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सरकारी दावों-आंकड़ों के बीच तेज होता किसान आंदोलन, कैसे होगा समाधान?

किसानों का आंदोलन अब 13 महीने लंबा हो चुका है. दिल्ली के जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन कर रहे किसान अभी भी अपनी मांगों पर कायम हैं. उनका साफ कहना है कि बिना किसी समझौते के केंद्र द्वारा तीनों कृषि कानूनों को वापस लिया जाए.

किसानों का विरोध प्रदर्शन ( फोटो- इंडिया टुडे) किसानों का विरोध प्रदर्शन ( फोटो- इंडिया टुडे)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • किसान और केंद्र के बीच तकरार
  • सरकारी दावों-आंकड़ों के बीच तेज होता किसान आंदोलन
  • बातचीत का प्रस्ताव, किसान मांगों पर अड़े

किसानों का आंदोलन अब 13 महीने लंबा हो चुका है. दिल्ली के जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन कर रहे किसान अभी भी अपनी मांगों पर कायम हैं. उनका साफ कहना है कि बिना किसी समझौते के केंद्र द्वारा तीनों कृषि कानूनों को वापस लिया जाए. अब किसानों के इस रवैये के बीच केंद्र की तरफ से फिर सकारात्मक प्रतिक्रिया देखने को मिली है.

गुरुवार को कृषी मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने फिर किसानों के लिए बातचीत का रास्ता खोल दिया है. कहा गया है कि सरकार बातचीत करने को तैयार है और तमाम मसलों पर विस्तार से चर्चा की जाएगी. वहीं सरकार की तरफ से ये भी सुझाव दिया गया है कि कुछ छोटे ग्रुप बनाए जा सकते हैं जो कृषि कानूनों के एक-एक क्लॉज पर विस्तार से बातचीत कर सकते हैं. इन ग्रुप में किसान नेताओं को ही शामिल किया जा सकता है.

किसान और केंद्र के बीच तकरार

अभी के लिए किसानों द्वारा सरकार के इस प्रस्ताव को भी ठुकरा दिया गया है. उनकी मांग सिर्फ कृषि कानूनों के खत्म होने तक सीमित है. वो उसके बाद ही बातचीत को तैयार दिखाई दे रहे हैं. वहीं सरकार इस रवैये से खुश नहीं है. कृषि मंत्री ने जोर देकर कहा है कि हम किसानों की समस्या सुलझाने को तैयार हैं. लेकिन वे अभी तक हमारे कानूनों में कोई खामी नहीं बता पाए हैं. वो सिर्फ एक ही मांग पर अड़े हैं. हो सकता है किसी क्लॉज से दिक्कत हो, लेकिन पूरे कानून को ही गलत बताना ठीक नहीं है.

अब विपक्ष और किसान सरकार की इस दलील से सहमत नहीं हैं. उनके मुताबिक जो बातचीत का प्रस्ताव अभी दिया जा रहा है, ये कानून बनाने से पहले दिया जाना चाहिए था. किसानों का भी यहीं आरोप है कि सरकार ने कानून बनाने से पहले उनसे राय नहीं ली. इस मुद्दे पर किसान और केंद्र के बीच सीधी टक्कर है क्योंकि सरकार ने दावा किया है कि उनकी तरफ से राज्य सरकारों संग पिछले साल 21 मई को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए इस मुद्दे पर बातचीत हुई थी. तमाम पार्टियों से तब फीडबैक लिया गया था.

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार

वैस किसान आंदोलन के बीच समस्या का समाधान निकालने के लिए एक चार सदस्य कमेटी भी बनाई गई है. उस कमेटी की तरफ से एक रिपोर्ट भी सुप्रीम कोर्ट दे दी गई है, लेकिन अब तक कोई फैसला नहीं हुआ है. ऐसे में कृषि कानूनों पर अभी के लिए रोक लगी हुई है लेकिन समस्या का समाधान दूर है.

अब किसान आंदोलन जरूर लंबे समय से जारी है, लेकिन देश के कृषि सेक्टर पर इसका ज्यादा प्रभाव नहीं दिखा है. सरकारी आंकड़े बताते हैं कि इस साल रबी सीजन में गेहूं की सरकार द्वारा बड़ी मात्रा में खरीद हुई है. सिर्फ मई महीने तक सरकार ने 390.68 LMT गेहूं खरीदा है. वहीं कई राज्यों सरकारों के कहने के बाद केंद्र द्वारा नोडल एजेंसियों के जरिए बड़ी मात्रा में दाल की खरीद भी की गई है. 6,91,581.09 MT मूंग, तुअर, मसूर, सोयाबीन खरीदी जा चुकी है.

आंदोलन का कृषि सेक्टर पर असर?

ऐसे में किसानों का आंदोलन जरूर जारी है, लेकिन कृषि के क्षेत्र में काम लगातार हो रहा है. सरकार भी इसे अपनी उपलब्धि के तौर पर दिखाने की कोशिश कर रही है. अब तो नाराज किसानों को मनाने के लिए सरकार ने हाल ही में मंडियों को लेकर भी बड़ा फैसला किया है. मंडियों के जरिए किसानों तक एक लाख करोड़ रुपये पहुचांने की बात कही गई है. वहीं मंडियों को पहले से ज्यादा मजबूत करने पर भी जोर दिया गया है.

इसके अलावा अब किसानों को डायरेक्ट बैंक ट्रांसफर के जरिए पैसे मिल रहे हैं. सरकार की माने तो पहले बिचौलियों द्वारा भ्रष्टाचार किया जाता था, किसानों तक पैसे नहीं पहुंचते थे, लेकिन अब डायरेक्ट बैंक ट्रांसफर की वजह से किसानों को बिचौलियों से मुक्त कर दिया गया है. लेकिन इस सब के बावजूद अभी किसान और सरकार के बीच एक खाई पैदा हो गई है जिसको पाट पाना बड़ी चुनौती है.

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