थाली में परोसी जा रही 'धीमी मौत'... 31 देशों में बैन जानलेवा डाइमेथोएट भारत में धड़ल्ले से क्यों बिक रहा?

डाइमेथोएट कीटनाशक को लेकर भारत में एक बार फिर बहस तेज हो गई है. रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इस रसायन पर दुनिया के कई देशों में प्रतिबंध है, जबकि भारत में इसका उत्पादन और बिक्री कुछ शर्तों के साथ जारी है.

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फलों और सब्जियों पर प्रतिबंध के बावजूद बाजार में उपलब्ध डाइमेथोएट (Photo: AI Generated) फलों और सब्जियों पर प्रतिबंध के बावजूद बाजार में उपलब्ध डाइमेथोएट (Photo: AI Generated)

ओम प्रकाश

  • नई दिल्ली,
  • 20 जून 2026,
  • अपडेटेड 6:35 AM IST

भारत में एक ऐसा कीटनाशक धड़ल्ले से बिक रहा है जिसे दुनिया के 31 देशों ने बैन कर दिया है. इस कीटनाशक का नाम है डाइमेथोएट. यह केमिकल दूसरे विश्व युद्ध में बनी खतरनाक नर्व गैस की तकनीक से बना है. यह डीएनए को नुकसान पहुंचाता है और कैंसर का खतरा बढ़ाता है. भारत सरकार ने सब्जियों और फलों पर इसका इस्तेमाल बैन किया है, लेकिन कपास की फसल के नाम पर इसकी बिक्री जारी है. यही वजह है कि यह जहर घूम-फिरकर हमारी थाली तक पहुंच रहा है.

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डाइमेथोएट एक कीटनाशक है यानी कीड़े मारने वाली दवा. इसकी खासियत यह है कि फसलों पर छिड़कने के बाद यह खुद गायब हो जाता है, लेकिन टूटकर 'ओमेथिएट' नाम का एक नया रूप बनाता है. यह नया रूप पहले वाले केमिकल से 10 गुना ज्यादा खतरनाक होता है. अमेरिका की पर्यावरण एजेंसी ने इसे कैंसर पैदा करने वाला केमिकल बताया है. दुनिया के 31 देशों ने इस पर पूरी तरह बैन लगा दिया है, लेकिन भारत में यह अभी भी बिक रहा है. 

श्रीलंका के सुसाइड एपिडेमिक से लेकर यूरोप के फूड-वॉर तक, इस केमिकल का इतिहास केवल इंसानी जिंदगियों की तबाही और मौत के स्याह पन्नों से भरा पड़ा है. 

इसका इतिहास कहां से शुरू हुआ?

इस केमिकल का जन्म युद्ध से जुड़ा है. दूसरे विश्व युद्ध में जर्मनी ने सरीन और टैबुन नाम की नर्व गैस बनाई थी, जो इंसानों के नर्वस सिस्टम को बंद कर देती थी. युद्ध खत्म होने के बाद अमेरिकी वैज्ञानिकों ने इसी तकनीक का इस्तेमाल कीड़ों को मारने के लिए किया. इस तरह युद्ध की खतरनाक गैस को खेती के कीटनाशक में बदल दिया गया.

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डाइमेथोएट की खोज सबसे पहले अमेरिका में 1951 में हुई थी. इसे अमेरिकी कंपनी 'अमेरिकन साइनामिड' ने बनाया था. 1956 में इसे किसानों के लिए बाजार में बेचना शुरू किया गया.

यूरोप ने क्यों बैन किया?

यह केमिकल मधुमक्खियों के लिए भी जानलेवा है. इसी वजह से फ्रांस, जर्मनी, इटली, स्पेन समेत यूरोपीय संघ के सभी 27 देशों और चीन ने इस पर पूरी तरह बैन लगाया है. अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में भी इस पर सख्त पाबंदियां हैं.

कुछ साल पहले यूरोप में इस केमिकल को लेकर बड़ा विवाद हुआ था. फ्रांस के चेरी और फलों के बागानों में इसका जहर मिला था, जिसके बाद फ्रांस ने उन देशों से फल लेना बंद कर दिया जो इस केमिकल का इस्तेमाल कर रहे थे. इससे यूरोप के देशों के बीच व्यापार और राजनीति में तनाव बढ़ गया. आखिरकार 2019-2020 में पूरे यूरोपीय संघ ने इस पर पूरी तरह बैन लगा दिया.

यह इतना खतरनाक क्यों है?

वैज्ञानिक रिसर्च में पाया गया है कि यह केमिकल हमारे डीएनए को सीधा नुकसान पहुंचाता है. इसे 'जीनोटॉक्सिक' और 'म्यूटाजेनिक' कहा जाता है, यानी यह शरीर की कोशिकाओं के अंदर मौजूद जेनेटिक मैटेरियल को बिगाड़ देता है या नष्ट कर देता है. लंबे समय तक इसके संपर्क में रहने से कैंसर जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है.

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जब यह केमिकल पौधे के संपर्क में आता है तो यह 'ओमेथिएट' नाम के और ज्यादा जहरीले रूप में बदल जाता है, जो मूल केमिकल से 10 गुना ज्यादा खतरनाक होता है. यह सिस्टेमिक कीटनाशक है, यानी यह पूरे पौधे और फल के अंदर तक समा जाता है. इस वजह से जब तक फसल बाजार पहुंचती है, इसका जहर फल और सब्जी के अंदर तक मौजूद रहता है. इसे धोकर साफ करना भी मुमकिन नहीं है.

यूरोपीय संघ जैसे देशों ने कई बार भारत से भेजी गई चायपत्ती और मसालों की खेप को सिर्फ इसलिए लौटा दिया है क्योंकि उनमें तय मानक से ज्यादा कीटनाशक मिला था. यानी जो चीज विदेशों में इंसानों के खाने लायक नहीं समझी गई, वही भारत के घरेलू बाजार में बिना किसी रोक-टोक के बिक रही है.

किसान इसे इतना क्यों पसंद करते हैं?

भारत में यह कीटनाशक कई अलग-अलग ब्रांड नाम से बिक रहा है. किसानों के बीच यह बहुत पॉपुलर है क्योंकि यह नए और सुरक्षित केमिकल से काफी सस्ता है. इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह एक साथ दो तरह से काम करता है, पौधे के अंदर घुसकर रस चूसने वाले कीड़ों को भी मारता है और सीधे संपर्क में आने वाले कीड़ों को भी खत्म करता है. सफेद मक्खी, थ्रिप्स और माहू जैसे कीड़ों पर इसका तुरंत असर होता है, इसलिए किसान बिना यह जाने कि यह कितना खतरनाक है, इसे बेझिझक इस्तेमाल कर रहे हैं.

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सरकार ने कैसे लटकाया मामला?

साल 2013 से 2015 के बीच डॉ. अनुपम वर्मा कमेटी बनाई गई थी, जिसने कुल 66 कीटनाशकों की जांच की. इस कमेटी ने 18 कीटनाशकों को तुरंत बैन करने की सिफारिश की और बाकी की समीक्षा करने को कहा.

इसके बाद कृषि मंत्रालय ने 14 मई 2020 को एक नया ड्राफ्ट नोटिफिकेशन जारी किया. इसमें डाइमेथोएट समेत 27 सबसे खतरनाक कीटनाशकों पर पूरी तरह बैन लगाने का प्रस्ताव रखा गया. लेकिन कीटनाशक बनाने वाली कंपनियों की ताकतवर लॉबी और सरकारी सिस्टम की सुस्ती के कारण यह फैसला सालों तक फाइलों में अटका रहा.

कंपनियों ने नई-नई कमेटियां बनाकर मामले को टालने की कोशिश की. आखिरकार सरकार ने एक बीच का रास्ता निकाला. केंद्रीय कीटनाशक बोर्ड ने सब्जियों और फलों पर तो कागज पर बैन लगा दिया, लेकिन कपास जैसी इंडस्ट्रियल फसलों के नाम पर इसके '30% EC फॉर्मूले' को बनाने और बेचने की पूरी छूट दे दी. इसी ढील का फायदा उठाकर यह जहर कपास के बहाने खेतों में खुलेआम बिक रहा है और आखिर में आम लोगों की थाली तक पहुंच जाता है.

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मुनाफे का खेल

डाइमेथोएट के पीछे कीटनाशक बनाने वाली कंपनियों की एक बड़ी लॉबी का हाथ है. भारत के कीटनाशक उद्योग में 27 पुराने केमिकल्स की हिस्सेदारी कंपनियों की कुल कमाई का लगभग 20 प्रतिशत है. हर साल हजारों मीट्रिक टन इस जहर का प्रोडक्शन होता है. इतने बड़े मुनाफे और हजारों नौकरियों का हवाला देकर यह लॉबी सरकार पर दबाव बनाए रखती है. इन कंपनियों के लिए किसान या आम लोगों की सेहत से ज्यादा अहम सिर्फ मुनाफा है.

जमीन पर हालात क्या हैं?

सरकार ने कह दिया है कि सब्जी और फल पर इसका इस्तेमाल गैरकानूनी है, लेकिन हर खेत पर नजर रखना मुमकिन नहीं है. दूर-दराज के इलाकों में रहने वाले छोटे किसानों को इन नियमों की कोई जानकारी ही नहीं है. यह केमिकल बाजार में सस्ता मिलता है और टमाटर, बैंगन, भिंडी या मिर्च में लगने वाले कीड़ों को झट से खत्म कर देता है, इसलिए किसान बिना सोचे इसका जमकर इस्तेमाल कर रहे हैं.

अब तक हुए नुकसान

साल 2017 में महाराष्ट्र के यवतमाल में कपास के खेतों में इसी तरह के कीटनाशकों का छिड़काव करते वक्त सुरक्षा के इंतजाम न होने की वजह से 20 से ज्यादा किसानों की दर्दनाक मौत हो गई थी और सैकड़ों लोग हमेशा के लिए अपनी आंखों की रोशनी खो बैठे थे. यह जहर शरीर में जाते ही नर्वस सिस्टम को रोक देता है.

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विकसित देश 'प्रिकॉशनरी प्रिंसिपल' के सिद्धांत पर काम करते हैं, यानी खतरे की हल्की सी आशंका होने पर भी वे तुरंत बैन लगा देते हैं. लेकिन भारत में किसी केमिकल को पूरी तरह हटाने में सालों लग जाते हैं, क्योंकि कानूनी लड़ाइयां खत्म होने का इंतजार किया जाता है.

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आखिर में सवाल किस पर

यह सिर्फ एक कीटनाशक का मामला नहीं है, यह भारत की खाद्य सुरक्षा और जनस्वास्थ्य नीति पर एक बड़ा सवाल है. जिन केमिकल्स को विकसित देशों ने कूड़े में फेंक दिया है, उन्हें कपास और चाय के बहाने भारत के खेतों में बने रहने देना यह दिखाता है कि आज भी कंपनियों का मुनाफा आम नागरिकों की जिंदगी और आने वाली पीढ़ियों के डीएनए से ज्यादा कीमती समझा जा रहा है.

जब तक भारत का अपना जांच तंत्र अंतरराष्ट्रीय मानकों जैसा सख्त नहीं होगा, और जब तक सरकारी फैसले कंपनियों के दबाव से आजाद होकर नहीं लिए जाएंगे, तब तक आम भारतीय अपनी ही थाली में परोसे जा रहे इस धीमे जहर को निगलने पर मजबूर रहेगा.

(किसान तक वेबसाइट पर छपे लेख का पुन: अनुवाद) 

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