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'मैं दबंग तबियत वाला हूं'... डीपी यादव की किताब 'वक्त साक्षी है' का हुआ विमोचन

पूर्व मंत्री डीपी यादव की कविता संग्रह 'वक़्त साक्षी है' का विमोचन किया गया. इस दौरान पूर्व सांसद डीपी यादव ने कहा कि मैं यह नहीं कहता कि मैं कोई दार्शनिक हूं, लेकिन हां... मेरा अपना एक जीवन दर्शन है, मैंने जिंदगी को सदैव अपने नजरिए से देखा, परखा और समझा है.

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वेद प्रताप वैदिक ने किया डीपी यादव की किताब का विमोचन
वेद प्रताप वैदिक ने किया डीपी यादव की किताब का विमोचन

नई दिल्ली के प्रगति मैदान में विश्व पुस्तक मेले के आठवें दिन लेखक मंच पर पूर्व मंत्री डीपी यादव की कविता संग्रह 'वक़्त साक्षी है' का विमोचन किया गया. इस दौरान पूर्व सांसद डीपी यादव ने कहा कि मैं यह नहीं कहता कि मैं कोई दार्शनिक हूं, लेकिन हां... मेरा अपना एक जीवन दर्शन है, मैंने जिंदगी को सदैव अपने नजरिए से देखा, परखा और समझा है.

डीपी यादव ने कहा, 'मैंने लहलहाते खेतों से लेकर सत्ता के चमकते गलियारों और जेल की सीलन भरी कोठरियों तक को नजदीक से देखा है. परिस्थितियां कैसी भी रही हों, मैंने कभी हार नहीं मानी, कभी अपना हौसला नहीं टूटने दिया. ज़्यादातर लोग सिर्फ सफलता की चमक देखते हैं लेकिन इस चमक के पीछे छुपी थकन, तड़प और घुटन पर उनकी नजर नहीं जाती.'

पूर्व मंत्री डीपी यादव ने आगे कहा, 'मेरी यात्रा का वो पक्ष, जो कुछ अनदेखा, अनजाना रह गया है वो इस काव्य-संग्रह के माध्यम से आप सबके समक्ष प्रस्तुत है. मुझे पूरा विश्वास है कि पाठकों विशेषकर युवाओं को इन कविताओं से प्रेरणा मिलेगी और जीवन को सदैव एक सकारात्मक दृष्टिकोण से देखने की दृष्टि भी.'

इस दौरान वाणी प्रकाशन की निदेशक अदिति माहेश्वरी ने बताया कि पूर्व मंत्री डीपी यादव के इस कविता संग्रह में 100 से अधिक कविताएं हैं और कुछ कविताएं पिछले चार-पांच दशकों के राजनीतिक और सामाजिक परिवेश में घटी प्रमुख घटनाओं को रेखांकित करती हुई प्रतीत होती हैं.

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ये किताब वाणी प्रकाशन की ऑफिशियल वेबसाइट सहित ऑनलाइन शॉपिंग पोर्टल्स पर भी उपलब्ध है. आज़ादी के अमृत महोत्सव के अवसर पर प्रकाशित हुई इस पुस्तक को डीपी यादव ने अपने पिता- स्वतंत्रता सेनानी स्व० महाशय तेजपाल यादव समेत आज़ादी के महायज्ञ में अपनी आहुति देने वाले सभी पुण्यात्माओं की पावन स्मृति को सादर समर्पित की है.

'वक़्त साक्षी है' की कुछ चुनिंदा रचनाएं- 
    
मैं दबंग तबियत वाला हूं,
इससे तो कोई इन्कार नहीं।
पर बेग़ैरत-सी बातों से,
मेरा कोई सरोकार नहीं।

जोखिम और चुनौती के,
हर कदम पर चलकर देखा है।
कमजर्फ और क़ायरों का,
मैं कभी भी पैरोक़ार नहीं।
    *****

यह मन मेरा क्यों व्याकुल है,
मुझमें क्या ढूँढता रहता है।
जिनके उत्तर मुझे ज्ञात नहीं,
वो प्रश्न पूछता रहता है।

कर्मों की एक सघन रेखा,
कितनी मुश्किल से खींची थी।
फिर सफलता का शिखर पटल, 
मुझसे क्यों रूठा रहता है।
    *****

मन की बातें कौन सुनेगा,
किसको बताऊँ मन की बात।
रह-रहकर मन में रह जाते,
उठते हुए सारे जज़्बात।

मेरा मन भी उतना उजला,
पूर्णिमा का चाँद है जितना।
बिजली भी उसमें है इतनी,
बादल में जितनी बरसात।
    *****

ध्यान से सुन लो बच्चो मेरे,
मैं वसीयत लिख जाऊँगा।
खेतों में बो देना मुझको,
फसलों में तेरी लहराऊँगा|

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कर्मठता की भूमि पर चलकर,
मैंने ख़ुद को पाला है।
मुझे यकीन है मरकर भी, 
जीवन तुमको दे जाऊँगा।
    *****

आओ जिन्दगी जीने के लिये,
तुमको मैं इनवाइट करता हूँ।
जीवन के अहम मसलों से,
मैं रोजाना फाईट करता हूँ।

जीवन में एक विश्वास बना,
तू भूमण्डल की ताकत है।
खुशबू से भरे अभ्यारण में, 
मैं रोज़ाना फाईट करता हूँ।
        *****

तेरी दुनिया में जीने का,
मुझे कोई अफ़सोस नहीं।
तेरे अहसानों को न मानूं,
मैं अहसान फ़रामोश नहीं।

सब रचना तेरे हाथों की,
तू ही तो है रौनक सारी।
तू हिम्मत है, तू साहस है,
बिन तेरे कोई संतोष नहीं ।
        *****

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