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Swiss Glaciers: भयावह तस्वीर...85 साल में आधे से ज्यादा पिघल गए स्विट्जरलैंड के 1400 ग्लेशियर

Swiss Glaciers Shrunk: स्विट्जरलैंड के 1400 ग्लेशियर पिछले 85 साल में आधे से भी ज्यादा पिघल गए हैं. एक नई स्टडी में यह डराने वाला खुलासा हुआ है. ऐसा जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वॉर्मिंग की वजह से हो रहा है. आप इस स्टोरी की तस्वीरों साफ तौर पर देख पाएंगे कि ग्लेशियर कितनी भयावह दर से पिघल रहे हैं.

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एल्प ओटा से दिखता वाडरेट द शिवेरा और पिज रोज़ेग ग्लेशियर. (फोटोः swisstopo and VAW / ETH Zurich)
एल्प ओटा से दिखता वाडरेट द शिवेरा और पिज रोज़ेग ग्लेशियर. (फोटोः swisstopo and VAW / ETH Zurich)

स्विट्जरलैंड (Switzerland) अपने खूबसूरत नज़ारों के लिए जाना जाता है. जिसका एक महत्पवूर्ण हिस्सा है वहां के बर्फ से लदे पहाड़. घाटियों से झांकते ग्लेशियर. लोग इन्हें देखने वहां जाते हैं. लेकिन एक स्टडी में बेहद भयावह खुलासा हुआ है. इस खूबसूरत देश के 1400 ग्लेशियर अपनी पूरी मात्रा का आधे से ज्यादा हिस्सा 85 सालों में खो चुके हैं. इन सबकी वजह है इंसानों द्वारा फैलाया गया प्रदूषण. उससे बढ़ रहा तापमान और उससे हो रहा जलवायु परिवर्तन. 

स्विट्जरलैंड की प्रसिद्ध फेडरल पॉलीटेक्निक यूनिवर्सिटी ETH Zurich और स्विस फेडरल इंस्टीट्यूट ऑन फॉरेस्ट, स्नो एंड लैंडस्केप रिसर्च ने सोमवान यानी 22 अगस्त 2022 को एक रिपोर्ट जारी की है. इसमें पहली बार तस्वीरों के जरिए बताया गया है कि कोई ग्लेशियर 1931 में कैसा दिखता था और अब कैसा दिख रहा है. कहां पहले भारी ग्लेशियर दिख रहे हैं, वहीं अब पूरी की पूरी घाटी बिना ग्लेशियर के हैं. तस्वीर जरूर ब्लैक एंड व्हाइट और कलर में है लेकिन अंतर स्पष्ट तौर पर दिख रहा है. 

श्वार्जसी से दिखता द गॉर्नर ग्लेशियर और द मोंटे रोजा पहाड़. (फोटोःswisstopo und VAW / ETH Zurich )
श्वार्जसी से दिखता द गॉर्नर ग्लेशियर और द मोंटे रोजा पहाड़. (फोटोःswisstopo und VAW / ETH Zurich )

दोनों संस्थानों के वैज्ञानिकों ने स्टडी में पाया कि 1931 के बाद से 2016 तक स्विट्जरलैंड के 1400 ग्लेशियर अपनी मात्रा का आधा हिस्सा खो चुके हैं. पिछले छह साल में ही 12 फीसदी ग्लेशियर पिघल गए. इस स्टडी को करने वाले वैज्ञानिकों की टीम के सदस्य डैनियल फैरिनोटी ने कहा कि ग्लेशियरों का पिघलना तेजी से बढ़ रहा है. अगर आप ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य की तुलना में अब देखेंगे तो बर्फ की मोटी चादरें हट चुकी हैं. यह तब जलवायु परिवर्तन की वजह से हो रहा है. यह स्टडी हाल ही में The Cryosphere जर्नल में प्रकाशित हुई है. 

डैनियल ने बताया कि अगर आप स्विट्जरलैंड के ग्लेशियरों का पूरा आकार देखेंगे तो ये यूरोपियन एल्प्स का आधा है. इस स्टडी को करने में करीब 22 हजार तस्वीरों की मदद ली गई है. कई स्रोतों से डेटा लिया गया है. इस काम के लिए ग्लेशियर को मापने के पुराने तरीके स्टीरियोफोगोग्रामेट्री का भी उपयोग किया गया है. यह तकनीक प्रथम विश्व युद्ध से चलता चला आ रहा है. 7000 से ज्यादा लोकेशंस की स्टडी करने के बाद उनमें से 1400 बड़े ग्लेशियरों को छांटा गया. 

मार्जेलेनाल्प से दिखता Fieschergletscher ग्लेशियर का नजारा. (फोटोः swisstopo und VAW / ETH Zurich)
मार्जेलेनाल्प से दिखता Fieschergletscher ग्लेशियर का नजारा. (फोटोः swisstopo und VAW / ETH Zurich)

वैज्ञानिकों की नजर में सभी ग्लेशियर नहीं है. क्योंकि कुछ जगहों पर जाना बेहद मुश्किल है. उसके लिए सैटेलाइट तस्वीरों की मदद ली गई. वैज्ञानिक उनकी स्टडी या उन पर नजर हमेशा नहीं कर सकते. क्योंकि वो बेहद ही दुरूह स्थानों पर मौजूद हैं. ऐसे ग्लेशियरों की स्टडी के लिए पुराने डेटा और नए तस्वीरों की मदद ली गई. अच्छी बात ये है कि सारे ग्लेशियर एक जैसी स्थिति में नहीं है. सब पर जलवायु परिवर्तन का उतना असर नहीं हुआ है. 

ग्लेशियर के पिघलने की तीन वजहें होती हैं. पहला वो कितनी ऊंचाई पर मौजूद हैं. दूसरा- उनका थूथन कितना चौड़ा है या फ्लैट है. तीसरा उनके ऊपर मौजूद कचरा. अब ऊंचाई ज्यादा है तो तापमान का असर कम होगा. चौड़ाई ज्यादा है तो सर्दियों में बर्फ ज्यादा जमा होगी. इंसानी कचरा मौजूद नहीं यानी लोग वहां जा नहीं रहे हैं. इसलिए तापमान का असर कम होगा. ग्लेशियर हर साल पिघलते भी नहीं है. सर्दियों में बर्फबारी से उनकी मात्रा बढ़ती है. गर्मियों में पिघलते हैं. कुछ ज्यादा पिघल जाते हैं. कुछ कम. 

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