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शनि देव को ऐसे करें प्रसन्न, मिलेगी सफलता

शनि कब देते हैं शुभ फल और कौन सी स्थिति होती है अशुभ, जानिए शनि देवता की पूजा से संबंधित सारे सवालों के जवाब.

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शनि कब होते हैं प्रसन्न?
शनि कब होते हैं प्रसन्न?

शनि से ही हमारा कर्म जीवन संचालित होता है. दशम भाव को कर्म, पिता तथा राज्य का भाव माना गया है. एकादश भाव को आय का भाव माना गया है. अतः कर्म, सत्ता तथा आय का प्रतिनिधि ग्रह होने के कारण कुंडली में शनि का स्थान महत्वपूर्ण माना गया है.

मान्यता है कि सूर्य राजा, बुध मंत्री, मंगल सेनापति, शनि न्यायाधीश, राहु-केतु प्रशासक, गुरु अच्छे मार्ग का प्रदर्शक है. चंद्र माता और मन का प्रदर्शक शुक्र है- पति के लिए पत्नी और पत्नी के लिए पति तथा वीर्य बल. जब समाज में कोई व्यक्ति अपराध करता है तो शनि के आदेश के तहत राहु और केतु उसे दंड देने के लिए सक्रिय हो जाते हैं. शनि की कोर्ट में दंड पहले दिया जाता है, बाद में मुकदमा इस बात के लिए चलता है कि आगे यदि इस व्यक्ति के चाल-चलन ठीक रहे तो दंड की अवधि बीतने के बाद इसे फिर से खुशहाल कर दिया जाए या नहीं.

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शनि को यह पसंद नहीं: शनि को पसंद नहीं है जुआ-सट्टा खेलना, शराब पीना, ब्याजखोरी करना, परस्त्री गमन करना, अप्राकृतिक रूप से संभोग करना, झूठी गवाही देना, निर्दोष लोगों को सताना, किसी के पीठ पीछे उसके खिलाफ कोई कार्य करना, चाचा-चाची, माता-पिता, सेवकों और गुरु का अपमान करना, ईश्वर के खिलाफ होना, दांतों को गंदा रखना, तहखाने की कैद हवा को मुक्त करना, भैंस या भैसों को मारना, सांप, कुत्ते और कौवों को सताना. शनि के मूल मंदिर जाने से पूर्व उक्त बातों पर प्रतिबंध लगाएं.

अशुभ की निशानी: शनि के अशुभ प्रभाव के कारण मकान या मकान का हिस्सा गिर जाता है या क्षति ग्रस्त हो जाता है, नहीं तो कर्ज या लड़ाई-झगड़े के कारण मकान बिक जाता है. अंगों के बाल तेजी से झड़ जाते हैं. अचानक आग लग सकती है. धन, संपत्ति का किसी भी तरह नाश होता है. समय पूर्व दांत और आंख की कमजोरी.

शुभ की निशानी: शनि की स्थिति यदि शुभ है तो व्यक्ति हर क्षेत्र में प्रगति करता है. उसके जीवन में किसी भी प्रकार का कष्ट नहीं होता. बाल और नाखून मजबूत होते हैं. ऐसा व्यक्ति न्यायप्रिय होता है और समाज में मान-सम्मान खूब रहता हैं.

सावधानी: कुंडली के प्रथम भाव यानी लग्न में हो तो भिखारी को तांबा या तांबे का सिक्का कभी दान न करें अन्यथा पुत्र को कष्ट होगा. यदि आयु भाव में स्थित हो तो धर्मशाला का निर्माण न कराएं. अष्टम भाव में हो तो मकान न बनाएं, न खरीदें. उपरोक्त उपाय भी लाल किताब के जानकार व्यक्ति से पूछकर ही करें.

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उपाय:

सर्वप्रथम भगवान भैरव की उपासना करें. शनि की शांति के लिए महामृत्युंजय मंत्र का जाप भी कर सकते हैं. तिल, उड़द, भैंस, लोहा, तेल, काला वस्त्र, काली गौ, और जूता दान देना चाहिए. कौवे को प्रतिदिन रोटी खिलाएं. छायादान करें, अर्थात कटोरी में थोड़ा-सा सरसो का तेल लेकर अपना चेहरा देखकर शनि मंदिर में अपने पापो की क्षमा मांगते हुए रख आएं. दांत साफ रखें. अंधे-अपंगों, सेवकों और सफाईकर्मियों से अच्छा व्यवहार रखें.

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