तीनों को समानांतर रूप से उपलब्ध रखा जाए तो तेल कंपनियों को अलग-अलग सप्लाई चेन, स्टोरेज और डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम बनाना पड़ेगा. जिससे लागत बढ़ेगी और E20 टार्गेट का लाभ कम हो जाएगा. लेकिन ऐसा नहीं है कि, अलग-अलग टाइप के फ्यूल बाजार में उपलब्ध नहीं है.
इंडियन ऑयल XP95 (95 ऑक्टेन) और XP100 (100 ऑक्टेन) पेट्रोल की बिक्री प्रीमियम फ्यूल के तौर पर करता है. भारत पेट्रोलियम के आउटलेट पर भी आपको स्पीड और स्पीड 97 के विकल्प मिल जाएंगे. इसके अलावा हिंदुस्तान पेट्रोलियम पावर और पावर 95 के नाम से प्रीमियम पेट्रोल की बिक्री करता है. ये सभी हाई ऑक्टेन फ्यूल हैं, जो हाई परफॉर्मेंस व्हीकल्स के इंजन में नॉकिंग को कम करती हैं और परफॉर्मेंस को बेहतर बनाती हैं. इन सभी फ्यूल्स के लिए भी पेट्रोलियम कंपनियां अलग-अलग डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क, स्टोरेज और डिस्पेंसर का इस्तेमाल करती हैं. जब इन फ्यूल्स के लिए अलग-अलग व्यवस्था संभव है तो आखिर E5 या E10 का विकल्प क्यों नहीं दिया जा सकता है.
दुनिया के कई देशों में इथेनॉल ब्लेंडिंग को बढ़ावा दिया जा रहा है. हर कोई चाहता है कि, वो इंपोर्टेड फ्यूल पर निर्भरता कम करे, देश से बाहर जाने वाले धन को रोका जाए साथ ही एनर्जी सिक्योरिटी के मामले में मजबूती बढ़े. लेकिन इन सब के बीच भारत को उन देशों से कुछ सीखने की भी जरूरत है. हायर इथेनॉल फ्यूल के साथ-साथ लोअर ब्लेंडेड फ्यूल की उपलब्धता भी जरूरी है. समय के साथ जब पुरानी गाड़ियां फेज-आउट हो जाती हैं तो लोअर ब्लेंडेड फ्यूल को बाजार से हटाया जाए. कम से कम तब तक वाहन मालिक अपनी गाड़ी से सुकून से सफर कर सकेगा.
कन्वर्जन किट का बाजार में उपलब्ध कराया जाना बेहद जरूरी कदमों में से एक है. क्योंकि ऐसे ही किट ने फ्रांस में फ्लेक्स-फ्यूल के बाजार की दशा ही बदल दी. हाल ही में इंडियन शुगर एंड बायो-एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (ISMA) के डायरेक्टर जनरल दीपक बलानी ने आजतक से ख़ास बातचीत में बताया कि, उन्होंने ऐसे ही इंपोर्टेड किट की टेस्टिंग की है, जो पुराने BS4 और BS6 वाहनों के लिए काफी हद तक सफल है. इस किट की शुरुआती लागत ज्यादा है, लेकिन स्थानीय स्तर पर प्रोडक्शन शुरू कर इसे आम आदमी के लिए कम कीमत में उपलब्ध कराया जा सकता है.
अश्विन सत्यदेव