कार आपकी है. पेट्रोल आप भरवा रहे हैं. हर महीने हजारों रुपये आपकी जेब से जा रहे हैं. लेकिन अगर आपको लगता है कि E20 पेट्रोल डालने के बाद आपकी कार का माइलेज कम हो गया है, तो सिर्फ आपका महसूस करना काफी नहीं है. क्योंकि सरकार कह रही है कि आम आदमी सही माइलेज चेक ही नहीं कर सकता. इसके लिए सर्विस स्टेशन की मशीन चाहिए.
यानी जिस गाड़ी में आप हर महीने हजारों रुपये का पेट्रोल भरवा रहे हैं, उसका असली हिसाब-किताब भी आप खुद नहीं जान सकते. यह बात हम नहीं कह रहे हैं, लेकिन केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी की बातों से यही आशय निकल कर सामने आता है. हाल ही में गडकरी ने एक न्यूज चैनल को दिए अपने इंटरव्यू में कहा कि, "कोई भी आम आदमी कार का सटीक माइलेज नहीं निकाल सकता. उनके मुताबिक इसके लिए वाहन को सर्विस स्टेशन पर ले जाना होगा, जहां विशेष मशीनों की मदद से माइलेज और इंजन की परफॉर्मेंस का सटीक टेस्ट किया जा सकता है."
बचपन में दीवार पर टंगी घड़ी देखकर एक कौतुहल होता था कि, आखिर डायल के बीच मचलती इन सुईयों को देखकर उम्र में बड़े लोग टाइम कैसे बता देते हैं? तब पिता जी ने सेकंड, मिनट और घंटे की सुईयों का फर्क समझाते हुए हमें घड़ी देखना सिखाया. उम्र थोड़ी आगे बढ़ी स्कूटर पर बैठने लायक हुए तो उन्होंने गाड़ी में खर्च होने वाले पेट्रोल यानी माइलेज निकालना सिखाया. यकीन मानिए तब से लेकर आज तक वो फार्मूला हर बार सही ही साबित हुआ है. लेकिन केंद्रीय मंत्री के बयान से एक नई बहस छिड़ गई है.
क्या सच में एक आम कार मालिक अपनी गाड़ी का सही माइलेज नहीं निकाल सकता? या फिर इसके लिए कुछ आसान तरीके भी हैं जिनसे बिना किसी खास मशीन के काफी हद तक सही नतीजे निकाले जा सकते हैं. आइए इसे आसान भाषा में समझते हैं.
गडकरी की बात तकनीकी तौर पर कुछ हद तक सही हो सकती है. क्योंकि लैब या सर्विस सेंटर में होने वाला माइलेज टेस्ट कंट्रोल्ड कंडिशन में किया जाता है. वहां तापमान, सड़क जैसी स्थिति, इंजन की परफॉर्मेंस, फ्यूल की मात्रा और ड्राइविंग पैटर्न जैसी कई चीजों को एक जैसा रखा जाता है. इसके लिए भारत में ऑटोमोटिव रिसर्च एसोसिएशन ऑफ इंडिया (ARAI) जैसी संस्था है जो वाहनों को उनके इफिशिएंसी के आधार पर सर्टिफिकेट देती है.
माइलेज के यही फिगर या आंकड़े कार कंपनियां अपने विज्ञापनों में भी दिखाती हैं. चूंकि ये माइलेज फिगर एक स्टैंडर्ड और सेट कंडिशन में चेक किए जाते हैं तो रियल वर्ल्ड में उन्हीं वाहनों के माइलेज में भिन्नता मिलना लाजमी है. क्योंकि रियल लाइफ में रोड कंडिशन, ड्राइविंग स्टाइल, वाहन पर पड़ने वाला वजन और यहां तक की व्हीकल मेंटनेंस भी माइलेज पर असर डालता है.
लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि एक आम कार मालिक अपने वाहन का सटीक माइलेज नहीं जान सकता. सच यह है कि, माइलेज निकालने के कई आसान और भरोसेमंद तरीके मौजूद हैं. इनमें कुछ तरीके इतने आसान हैं कि उन्हें कोई भी व्यक्ति बिना किसी तकनीकी जानकारी के समझ सकता है.
पहला तरीका: फुल टैंक टू फुल टैंक
सबसे भरोसेमंद तरीका फुल टैंक टू फुल टैंक मेथड माना जाता है. इसमें सबसे पहले कार का टैंक पूरी तरह भरवाया जाता है और ट्रिप मीटर को जीरो कर दिया जाता है. इसके बाद सामान्य तरीके से कम से कम 200 से 300 किलोमीटर तक गाड़ी चलाई जाती है. फिर उसी पेट्रोल पंप पर दोबारा टैंक पूरा भरवाया जाता है. अब जितने लीटर पेट्रोल दोबारा भरवाना पड़ा, उससे पहले चली हुई कुल दूरी को भाग दे दीजिए. यही आपकी कार का वास्तविक माइलेज होगा. अगर कार ने 300 किलोमीटर की दूरी तय की और दोबारा टैंक भरने में 15 लीटर पेट्रोल लगा, तो माइलेज 20 किलोमीटर प्रति लीटर होगा. यह तरीका आम लोगों के लिए सबसे ज्यादा भरोसेमंद माना जाता है. इसे फार्मूला से भी समझ सकते हैं-
माइलेज का फार्मूला:
माइलेज (किमी/लीटर) = कुल चली हुई दूरी (किमी) ÷ दोबारा फुल टैंक कराने में भरे गए पेट्रोल (लीटर)
उदाहरण से समझें:
यानी आपकी कार का औसत माइलेज 13 किमी प्रति लीटर है.
दूसरा तरीका: एवरेज डिस्प्ले सिस्टम
दूसरा तरीका कार के ऑनबोर्ड ट्रिप डिस्पले का है. आज की ज्यादातर नई कारों में इंस्ट्रूमेंट क्लस्टर या मल्टी इंफॉर्मेशन डिस्प्ले (MID) पर एवरेज फ्यूल इकोनॉमी या माइलेज दिखाने का फीचर मिलता है. यह सिस्टम कार के सेंसर और इंजन कंट्रोल यूनिट (ECU) से मिले डेटा के आधार पर लगातार फ्यूल की खपत और तय की गई दूरी का हिसाब लगाता रहता है.
कार का कंप्यूटर इंजन में जाने वाले फ्यूल, वाहन की स्पीड, इंजन का आरपीएम और तय की गई दूरी जैसे कई पैरामीटर का एनालिसिस करता है. इसके बाद यह औसत माइलेज की गणना करके डिस्प्ले पर किमी/लीटर या लीटर/100 किमी के रूप में दिखाता है. कई कारों में ट्रिप A और ट्रिप B के लिए अलग-अलग औसत माइलेज भी देखा जा सकता है.
इसका इस्तेमाल कैसे करें?
ऑन-बोर्ड एवरेज डिस्प्ले आमतौर पर काफी अच्छा अनुमान देता है, लेकिन यह 100% सटीक नहीं माना जाता. कई बार यह रियल माइलेज से 2% से 10% तक अलग हो सकता है. इसकी वजह ड्राइविंग स्टाइल, ट्रैफिक, सड़क की स्थिति, टायर प्रेशर और कार के सॉफ्टवेयर का कैलकुलेशन का तरीका हो सकता है. लेकिन ये सिस्टम आपको कम से कम इतनी जानकारी दे देता है कि, आपकी गाड़ी में बचा हुआ फ्यूल आपको कितनी दूरी की यात्रा करा सकता है.
तीसरा तरीका: OBD स्कैनर
तीसरा तरीका OBD स्कैनर का है. बाजार में ऐसे छोटे ऑन-बोर्ड डाइग्नोस्टिक (OBD) डिवाइस आसानी से मिल जाते हैं, जिन्हें कार के OBD पोर्ट में लगाकर मोबाइल ऐप से जोड़ा जा सकता है. ये इंजन के फ्यूल फ्लो, एयर-फ्यूल रेशियो, इंजन लोड और दूसरे कई डेटा को रीड करते हैं. इन आंकड़ों के आधार पर माइलेज का काफी सटीक अनुमान लगाया जा सकता है. हालांकि इसके लिए थोड़ी तकनीकी समझ की जरूरत होती है.
इसका इस्तेमाल कैसे करें?
अगर कोई व्यक्ति बिल्कुल वैज्ञानिक स्तर की जांच चाहता है, तब सर्विस सेंटर का डायग्नोस्टिक टेस्ट सबसे सटीक विकल्प होता है. वहां स्पेशल मशीनों की मदद से इंजन की परफॉर्मेंस, फ्यूल इंजेक्शन सिस्टम, सेंसर और रियल-टाइम फ्यूल कंजम्प्शन का टेस्ट किया जाता है. यही वह प्रक्रिया है जिसका जिक्र नितिन गडकरी ने किया है.
यह भी समझना जरूरी है कि किसी भी कार का माइलेज केवल पेट्रोल की क्वालिटी से तय नहीं होता. ड्राइविंग स्टाइल, ट्रैफिक, टायर में हवा का सही दबाव, एयर फिल्टर की कंडिशन, इंजन ऑयल, एसी का इस्तेमाल, गाड़ी में रखा अतिरिक्त वजन और सड़क की हालत जैसे कई कारण माइलेज को प्रभावित करते हैं. यही वजह है कि एक ही मॉडल की दो कारें अलग-अलग लोगों के हाथ में अलग माइलेज दे सकती हैं.
E20 पेट्रोल पर सवाल
जहां तक E20 पेट्रोल का सवाल है, तो इसमें असल खेल कैलोरिफिक वैल्यू का होता है. दरअसल, किसी भी फ्यूल (1 लीटर या 1 मिली) को पूरी तरह से जलाने (दहन) पर जितनी ऊष्मा (Heat) उत्पन्न होती है, उसे उस फ्यूल की कैलोरिफिक वैल्यू (Calorific Value) कहते हैं. वहीं इथेनॉल की कैलोरिफिक वैल्यू यानी ऊर्जा क्षमता सामान्य पेट्रोल से कम होती है. ऐसे में माइलेज में कमी आनी स्वाभाविक है.
कई वाहन निर्माता कंपनियां भी 3 से 7 प्रतिशत तक के अंतर की संभावना जताते रहे हैं. हालांकि असल में माइलेज में कितनी गिरावट देखने को मिल रही है ये हर कार, इंजन तकनीक और ड्राइविंग पैटर्न के अनुसार अलग-अलग हो सकती है. लेकिन ग्राउंड लेवल पर लोग E20 पेट्रोल से कितने नाखुश हैं इसका अंदाजा आप सोशल मीडिया पोस्ट, सर्विस सेंटर पर आने वाले मामलों से भी लगा सकते हैं.
इस पूरे मसले का सबसे अहम सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि E20 से माइलेज कम होता है या नहीं. असली सवाल यह है कि अगर सरकार कहती है कि आम आदमी खुद सही माइलेज नहीं निकाल सकता, तो क्या भविष्य में ऐसा कोई आसान और पारदर्शी सिस्टम बनाया जाएगा जिससे हर कार मालिक बिना सर्विस स्टेशन जाए अपने वाहन की फ्यूल खपत जान सके. क्योंकि आखिरकार पेट्रोल का पैसा वही देता है, इसलिए उसे यह जानने का अधिकार भी होना चाहिए कि उसकी कार एक लीटर फ्यूल में सचमुच कितनी दूरी तय कर रही है.
अश्विन सत्यदेव