अपने अपमान का बदला नंद वंश को गद्दी से बेदखल करवाकर लेने वाले आचार्य चाणक्य को कुशल अर्थशास्त्री और नीतियों का महान ज्ञाता माना गया है. नंद वंश के अहंकार को खत्म करने के लिए उन्होंने अपनी नीतियों से एक साधारण से बालक चंद्रगुप्त मौर्य को भारत का सम्राट बना डाला था. उनकी नीतियां मानव जीवन में काफी कारगर मानी जाती हैं. उन्होंने अपनी नीतियों को नीति ग्रंथ कही जाने वाली चाणक्य नीति में वर्णित किया है. इसमें वो एक श्लोक के माध्यम से उस चीज के बारे में बताते हैं जो मनुष्य के लिए मौत से भी ज्यादा कष्टदायी है. आइए जानते हैं इसके बारे में...
वरं प्राणपरित्यागो मानभङ्गन जीवनात्।
प्राणत्यागे क्षणां दुःख मानभङ्गे दिने दिने॥
चाणक्य ने अपमान को मृत्यु से भी अधिक पीड़ादायक और अहितकारी बताया है. वे कहते हैं कि अपमानित व्यक्ति के लिए जीवित रहने की अपेक्षा मर जाना अधिक उपयुक्त है.
चाणक्य कहते हैं कि अपमानित व्यक्ति दिन-प्रतिदिन अपमान का कड़वा घूंट पीता रहता है, समाज उसे घृणा की नजर से देखता है, रिश्तेदार और दोस्त भी उससे दूर भागने लगते हैं. ऐसे में अपमानित होकर जीने से अच्छा मरना है. मृत्यु तो बस एक क्षण का दुख देती है, लेकिन अपमान हर दिन जीवन में दुख लाता है.
लुब्धमर्थेन गृह्णीयात् स्तब्धमंजलिकर्मणा।
मूर्खं छन्दानुवृत्त्या च यथार्थत्वेन पण्डितम्।।
इस श्लोक में आचार्य चाणक्य लालची, घमंडी, मूर्ख और विद्वान को अपने वश में करने के तरीकों के बारे में बताते हैं. वो कहते हैं कि लालची मनुष्य को वश में करने के लिए उसे पैसा दे दीजिए, वो तुरंत आपके वश में हो जाएगा.
घमंडी व्यक्ति को सम्मान दे दीजिए वो आपके वश में हो जाएगा. अगर मूर्ख से पाला पड़ जाए तो उसे उसी के अंदाज में बात और व्यवहार करके अपने वश में कर सकते हैं. इन सबसे अलग अगर विद्वान को वश में करना है तो उसके सामने हमेशा सच बोलिए, वो आपके वश में खुद ही चला आएगा.