मिडिल ईस्ट युद्ध लंबा चला तो दुनियाभर में गहराएगा खाद संकट, खेती पर पड़ेगा असर

ईरान और इज़राइल-अमेरिका के बीच चल रहे युद्ध ने अब दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्ते हॉर्मुज जलडमरूमध्य को खतरे में डाल दिया है. यह रास्ता फारस की खाड़ी को खुला समुद्र से जोड़ता है. अगर यहां जहाजों की आवाजाही लंबे समय तक रुक गई तो सिर्फ तेल और गैस ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की खाद (फर्टिलाइजर) की आपूर्ति पर भी बड़ा असर पड़ेगा.

Advertisement
युद्ध के कारण हो सकता है खाद संकट (फाइल फोटो- AFP) युद्ध के कारण हो सकता है खाद संकट (फाइल फोटो- AFP)

आजतक एग्रीकल्चर डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 12 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 3:28 PM IST

मिडिल ईस्ट युद्ध से जुड़ी ताजा परिस्थितियों के बीच दुनिया के सबसे अहम समुद्री रास्तों में से एक हॉर्मुज जलडमरूमध्य को सीमित या बंद करने की आशंका ने वैश्विक बाजारों में हलचल बढ़ा दी है. अब तक चर्चा मुख्य रूप से तेल और गैस आपूर्ति पर पड़ने वाले असर को लेकर हो रही है, लेकिन इसका असर केवल ऊर्जा बाजार तक सीमित नहीं रहेगा. अगर इस रास्ते से जहाजों की आवाजाही लंबे समय तक बाधित होती है तो दुनिया को एक बड़े खाद संकट का सामना करना पड़ सकता है, जो सीधे वैश्विक खाद्य सुरक्षा को प्रभावित करेगा.

Advertisement

आधुनिक खेती प्राकृतिक गैस और नाइट्रोजन पर निर्भर
आधुनिक कृषि सिर्फ मिट्टी और धूप पर नहीं चलती, बल्कि इसका बड़ा आधार प्राकृतिक गैस से बनने वाली नाइट्रोजन खाद है. 20वीं सदी की शुरुआत में जर्मन वैज्ञानिक फ्रिट्ज हैबर और कार्ल बॉश ने नाइट्रोजन फिक्सेशन की प्रक्रिया विकसित की थी. इसी तकनीक से बड़े पैमाने पर अमोनिया का उत्पादन संभव हुआ, जिससे आगे चलकर यूरिया जैसे नाइट्रोजन उर्वरक बनाए जाते हैं.

यूरिया दुनिया में सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाली नाइट्रोजन खाद है. इसी की मदद से गेहूं, मक्का और चावल जैसी फसलों की पैदावार आज के स्तर तक पहुंच पाती है. यदि इन खादों की आपूर्ति कम हो जाए तो वैश्विक स्तर पर कृषि उत्पादन में बड़ी गिरावट आ सकती है.

वैश्विक यूरिया व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है
दुनिया में जो यूरिया अंतरराष्ट्रीय व्यापार के जरिए भेजा जाता है, उसका लगभग एक तिहाई हिस्सा हॉर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है. फारस की खाड़ी इस व्यवस्था का केंद्र इसलिए है, क्योंकि यहां दुनिया की सबसे सस्ती प्राकृतिक गैस उपलब्ध है, जो अमोनिया और यूरिया उत्पादन के लिए जरूरी होती है.

Advertisement

कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों में वर्षों से भारी निवेश करके अमोनिया और यूरिया उत्पादन क्षमता विकसित की गई है, जिसका बड़ा हिस्सा निर्यात के लिए है. इसी कारण वैश्विक स्तर पर व्यापार होने वाली नाइट्रोजन खाद और उन्हें बनाने के लिए जरूरी एलएनजी का बड़ा भाग इसी समुद्री रास्ते से होकर जाता है.


अगर इस जलमार्ग में बाधा आती है तो सबसे पहले अमोनिया, यूरिया और एलएनजी के शिपमेंट में देरी होगी. जहाजों की आवाजाही रुक सकती है या फिर बीमा और माल ढुलाई की लागत इतनी बढ़ सकती है कि व्यापार बेहद महंगा हो जाए.

लेकिन असली असर कुछ महीनों बाद खेतों में दिखाई देगा. उत्तरी गोलार्ध में बुवाई के मौसम से पहले किसान बड़ी मात्रा में खाद खरीदते हैं. ऐसे में अगर आपूर्ति में कुछ हफ्तों की भी देरी होती है तो खेती की योजना प्रभावित हो सकती है.

किसानों की राह कठिन
अगर खाद समय पर नहीं पहुंचती तो किसानों को कई कठिन फैसले लेने पड़ सकते हैं. उन्हें या तो बहुत ज्यादा कीमत पर खाद खरीदनी पड़ेगी या फिर खेतों में कम मात्रा में खाद डालनी होगी. कई मामलों में फसल का चुनाव भी बदलना पड़ सकता है.

कृषि विज्ञान के अनुसार, नाइट्रोजन की मात्रा में थोड़ी कमी भी उत्पादन पर बड़ा असर डाल सकती है. इसका मतलब है कि वैश्विक स्तर पर लाखों टन अनाज की पैदावार घट सकती है. इसके बाद असर केवल अनाज तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि पशु चारा, पशुपालन, बायोफ्यूल उद्योग और अंततः खुदरा खाद्य कीमतों तक पहुंच जाएगा.

Advertisement

कई बड़े देश भी आयात पर निर्भर
कई देशों के पास अपनी खाद उत्पादन क्षमता है, लेकिन पूरी तरह आत्मनिर्भर होना दुर्लभ है. उदाहरण के लिए भारत अपने घरेलू यूरिया संयंत्र चलाने के लिए फारस की खाड़ी से बड़ी मात्रा में एलएनजी आयात करता है.

ब्राजील अपनी सोयाबीन और मक्का खेती के लिए नाइट्रोजन और फॉस्फेट उर्वरकों का बड़ा हिस्सा आयात करता है. यहां तक कि अमेरिका, जो दुनिया के बड़े उर्वरक उत्पादकों में शामिल है, वह भी क्षेत्रीय मांग पूरी करने और कीमतों को नियंत्रित रखने के लिए अमोनिया और यूरिया का आयात करता है.

उधर उप-सहारा अफ्रीका में पहले ही खाद का इस्तेमाल कम है. अगर कीमतें और बढ़ती हैं तो वहां खाद का उपयोग और घट सकता है, जिससे उत्पादन और खाद्य सुरक्षा दोनों प्रभावित होंगे.

असर केवल नाइट्रोजन तक सीमित नहीं
यह संकट केवल नाइट्रोजन खाद तक सीमित नहीं रहेगा. सल्फर भी पौधों के लिए जरूरी पोषक तत्व है और यह मुख्य रूप से तेल और गैस प्रसंस्करण का उप-उत्पाद होता है. अगर हॉर्मुज से ऊर्जा आपूर्ति बाधित होती है तो सल्फर उत्पादन भी घट सकता है, जिससे खाद उत्पादन पर और दबाव पड़ेगा.

सिंथेटिक नाइट्रोजन उत्पादन ऊर्जा बाजार से गहराई से जुड़ा है, क्योंकि इसे प्राकृतिक गैस से लगातार बनाया जाता है. गैस आपूर्ति या अमोनिया व्यापार में बाधा आने का मतलब है कि वैश्विक स्तर पर नाइट्रोजन की उपलब्धता तुरंत सीमित हो जाएगी.

Advertisement

नई क्षमता बनाना आसान नहीं
अगर फारस की खाड़ी से उर्वरक निर्यात में बड़ी कमी आती है तो उसकी भरपाई जल्दी संभव नहीं है. नए अमोनिया संयंत्र स्थापित करने में कई साल लगते हैं और इसके लिए भारी निवेश की जरूरत होती है.

इस दौरान वैश्विक बाजार में कीमतें बढ़ेंगी, व्यापार मार्ग बदलेंगे और किसानों को अनिश्चित परिस्थितियों में बुवाई के फैसले लेने पड़ेंगे. इतिहास बताता है कि खाद्य कीमतों में तेज वृद्धि कई बार सामाजिक असंतोष को भी बढ़ाती है.

ऊर्जा से आगे बढ़कर खाद्य सुरक्षा का संकट
केंद्रीय बैंक अक्सर तेल और ईंधन से जुड़ी महंगाई पर ज्यादा ध्यान देते हैं. लेकिन खाद की कमी का असर धीरे दिखाई देता है. पेट्रोल की कीमतें तुरंत बदल जाती हैं, जबकि फसल की पैदावार पर असर कई महीनों बाद सामने आता है.

फिर भी इसका प्रभाव ज्यादा व्यापक हो सकता है. हॉर्मुज जलडमरूमध्य ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी है. अगर यहां लंबी अवधि तक बाधा आती है तो इसका असर केवल कच्चे तेल की कीमतों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि दुनिया के खाद्य तंत्र की स्थिरता भी परखी जाएगी.

सरल शब्दों में कहा जाए तो तेल कारों को चलाता है, लेकिन नाइट्रोजन फसलों को बढ़ाता है. अगर हॉर्मुज जलडमरूमध्य बंद होता है तो सबसे बड़ी कीमत शायद तेल नहीं, बल्कि दुनिया को भोजन उपलब्ध कराने की लागत हो सकती है. 
 

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement