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घने जंगलों के बीच लेमन ग्रास, इमली, करंज की खेती कर महिलाएं बन रही हैं आत्‍मनिर्भर

आजीविका वनोत्पज मित्र सुषमा समद ने बताया कि पहले क्षेत्र की महिलाएं काम के अभाव में शराब तक बेचती थीं, लेकिन आज परिस्थितियां बदली हैं. उन्‍होंने बताया कि महिलाएं संगठन से जुड़कर अब प्रतिवर्ष करीब 20 से 25 हजार रुपये अर्जन कर लेती हैं. 

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'महिलाएं आज किसी से कम नहीं', यही साबित कर रही सिमडेगा जिले के घने जंगलों के बीच बसे गांव की ग्रामीण जनजातीय महिलाएं. ये महिलाएं अपने लगन-जज्बे से बदलाव की नई इबारत लिख रहीं हैं. सिमडेगा के ठेठईटांगर प्रखंड के राजाबासा पंचायत के केसरा गांव में महिला सशक्तिकरण ने न सिर्फ गांव के संस्कार बदले, बल्कि गांव के प्रगति के रास्ते भी प्रशस्त किए.  

महिलाएं जंगलों में निशुल्क मिलने वाले बहेरा, हर्रे, कुसुम, चिरौंजी, लेमन ग्रास, तुलसी, लाह, डोरी, इमली, इमली के बीज आदि का संग्रह और प्रोसेंसिंग कर अर्थोपार्जन कर रही हैं. केसरा गांव में 30-35 महिलाओं को मिलाकर बनाया गया महिला उत्पादक समूह आज इन वनोत्पादों का न सिर्फ संग्रह करवाती है, बल्कि इन सबका बेहतर भंडारण, प्रोसेंगिक से लेकर बिक्री तक का कार्य बखूबी संभालती हैं.

कुछ वर्षों पहले तक राजाबासा का इलाका काफी पिछड़ा माना जाता था. गांव में जाने के लिए अच्छी सड़कें भी नहीं होती थीं. वहीं मुंडा बहुल क्षेत्र होने के कारण लोग भाषाई समस्या के कारण भी आधुनिकता से कटे हुए थे. घर घर शराब बनता था और महिलाएं शराब बेचा करती थीं. इसके बाद झारखंड राज्य आजीविका मिशन प्रमोशन सोसायटी से जुड़कर गांव की जनजातीय महिलाओं ने न सिर्फ खुद को हुनरमंद बनाया, बल्कि कारोबारी कुशलता भी हासिल की. 

आजीविका वनोत्पज मित्र सुषमा समद ने बताया कि पहले क्षेत्र की महिलाएं काम के अभाव में शराब तक बेचती थीं, लेकिन आज परिस्थितियां बदली है. जंगलों में पाए जाने वाले औषधीय गुण वाले फल यथा-हरे, बहेरा, इमली के बीज का कोई उपयोग नहीं होता था. इसके अलावा इमली फूल, लेमन ग्रास व चिरौंजी, डोरी, करंज आदि का संग्रह कार्य में महिलाएं जुटीं हुईं हैं. उन्‍होंने बताया कि महिलाएं संगठन से जुड़कर अब प्रतिवर्ष करीब 20 से 25 हजार रुपये अर्जन कर लेती हैं. 

उन्‍होंने बताया कि अगर भंडारण की व्यवस्था तथा तकनीकी सहयोग मिले, तो जनजातीय महिलाएं और तरक्की कर सकती हैं. राजाबासा पंचायत की मुखिया ग्लोरिया समद ने कहा कि अब उन्हें काफी अच्छा लगता है गांव की महिलाएं गांव में ही रहकर अर्थोपार्जन कर रहीं हैं. गांव में अब शराब नहीं बनता, बल्कि यहां की महिलाएं खुद का कार्य स्वाभिमान के साथ कर रहीं हैं. इन महिलाओं की लगन देख उन्हें और बढ़ावा देने के लिए प्रखंड प्रशासन तकनीकी सहयोग देने के साथ-साथ भंडारण के लिए भी संसाधन मुहैया करने के लिए मदद के हाथ बढ़ा रहा है.

(सत्यजीत कुमार के साथ सुनील सहाय रिपोर्ट)

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