भारत-चीन के तनाव के बीच नेपाल-चीन की नजदीकियां बढ़ती जा रही हैं. पूरी दुनिया हॉन्ग कॉन्ग की स्वायत्तता के मुद्दे पर चीन की नीतियों का विरोध कर रही है लेकिन नेपाल ने हाल ही में उसकी 'वन चाइना पॉलिसी' का खुलकर समर्थन किया. नेपाल ने भारत से लिपुलेख को लेकर सीमा विवाद में भी चीन को शामिल कराने की तमाम कोशिशें कीं. इन तमाम घटनाक्रमों के बीच नेपाल और चीन ने आर्थिक साझेदारी मजबूत करने की दिशा में भी एक बड़ा कदम उठा लिया है.
अब चीन ने तिब्बत रूट के जरिए हर सप्ताह नेपाल को सामान पहुंचाना शुरू कर
दिया है, हालांकि इसे लेकर मीडिया में कोई खास चर्चा नहीं है. पिछले सप्ताह
ही, चीन के शियान प्रांत से मेडिकल आपूर्ति और निर्माण कार्य की सामग्री
लेकर पहला कार्गो तिब्बत के शिगात्से पहुंचा. नेपाल के लिए 390 टन और 13
लाख डॉलर का सामान लेकर एक और कार्गो चीन के लांझाओ से तिब्बत के शिगात्से
पहुंचा है.
भारतीय सीमा पर 2015 के दौरान अघोषित आर्थिक नाकेबंदी के बाद से ही नेपाल
में भारत पर अपनी निर्भरता कम करने की मांग उठने लगी थी. चीन ने इस मौके को
लपकने में देर नहीं की और 2016 में नेपाल-चीन ट्रांजिट ट्रांसपोर्ट समझौते
पर दोनों देशों ने हस्ताक्षर कर दिए.
नेपाल-चीन ट्रांजिट ट्रांसपोर्ट समझौते के तहत, नेपाल को चीन के पूर्वी समुद्री बंदरगाहों तियानजिन, शेंझेंन, लियानयुंगैंग और झांझियांग के अलावा ल्हासा, लाझांओ और शिगात्से तक सड़क मार्ग के जरिए प्रवेश की अनुमति दी गई है.
अंतरराष्ट्रीय जहाजों को भारतीय बंदरगाहों से
होते हुए काठमांडू सामान पहुंचाने में करीब 35 दिनों का वक्त लगता है लेकिन नेपाल के कुछ विश्लेषक दावा कर रहे हैं कि नए कॉरिडोर के बनने से नेपाल तक माल की ढुलाई में बेहद कम वक्त लगेगा. दरअसल, चीन नेपाल में भारत का विकल्प बनना चाहता है और इसके लिए वह नेपाल
से कनेक्टिविटी बढ़ाने के लिए एक रेलवे लाइन बनाने पर भी काम कर रहा है.
बीजिंग में नेपाल के कार्यवाहक राजदूत सुशील लमसल ने कहा, नए कॉरिडोर के जरिए यातायात सुविधाजनक और समय की बचत करने वाला होगा. इसके अलावा, लागत के मामले में भी यह प्रतिस्पर्धी रहेगा. हम भविष्य में अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए भी चीनी बंदरगाहों का और ज्यादा इस्तेमाल करेंगे.
हालांकि, चीनी रूट से व्यापार करना नेपाल के लिए इतना आसान भी नहीं है. चीन मेनलैंड से तिब्बत के शिगास्ते पहुंचने में ट्रेन को करीब 10 दिनों का वक्त लगता है. इसके बाद, सामान को ट्रकों में लोड कराया जाता है और नेपाल के बॉर्डर तक पहुंचने में दो दिनों का वक्त और लगता है. 2015 के भूकंप के बाद से नेपाल की तरफ की सड़कों की हालत खराब है और सामान को नेपाल के भीतर ले जाने के लिए छोटो-छोटी लॉरियों में लादना पड़ता है.
चीन से नेपाल को सामान मंगाना भारत की तुलना में महंगा भी पड़ेगा. कई एक्सपर्ट्स का कहना है कि शियान-नेपाल कॉरिडोर की तुलना में भारत के कोलकाता बंदरगाह से नेपाल सामान पहुंचाना ज्यादा सस्ता और सुविधाजनक है.
नेपाल चैंबर ऑफ कॉमर्स के सदस्य राजेश काजी श्रेष्ठ ने भी भारत और चीन में से विकल्प चुनने को लेकर सावधानी बरतने की सलाह दी है. उन्होंने कहा कि नेपाल के व्यापारियों को चीन के समुद्री-सड़क मार्ग का चुनाव करने से पहले लागत का ठीक तरह से आकलन करना चाहिए.
इसके अलावा, नेपाल के पहाड़ों में इन्फ्रास्ट्रक्चर खड़ा करना भी एक बड़ी चुनौती होगी. भ्रष्टाचार व अन्य वजहों से परियोजनाओं की लागत भी बढ़ रही है. नेपाल फ्रीट फॉरवार्डर्स एसोसिएशन के प्रकाश सिंह कार्की ने कहा, दलालों और भ्रष्टाचार की वजह से केरूंग से काठमांठू तक प्रति कंटेनर की कीमत 4 लाख पड़ रही है इसीलिए हम कोलकाता वाले लंबे रूट को ही प्राथमिकता दे रहे हैं. अगर भविष्य में इन समस्याओं का समाधान हो जाता है तो फिर हम चीन के मार्ग पर विचार करेंगे.