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धर्म

गजनवी के 17 हमले झेलकर भी खड़ा है सोमनाथ मंदिर

गजनवी के 17 हमले झेलकर भी खड़ा है सोमनाथ मंदिर
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कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने बुधवार को सोमनाथ के दर्शन करने के बाद सौराष्ट्र में चुनावी प्रचार का श्रीगणेेश किया. हिन्दू धर्म में सोमनाथ का अपना एक अलग ही स्थान है. भगवान सोमनाथ का मंदिर भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में सर्वप्रथम ज्योतिर्लिंग के रूप में जाना जाता है. गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र के वेरावल बंदरगाह में स्थित इस मन्दिर के बारे में कहा जाता है कि इसका निर्माण स्वयं चन्द्रदेव ने किया था, जिसका उल्लेख ऋग्वेद में स्पष्ट है.
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अत्यंत वैभवशाली होने के कारण इतिहास में कई बार यह मंदिर तोड़ा तथा पुनर्निर्मित किया गया. वर्तमान भवन के पुनर्निर्माण का आरंभ भारत की स्वतंत्रता के पश्चात् लौहपुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल ने करवाया और पहली दिसंबर 1995 को भारत के राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने इसे राष्ट्र को समर्पित किया.
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पौराणिक कथाएं-
स्कन्दपुराण में जिक्र मिलता है कि सोम अर्थात् चन्द्र ने, दक्षप्रजापति राजा की 27 कन्याओं से विवाह किया था. लेकिन उनमें से रोहिणी नामक अपनी पत्नी को अधिक प्यार व सम्मान दिया. अपनी अन्य पुत्रियों के साथ अन्याय को देखकर क्रोध में आकर दक्ष ने चंद्रदेव को शाप दे दिया कि अब से हर दिन तुम्हारा तेज (काँति, चमक) क्षीण होता रहेगा. फलस्वरूप हर दूसरे दिन चंद्र का तेज घटने लगा. शाप से विचलित और दु:खी सोम ने भगवान शिव की आराधना शुरू कर दी. अंततः शिव प्रसन्न हुए और सोम-चंद्र के श्राप का निवारण किया. सोम के कष्ट को दूर करने वाले प्रभु शिव का स्थापन यहाँ करवाकर उनका नामकरण हुआ "सोमनाथ". चंद्र को यहां अफना प्रभास प्राप्त हुआ था इसीलिए इसे प्रभास क्षेत्र भी कहा जाता है.
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लोककथाओं के अनुसार यहीं श्रीकृष्ण ने देहत्याग किया था. इस कारण इस क्षेत्र का और भी महत्व बढ़ गया.ऐसी मान्यता है कि श्रीकृष्ण भालुका तीर्थ पर विश्राम कर रहे थे. तब ही शिकारी ने उनके पैर के तलुए में पद्मचिह्न को हिरण की आँख जानकर धोखे में तीर मारा था. तब ही कृष्ण ने देह त्यागकर यहीं से वैकुंठ गमन किया. इस स्थान पर बड़ा ही सुन्दर कृष्ण मंदिर बना हुआ है.
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इसका संबंध महाभारत से भी बताया जाता है. जब महाभारत युद्ध का अंत हुआ तो गांधारी को यह समझ में आय़ा कि पांडव युद्ध कौशल में कौरवों से उत्तम नहीं थे लेकिन कृष्ण के उनके पक्ष में होने की वजह से पांडवों की जीत हुई. गांधारी ने श्रीकृष्ण को श्राप दिया कि जैसी कौरव वंश की महिलाएं विलाप कर रही हैं वैसे ही यदुवंश की महिलाएं विलाप करेंगी. एक कथानक बाली के वध से भी संबंधित है. जब भगवान राम ने बाली का वध किया था तो बाली की पत्नी ने उन्हें श्राप दिया कि वह भी किसी के तीर से ही अपने प्राण खोएंगे.
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सर्वप्रथम एक मंदिर ईसा के पूर्व में अस्तित्व में था जिस जगह पर दूसरी बार मंदिर का पुनर्निर्माण सातवीं सदी में वल्लभी के मैत्रक राजाओं ने किया. आठवीं सदी में सिन्ध के अरबी गवर्नर जुनायद ने इसे नष्ट करने के लिए अपनी सेना भेजी. प्रतिहार राजा नागभट्ट ने 815 ईस्वी में इसका तीसरी बार पुनर्निर्माण किया. इस मंदिर की महिमा और कीर्ति दूर-दूर तक फैली थी. अरब यात्री अल-बरुनी ने अपने यात्रा वृतान्त में इसका विवरण लिखा जिससे प्रभावित हो महमूद ग़ज़नवी ने सन 1024 में कुछ 5,००० साथियों के साथ सोमनाथ मंदिर पर हमला किया, उसकी सम्पत्ति लूटी और उसे नष्ट कर दिया. 5०,००० लोग मंदिर के अंदर हाथ जोड़कर पूजा अर्चना कर रहे थे, प्रायः सभी कत्ल कर दिये गए.
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मंदिर का बार-बार खंडन और जीर्णोद्धार होता रहा पर शिवलिंग यथावत रहा. लेकिन सन 1026 में महमूद गजनी ने जो शिवलिंग खंडित किया, वह यही आदि शिवलिंग था. 
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इसके बाद कई बार मंदिर और शिवलिंग खंडित किया गया. बताया जाता है आगरा के किले में रखे देवद्वार सोमनाथ मंदिर के हैं. महमूद गजनी सन 1026 में लूटपाट के दौरान इन द्वारों को अपने साथ ले गया था.
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सोमनाथ मंदिर के मूल मंदिर स्थल पर मंदिर ट्रस्ट द्वारा निर्मित नवीन मंदिर स्थापित है. राजा कुमार पाल द्वारा इसी स्थान पर अन्तिम मंदिर बनवाया गया था.
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इसके बाद गुजरात के राजा भीम और मालवा के राजा भोज ने इसका पुनर्निर्माण कराया. सन 1297 में जब दिल्ली सल्तनत ने गुजरात पर क़ब्ज़ा किया तो इसे पाँचवीं बार गिराया गया. मुगल बादशाह औरंगजेब ने इसे पुनः 1706 में गिरा दिया. इस समय जो मंदिर खड़ा है उसे भारत के गृह मन्त्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने बनवाया और पहली दिसंबर 1995 को भारत के राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने इसे राष्ट्र को समर्पित किया.
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1948 में प्रभासतीर्थ, 'प्रभास पाटण' के नाम से जाना जाता था. इसी नाम से इसकी तहसील और नगर पालिका थी. यह जूनागढ़ रियासत का मुख्य नगर था. लेकिन १९४८ के बाद इसकी तहसील, नगर पालिका और तहसील कचहरी का वेरावल में विलय हो गया.
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सोमनाथ मंदिर के मूल मंदिर स्थल पर मंदिर ट्रस्ट द्वारा निर्मित नवीन मंदिर स्थापित है. राजा कुमार पाल द्वारा इसी स्थान पर अन्तिम मंदिर बनवाया गया था। सौराष्ट्र के मुख्यमन्त्री उच्छंगराय नवलशंकर ढेबर ने 19 अप्रैल 1940 को यहां उत्खनन कराया था. इसके बाद भारत सरकार के पुरातत्व विभाग ने उत्खनन द्वारा प्राप्त ब्रह्मशिला पर शिव का ज्योतिर्लिग स्थापित किया है. सौराष्ट्र के पूर्व राजा दिग्विजय सिंह ने 8 मई 1940 को मंदिर की आधारशिला रखी तथा 11 मई 1951 को भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ॰ राजेंद्र प्रसाद ने मंदिर में ज्योतिर्लिग स्थापित किया. नवीन सोमनाथ मंदिर 1962 में पूर्ण निर्मित हो गया. 1970 में जामनगर की राजमाता ने अपने पति की स्मृति में उनके नाम से 'दिग्विजय द्वार' बनवाया. इस द्वार के पास राजमार्ग है और पूर्व गृहमन्त्री सरदार बल्लभ भाई पटेल की प्रतिमा है. सोमनाथ मंदिर निर्माण में पटेल का बड़ा योगदान रहा.

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बाणस्तम्भ-
मंदिर के दक्षिण में समुद्र के किनारे एक स्तंभ है. उसके ऊपर एक तीर रखकर संकेत किया गया है कि सोमनाथ मंदिर और दक्षिण ध्रुव के बीच में पृथ्वी का कोई भूभाग नहीं है (आसमुद्रांत दक्षिण ध्रुव पर्यंत अबाधित ज्योतिर्मार्ग). इस स्तम्भ को 'बाणस्तम्भ' कहते हैं. मंदिर के पृष्ठ भाग में स्थित प्राचीन मंदिर के विषय में मान्यता है कि यह पार्वती जी का मंदिर है.
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प्रभास खंड में विवरण है कि सोमनाथ मंदिर के समयकाल में अन्य देव मंदिर भी थे. इनमें शिवजी के 135, विष्णु भगवान के 5, देवी के 25, सूर्यदेव के 16, गणेशजी के 5, नाग मंदिर 1, क्षेत्रपाल मंदिर 1, कुंड 19 और नदियां 9 बताई जाती हैं. एक शिलालेख में विवरण है कि महमूद के हमले के बाद इक्कीस मंदिरों का निर्माण किया गया. संभवत: इसके पश्चात भी अनेक मंदिर बने होंगे. सोमनाथ मंदिर के ऊपर जो कलश लगाया गया है वह लगभग 400 किलो का है.

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