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धर्म

होली को 'ईद-ए-गुलाबी' कहते थे मुगल, सजती थीं बादशाह की महफिलें

होली को 'ईद-ए-गुलाबी' कहते थे मुगल, सजती थीं बादशाह की महफिलें
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Happy Holi 2019: हिन्दू पंचांग के अनुसार, होली फाल्गुन माह की पूर्णिमा को मनाई जाती है, जिसे रंगों का त्योहार भी कहा जाता है. होली इस बार 21 मार्च 2019 को है. होली को आमतौर पर हिंदुओं का त्योहार माना जाता है. लेकिन इस त्योहार में सिर्फ हिंदू ही नहीं दूसरे धर्म के लोग भी शामिल होते हैं.  ये परंपरा मुगलकाल से ही देखने को मिलती है, जिसके सबूत इतिहास में भी दर्ज हैं. इतिहासकारों के मुताबिक, मुगल शासक शाहजहां के काल में होली मनाने की परंपरा थी और इसे 'ईद-ए-गुलाबी' के नाम से जाना जाता था. आज भी कई मुसलमान होली का त्योहार पूरे उत्साह के साथ मनाते हैं. हालांकि, मुसलमानों के होली मनाने पर कई बार आपत्ति भी उठाई गई है.
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भारत के कई मुस्लिम कवियों ने अपनी रचनाओं में भी इस बात का उल्लेख किया है कि होली का पर्व सिर्फ हिंदू ही नहीं, मुसलमान भी मनाते हैं. इतिहासकारों के मुताबिक, मुगलकाल में होली का त्योहार ईद की तरह ही मनाया जाता था. मुगलकाल में होली खेले जाने के कई प्रमाण मिलते हैं. अकबर का जोधाबाई के साथ और जहांगीर का नूरजहां के साथ होली खेलने का वर्णन मिलता है. कई आर्टिस्ट ने अपनी पेंटिंग्स में मुगल बादशाहों को होली खेलते दिखाया है.

(Photo: Bodleian Library, University of Oxford)

होली को 'ईद-ए-गुलाबी' कहते थे मुगल, सजती थीं बादशाह की महफिलें
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वहीं शाहजहां के समय तक होली खेलने का मुगलिया अंदाज बदल गया था. बताया जाता है कि शाहजहां के समय में होली को 'ईद-ए-गुलाबी' या 'आब-ए-पाशी' (रंगों की बौछार) कहा जाता था. जबकि, अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर के बारे में प्रसिद्ध है कि होली पर उनके मंत्री उन्हें रंग लगाने जाया करते थे. मुगलकाल में होली के लिए खासतौर पर फूलों से रंग तैयार किए जाते थे.



(Photo: The Trustees of The Chester Beatty Library, Dublin)
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बहादुरशाह जफर का मानना था कि उनका धर्म होली खेलने से प्रभावित नहीं होता है. माना जाता है कि यह भावना अकबर के समय से ही मुगलों के बीच पैदा हुई थी. बहादुर शाह के बेटे मोहम्मद शाह रंगीला भी होली खेला करते थे. होली के समय उनकी बेगम पिचकारी लेकर उनके पीछे भागा करती थीं.

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इतिहासकारों का कहना है कि नवाबों का होली का जश्न मनाने का अंदाज भी काफी अलग था. ये लोग होली के दिन एक दूसरे पर गुलाबजल छिड़ककर उपहार के रूप में गुलाबजल से भरी बोतलें दिया करते थे. इस दौरान ढोल नगाड़ों की गूंज के साथ त्योहारों का समा बांधा जाता था. 

(Photo: 1800 National Gallery of Australia, Canberra)
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जहांगीर की ऑटोबायोग्राफी 'तुज़्क-ए-जहांगीरी' में जिक्र मिलता है कि होली के समय जहांगीर महफिल का आयोजन किया करते थे.
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मुंशी जकाउल्लाह ने अपनी किताब 'तारीख-ए-हिदुस्तानी' में लिखा, कौन कहता है होली हिंदुओं का त्योहार है? मुंशी जकाउल्लाह ने ये भी लिखा, मुगलकाल में हिंदू-मुस्लिम, अमीर- गरीब सब एक साथ मिलकर होली का त्योहार मनाते थे. होली के पर्व पर गरीब से गरीब शख्स को भी अपने राजाओं को रंग लगाने की इजाजत होती थी.

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बता दें कि अमीर खुसरो (1253–1325), इब्राहिम रसखान (1548-1603), नजीर अकबरबादी (1735–1830), महजूर लखनवी (1798-1818), शाह नियाज (1742-1834) की रचनाओं में 'गुलाबी त्योहार' यानी  होली का जिक्र मिलता है.

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एक उर्दू अखबार जाम-ए-जहांनुमा (1844) के मुताबिक, मुगलकाल में होली के समय बहादुर शाह जफर होली के जश्न के लिए खास तैयारियां करते थे. महलों और हवेलियों में होली के गाने गाए जाते थे. मुगलकाल में ईद की तरह ही होली का जश्न मनाया जाता था. मेलों का आयोजन किया जाता था, नाच-गाने की महफिलें सजती थीं.
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बीजापुर सल्तनत के आदिल शाही वंश के राजा आदिल शाह और वाजिद अली शाह होली के समय मिठाइयां, ठंडाई बांटा करते थे. 19वीं सदी तक होली काफी धूमधाम से मनाई जाती थी. लेकिन समय के साथ धीरे-धीरे होली मनाने का चलन कम होता गया. कुल मिलाकर होली और ईद दो ऐसे त्योहार हैं, जो हिंदू और मुस्लिम दोनों को एक दूसरे के साथ मिलने जुलने का मौका देते हैं. भारत के कई क्षेत्रों में यह आज भी देखने को मिलता है.
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