देवबंद (Deoband) उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले का एक प्रमुख नगर और नगर पालिका क्षेत्र है. यह शहर दिल्ली से लगभग 150 किलोमीटर दूर स्थित है. देवबंद का नाम देश और दुनिया में खासतौर पर यहां मौजूद प्रसिद्ध इस्लामिक शिक्षण संस्थान दारूल उलूम देवबंद की वजह से जाना जाता है. इसे भारत के सबसे बड़े इस्लामिक संस्थानों में गिना जाता है.
देवबंद नाम को लेकर कई मान्यताएं हैं. स्थानीय हिंदी नाम “देवबंद” माना जाता है. एक मान्यता के अनुसार इसका संबंध “देवी” और “वन” शब्दों से है. कहा जाता है कि महाभारत काल में यह इलाका घने जंगलों से भरा हुआ था. वहीं दूसरी मान्यता के मुताबिक इसका नाम “देवी” और “वंदन” से जुड़ा है, जिसका संबंध यहां स्थित पुराने दुर्गा मंदिरों से माना जाता है.
इतिहास के अनुसार, 16वीं सदी के भक्ति संत श्री हित हरिवंश महाप्रभु, जो वृंदावन के राधावल्लभ संप्रदाय के संस्थापक थे, संन्यास लेने से पहले देवबंद में रहे थे. उन्होंने यहां राधा-कृष्ण को समर्पित “राधा-नवरंगीलाल” मंदिर की स्थापना भी की थी.
मुगल काल के दस्तावेज “आइने-अकबरी” में भी देवबंद का उल्लेख मिलता है. उस समय यह सहारनपुर सरकार के अंतर्गत एक परगना था. रिकॉर्ड के अनुसार यहां से शाही खजाने को राजस्व मिलता था और यहां सेना के लिए पैदल सैनिक और घुड़सवार भी उपलब्ध कराए जाते थे. उस दौर में यहां एक ईंटों का किला भी मौजूद था.
देवबंद की सबसे बड़ी पहचान 21 मई 1866 को स्थापित दारुल उलूम देवबंद से जुड़ी है. इस संस्थान की स्थापना फजलुर रहमान उस्मानी, सैयद मोहम्मद आबिद, मोहम्मद कासिम नानौतवी, मेहताब अली, निहाल अहमद और जुल्फिकार अली देवबंदी समेत कई इस्लामिक विद्वानों ने मिलकर की थी.
इसी संस्थान से आगे चलकर “देवबंदी आंदोलन” की शुरुआत हुई, जिसने भारतीय उपमहाद्वीप में इस्लामिक शिक्षा और धार्मिक विचारधारा पर गहरा प्रभाव डाला. आज भी देवबंद धार्मिक शिक्षा, इतिहास और सांस्कृतिक पहचान के कारण देशभर में चर्चित रहता है.