अमेरिका और चीन के बीच चल रहे ट्रेड वॉर के कारण कई कंपनियों के उत्पादों पर बैन लगाया जा रहा है. अमेरिका ने चीन की जिन कंपनियों को ब्लैक लिस्टेड कर रखा है उनमें से सबसे ज्यादा चर्चा चीनी कंपनी हुवावे (Huwaei) की हो रही है. क्योंकि टेलीकॉम उपकरण बनाने वाली दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी है. अमेरिका के बैन के बाजवूद यह कंपनी नंबर एक स्थान पर बनी हुई है.
हुवावे को एक मामूली कंपनी से दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी बनाने का श्रेय फाउंडर रेन झेंगफेई को जाता है. बताया जाता है कि उन्हें एक जमाने में नौकरी से हाथ धोना पड़ा था, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और खुद की कंपनी हुवावे टेक्नोलॉजीस शुरू की. जो आज दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी बन गई है.
रेन झेंगफेई की कहानी की शुरुआत 1949 से होती है जब चीन में कम्युनिस्ट सरकार बनी. इससे पहले यहां केएमटी पार्टी की सरकार थी. जहां रेन झेंगफेई के पिता केएमटी सरकार की हथियारों की फैक्ट्री में क्लर्क के तौर पर काम करते थे.
इसलिए आगे चलकर रेन ने पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ज्वॉइन की, लेकिन उन्हें मिलिट्री रैंक नहीं दिया गया. वो चीनी सेना की आईटी रिसर्च यूनिट में काम करने लगे. 1982 में चीन ने सेना से कई सैन्य और असैन्य कर्मचारियों की छंटनी की. जिसके कारण 38 साल की उम्र में ही रेन को रिटायरमेंट लेना पड़ा.
इसके बाद रेन शेनझेन शहर शिफ्ट हुए. यहां उन्होंने कई इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनियों में काम किया. फिर 1987 में रेन ने हुवावे टेक्नोलॉजीज नाम की कंपनी बनाई. उस वक्त यह कंपनी कंप्यूटर इंडस्ट्री में काम आने वाली सर्वर स्विच बनाती थी.
हुवावे सर्वर स्विच बाकी कंपनियों की तुलना में एक तिहाई कीमत में बेचते थे. इसलिए उनकी कंपनी की बिक्री तेजी से बढ़ी. फिर 90 के दशक में जब चीन ने टेलीकम्युनिकेशन इन्फ्रास्ट्रक्चर को बेहतर बनाने का फैसला किया तो इसलिए चीन विदेशी कंपनियों की मदद लेने की तैयारी कर रहा था.
इस बीच रेन झेंगफेई की कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव जियांग जेमिन से मुलाक़ात हुई. उन्होंने टेलीकम्युनिकेशन इन्फ्रास्ट्रक्चर को बेहतर बनाने के लिए काम उनकी कंपनी को देने की मांग रखी. साथ ही इसे राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा मसला बताया. रेन झेंगफेई की यह बात जियांग को सही लगी और उन्होंने यह काम रेन की कंपनी हुवावे को दिया.
समय के साथ हुवावे को सफलता मिलने लगी. उन्हें विदेशों से भी कॉन्ट्रेक्ट मिलने लगे. 2011 तक कंपनी का बिजनेस 170 देशों तक जा पहुंचा. फिर 2012 में एरिक्सन को पीछे छोड़ हुवावे टेलीकॉम उपकरण बनाने वाली दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी बन गई. आज इसकी सालाना बिक्री करीब 7.62 लाख करोड़ रुपये पहुंच गई है.