राणाघाट (Ranaghat) पश्चिम बंगाल के नदिया जिले का एक प्रमुख शहर और नगरपालिका क्षेत्र है. यह राणाघाट उपखंड का मुख्यालय भी माना जाता है. शहर का नाम राज्य के पुराने और ऐतिहासिक इलाकों में लिया जाता है. राणाघाट खास तौर पर अपने हैंडलूम उद्योग, फूलों की खेती और फ्लोरीकल्चर गतिविधियों के लिए जाना जाता है.
राणाघाट का इतिहास ब्रिटिश काल से जुड़ा हुआ माना जाता है. कहा जाता है कि जब अंग्रेज भारत में आए, उस समय भी यह इलाका मौजूद था. शहर के नाम को लेकर कई कहानियां प्रचलित हैं. कुछ लोग मानते हैं कि “राणाघाट” नाम “रानी” या “राणा” और “घाट” शब्दों से मिलकर बना है. वहीं एक दूसरी लोककथा के अनुसार, यहां कई सौ साल पहले “राणा डकैत” नाम का एक डाकू रहता था, जो इस इलाके में लूटपाट करता था और देवी काली की पूजा करता था. इसी कारण से इलाके का नाम राणाघाट पड़ा.
भारत की आजादी के बाद राणाघाट को नदिया जिले की राजधानी बनाने पर विचार हुआ था. हालांकि बाद में यह जिम्मेदारी कृष्णानगर को दी गई.
1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान बड़ी संख्या में हिंदू शरणार्थी पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से भागकर राणाघाट आए और यहीं बस गए. आज भी शहर की आबादी का बड़ा हिस्सा उन परिवारों का है, जिनकी जड़ें बांग्लादेश से जुड़ी रही हैं.
राणाघाट का संबंध भारत के स्वतंत्रता आंदोलन से भी बताया जाता है. स्थानीय स्तर पर यह शहर कई सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों का हिस्सा रहा.
शहर के इतिहास में पाल-चौधरी परिवार का नाम भी काफी महत्वपूर्ण माना जाता है. स्थानीय कथाओं के अनुसार, कृष्ण पंती नाम के एक साधारण पान विक्रेता ने व्यापार के जरिए बड़ी संपत्ति बनाई और बाद में उन्हें “पाल-चौधरी” की उपाधि मिली. परिवार ने नदिया क्षेत्र में लंबे समय तक प्रभाव बनाए रखा.
पाल-चौधरी परिवार ने कई स्कूल और मंदिरों का निर्माण कराया. 1853 में राणाघाट पाल चौधरी हाई स्कूल की स्थापना भी इसी परिवार द्वारा की गई थी. इसके अलावा रामकृष्ण वेदांत विद्यापीठ और शक्ति एम्पावरमेंट इंस्टीट्यूट जैसी संस्थाओं की स्थापना का श्रेय भी इसी परिवार को दिया जाता है.