scorecardresearch
 

यूरोप में ऑनलाइन अतीत को हटाने के लिए क्यों एकजुट हो रहे हैं लोग?

'राइट टू रिमूव' के तहत ब्रिटेन चाहता है कि 18 साल से कम उम्र के इंटरनेट यूज़र्स को पुराने पोस्ट हटाने का अधिकार मिले.

Advertisement
X

जिस तरीके से जीवन में तकनीक पर निर्भरता बढ रही है वह व्यापक तौर पर लोगों की जिंदगी को प्रभावित भी कर रहा है. एक तरफ जहां लोग तकनीक के लाभ ले रहे हैं वहीं कई मायनों में यही तकनीक लोगों की मुश्किलें भी बढ़ा रहा है. तकनीक से ही उत्पन्न एक समस्या आज यूरोप और ख़ासकर ब्रिटेन में चर्चा का बड़ा मुद्दा बन गया है. ये मुद्दा है ऑनलाइन अतीत को लेकर. इंटरनेट आज की जीवनशैली का हिस्सा है लेकिन क्या इंटरनेट पर सक्रियता का अतीत किसी के लिए मुश्किल बन सकता है. हां, यूरोप में आज ये सवाल एक बड़ी चर्चा को जन्म दे चुका है. ऑनलाइन अतीत को मिटाने की मुहिम ब्रिटेन और यूरोप के अधिकांश हिस्सों में तेजी पकड़ रही है. 'राइट टू रिमूव' के तहत ब्रिटेन चाहता है कि 18 साल से कम उम्र के इंटरनेट यूज़र्स को पुराने पोस्ट हटाने का अधिकार मिले. ब्रिटेन में कई मंत्री भी ऑनलाइन अतीत को मिटाने यानी लोगों के लिए 'राइट टू रिमूव' के समर्थन में आ गए हैं. दरअसल इस पूरी कहानी की शुरुआत हुई....जब लोगों ने इंटरनेट पर अपनी सक्रियता और जीवन के विभिन्न पड़ावों पर उनमें आए अंतर में तालमेल बनाने की कोशिश की. लोग इसे सामाजिक बदलाव के रूप में भी देख रहे हैं. यानी कि कैसे तकनीक इंसान के सामाजिक जीवन पर भी अपना प्रभाव छोड़ने लगा है ये मुद्दा भी यहां दिखता है.

ब्रिटेन में हाल में अभियान शुरू
ब्रिटेन में इसे लेकर एक अभियान हाल ही में शुरू किया गया है. 'आई राइट्स' नाम की इस मुहिम की शुरुआत इस विचार पर आधारित है कि युवाओं के पास ख़ुद के बनाए गए इंटरनेट कंटेट को आसानी से संपादित या मिटाने का अधिकार होना चाहिए. इस मुहिम को ब्रिटेन के इंटरनेट सुरक्षा मामलों के मंत्री का भी समर्थन मिल गया है. इस कदम का मक़सद आज की डिजिटल पीढ़ी को सशक्त करना है. यूरोप में पांच साल से लोग 'राइट टू फ़ॉरगोटेन' का इस्तेमाल कर रहे हैं. इसी का विस्तार 'राइट टू रिमूव' है. लेकिन इस प्रस्ताव को लेकर विवाद भी शुरू हो गया है. आप इंटरनेट पर एक ऐसे बटन के बारे में कल्पना करें जो आपकी पिछली ऑनलाइन गतिविधियों को हमेशा के लिए हटा दे.

यूरोपीय अदालतों का फैसला
यूरोप में जब ये मामला तूल पकड़ने लगा को मानवाधिकार अदालतें इसमें आगे आईं. यूरोपीय मानवाधिकार कोर्ट ने पिछले साल आदेश दिया कि यूरोपीय क्षेत्र के उन नागरिकों के वैसे वेबपेज डिलीट किए जाएं जिनका उनके लिए कोई महत्व नहीं हैं या फिर संबंधित व्यक्ति उसकी मांग करता है. पिछले साल गूगल ने राइट टू फॉरगॉटेन के तहत एक लाख 70 हजार URL डिलीट किए थे. वर्तमान आंकड़ों के मुताबिक दुनिया के सबसे लोकप्रिय इंटरनेट सर्च इंचन गूगल की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार वे वैसे पांच लाख URL डिलीट कर चुके हैं. कंपनी की ओर से बताया गया कि इन URLs पर फैसले के लिए इनका पूरा अध्ययन कराया गया.

सर्ज इंजन के अपने नियम
इसके लिए यूरोपीय अदालतों ने लोगों को राइट टू फॉरगॉटेन दिया. हालांकि, इसके लिए लोगों को एक वेब फॉर्म भरना पड़ेगा. इसका मतलब है कि URL डिलीट करने का अनुरोध उपभोक्ताओं की ओर से आना चाहिए. कंपनी अपनी ओर से वेबपेज को डिलीट करने के लिए कदम नहीं उठाएगी. कंपनी को अगर दी गई जानकारी पर कुछ संदेह होता है तो फिर आवेदन करने वाले से जवाब मांगा जाता है और पूरी तरह संतुष्ट होने पर ही कंपनी URL को डिलीट करने का फैसला करती है.

सबसे ज्यादा आवेदन गूगल के पास

यूरोपीय अदालत के इस फैसले के बाद गूगल को इस तरह के करीब 10 लाख आवेदन आए. सबसे ज्यादा URL डिलीट किए गए फेसबुक पर..कुल 3332. दूसरे नंबर पर रहा Profileengine जहां से 3,289 URL डिलीट किए गए. YouTube तीसरे नंबर पर रहा जहां से 2,392 URL हटाए गए.

सभी आवेदन स्वीकार नहीं
गूगल को कुल 1,027,207 लिंक्स को डिलीट करने का अनुरोध मिला था लेकिन उसने सही पाए गए केवल 58.7 फीसदी लिंक्स को ही डिलीट किया. बाकी के 41.3 आवेदनों को कंपनी ने सही नहीं माना. इन आवेदनों में से ज्यादातर फ्रांस, जर्मनी, ग्रेट ब्रिटेन, स्पेन और इटली से आए. हालांकि, गूगल ने यूरोप में ये सारे आवेदन google.fr और google.co.uk जैसे स्थानीय डोमेन वाले आवेदनों को ही स्वीकार किए हैं और कंपनी .com वाले डोमेन से आवेदनों पर अभी विचार नहीं कर रही.

रूसी संसद की ओर से भी कदम

यूरोपीय राइट टू फॉरगॉटेन की तरह रूस की संसद ने भी इसी से मिलता-जुलता एक प्रस्ताव पारित किया है जिसके अनुसार स्थानीय और विदेशी सर्ज इंजन को लोगों की निजी जानकारियों वाले पुराने URL डिलीट करने का अनुरोध स्वीकार करना पड़ेगा. यह विधेयक जनवरी
2016 से लागू होने वाला है.

क्या कारण हैं इन आशंकाओं के?

इन पूरी मांग की कहानी लोगों के सामाजिक व्यवहार और समय-समय पर उनमें आने वाले बदलावों को लेकर हैं. इस मुहिम को शुरू करने वाले बारोनेट बीबन कीडरॉन के अनुसार-, 'नाबालिग किशोर और नौजवान सामाजिक और विकास संबंधी बदलावों से गुजरते ये पाते हैं कि 14-15 साल की उम्र में किए गए उनके काम सही नहीं थे.' इंटरनेट पर लंबे वक्त तक मौजूद रहने वाले ये ग़लत फ़ैसले और परेशान करने वाले सबूत असहज कर देते हैं और कभी-कभी तो फंसा भी देते हैं. इनसे पीछा छुड़ाने का 'आसान और सीधा' तरीका होना चाहिए.

समाज में गहरे बदलावों से जुड़ा
उनका मानना है कि इंटरनेट पर बचपन के निशान स्थायी नहीं होने चाहिए. उनका कहना है, 'व्यक्तिगत प्रयोग बचपन का एक जरूरी हिस्सा
होता है. इंटरनेट से यह ना कभी हटता है और ना ही इंटरनेट इसे कभी सही करता है.' राइट टू रिमूव समाज में होने वाले गहरे बदलावों को दर्शाता है.

डिजिटल युग का बदलाव
इस मामले पर ऑक्सफ़ोर्ड के प्रोफेसर विक्टर मेयर स्कोनबर्गर का कहना है, 'यह डिजिटल युग में होने वाला एक बड़ा बदलाव है.' प्रोफेसर विक्टर मेयर स्कोनबर्गर 'डिलीट: द वर्चू ऑफ़ फ़ॉरगेटिंग इन द डिजिटल एज' किताब के लेखक हैं. इंटरनेट की स्थायी रूप से एक मेमोरी तैयार
हो जाती है जिसे कभी भी देखा जा सकता है. ट्विटर और फ़ेसबुक जैसे सोशल नेटवर्किंग साइट से हटाए गए पोस्ट फिर से ऑनलाइन सर्च में आ सकते हैं.

कानूनी विवाद भी आते हैं सामने
ये पोस्ट असहज कर देने वाली तस्वीरों के अलावा आपराधिक दोष और क़ानूनी विवाद के रूप में हो सकते हैं. यौन हिंसा, धौंस या दूसरी तरह के उत्पीड़न के शिकार पीड़ितों के लिए ख़ासतौर पर यह स्थिति तनावपूर्ण होती है. आई राइट्स मुहिम के तहत मिलने वाला 'डिलीट ऑप्शन' नाबालिगों को निजता के अधिकार के मामले में एक विशेषाधिकार साबित होगा. कई बार लोग जो कम उम्र में सोच रखते हैं वह आने वाले वक्त के उनके जीवन से काफी अलग होता है. कई बार ये अतीत लोगों के लिए मुश्किल का कारण बन जाता है. राजनीति के क्षेत्र में आने वाले लोगों को भी कई बार अतीत में किए गए काम को इंटरनेट से निकालकर उनके खिलाफ हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है.

कितना कारगर होगी मुहिम?
इस फ़ैसले ने इस बहस को जन्म दिया है कि अतीत को मिटाना कितना कामयाब हो सकता है. कंप्यूटर एंड कम्युनिकेशन एसोसिएशन से जुड़े
फ़ेसबुक, गूगल और माइक्रोसॉफ्ट के सदस्यों का कहना है कि यह मामला यूरोप में 'निजी सेंसरशिप को बड़े स्तर' पर बढ़ावा देगा. 'डिलीट बटन' के साथ ही भूल जाने का अधिकार और अभिव्यक्ति की असीमित स्वतंत्रता के बीच बहस छिड़ गई है. भारत में भी कई ऐसे मामले देखने को मिलते हैं जिसमें इंटरनेट पर मौजूद अतीत किसी भी व्यक्ति के लिए बड़ी मुसीबत साबित होता है. यूरोप में राइट टू रिमूव की ये मुहिम आज नहीं तो कल भारत में भी उठेगी. भारत में पिछले कुछ दशकों में इंटरनेट आम जीवन के साथ-साथ कार्यशैली का भी हिस्सा बन गया है. करोड़ों मोबाइल और इंटरनेट उपभोक्ताओं वाले देश भारत में भी ऑनलाइन अतीत को हटाने की मुहिम तेज हो सकती है.

Advertisement
Advertisement