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जब जयपुर में निकली तीज की सवारी, याद आया रजवाड़ों का जमाना

राजसी ठाठ-बाट के साथ जब जयपुर में तीज की सवारी निकली तो याद आया रजवाड़ों का जमाना. शाम फिर लौटेगी शाही महल में सवारी.

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तीज की सवारी
तीज की सवारी

राजसी ठाठ -बाट के साथ जब जयपुर में तीज की सवारी निकली तो राजे-रजवाड़ों का बीता जमाना फिर से साकार हो उठा. हाथी-ऊंट, घोड़े के साथ तीज की सवारी लिए शाही लवाजमा शहर में तीन घंटे तक घूमता रहा. गुलाबी नगरी जयपुर में हरियाली तीज बड़े धूम-धाम से मनाई गयी.

रजवाड़ों के राजस्थान में तीज मनाने का अपना अलग ही तरीका है. राजा-महाराजाओं के ज़माने में हाथी-घोड़ों पर बैठ कर राज परिवार निकलते थे अपनी प्रजा के बीच में, और उनके आगे चलती थी तीज माता की सवारी और लोग दर्शन किया करते थे. अब भी सब कुछ वैसा ही है, लेकिन अब राज परिवार नहीं सिर्फ तीज माता की सवारी निकलती है.

जयपुर के त्रिपोलिया दरवाज़े पर दोपहर से ही लोग जमा हो गए थे. रंग-बिरंगे कपड़ों में सजे गुलाबी नगर के वाशिंदे थे, तो वहीं विदेशी मेहमान भी तीज के ख़ास आयोजन को देखने के लिए इकट्ठा हुए थे. जयपुर के पूर्व महाराजा के राजमहल से निकलना शुरू हुई तीज माता की सवारी. पहले निकले सजे हुए हाथी, ऊंट और फिर झूमने लगे लोग दिखाने लगे करतब. जयपुर के लोगों के लिए तीज माता की सवारी से आस्था जुडी है.

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सावन की तीज पर महिलायें लहरिया साड़ी पहन कर तीज माता को पूजने आती है, और अपने परिवार की खुशहाली के लिए दुआएं मांगती है, वहीं विदेशियों के लिए ये सवारी एक अलग रंगीला अनुभव है.जिन विदेशियों ने इसे देखा, उनके पास शब्द नहीं है इसे बयान करने के और गुलाबी नगरी के वाशिंदों के दिल में भरी है श्रद्धाये तीज माता यानी पार्वती की सवारी है.

हरियाली तीज के मौके पर महिलाएं तीन दिनों खूब जश्न मनाती हैं और आखिरी दिन तीज की सवारी निकलती है जयपुर के सिटी पैलेस से जयपुर का पूर्वराजघराना अपने शाही लवाजमे के साथ इन्हें मायके विदा किया है.हाथी,उंट, घोड़ों के साथ बैलगारी और रजवाड़ों के जमाने के सैनिक भी हैं साथ-साथ राजस्थान के कालबेलिया और कच्ची घोड़ी जैसे लोक कलाकार भी इसकी शान बढ़ा रहे हैं. पिछले कई सौ सालों से चली आ रही इस परंपरा को देखने के लिए खास तौर से बड़ी संख्या में देशी-विदेशी मेहमान भी आते हैं हालैंड से आई टूरिस्ट ऐना लेकर ने कहा कि it's very fantastic. i liked it very much. its very different for us. elephant and camels. very colourfull.

इसमें हिस्सा लेने के लिए बड़ी संख्या में लोग आते हैं. इस दिन सुहगिन औरतें अपनी पति की लंबी उम्र के लिए पूजा करती हैं तो लड़कियां अच्छे सुहाग के लिए इसर यानी भगवान शिव की पूजा करते हैं. लेकिन इसकी भव्यता को देखते हुए अब ये एक बड़ा टूरिस्ट आकर्षण भी बन गया है. तीज का व्रत रखनेवाली लक्ष्मी ने बताया कि ये हमलोगों का कलचर है..हम इसे मनाते हैं लहरीया पहनते हैं झूला झूलते हैं और घेवर खाते हैं हमारे लिए ये पूजा का दिन होता है.

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तीज की ये सवारी इसी शाही लवाजमे के साथ बूढ़ी गणगौर बनकर वापस सिटी पैलेस में लौटती हैं सबसे अच्छी बा है कि टूरिज्म के बहाने हीं सही इस परंपरा को आज भी पूराने रुप में निभाया जा रहा है.

 

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