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धर्म

देश का चौथा सबसे अमीर मंदिर, हर साल 2500 करोड़ का चढ़ावा

देश का चौथा सबसे अमीर मंदिर, हर साल 2500 करोड़ का चढ़ावा
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देश के अमीर मंदिरों में चौथे नंबर पर केरल के त्रिसूर (पहले त्रिचूर) जिले में स्थित गुरुवायूर मंदिर है. आपको याद दिला दें कि यह वही मंदिर है जहां हाल ही में देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पूजा करने के लिए पहुंचे थे. इस मंदिर की मान्यता काफी ज्यादा है और इसका इतिहास काफी पुराना है. आइए आपको बताते हैं हर साल मंदिर की दान पेटी में कितनी धनराशि आती है.    
देश का चौथा सबसे अमीर मंदिर, हर साल 2500 करोड़ का चढ़ावा
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इस मंदिर की कुल संपत्ति 2500 करोड़ रुपये आंकी गई है. इस मंदिर को केरल हाई कोर्ट की निगरानी में सरकार की ओर से गठित संस्थान श्री गुरुवायुर देवास्म की ओर से संचालित किया जाता है. इस मंदिर में भी सिर्फ हिन्दू श्रद्धालु पूजा-अर्चना कर सकते हैं.
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पौराणिक महत्व
गुरुवायूर मंदिर के प्रमुख देवता विष्णु माने जाते हैं. मंदिर में उनके अवतार श्री कृष्ण के बालस्वरूप की पूजा की जाती है. यहां श्री कृष्ण के बाल स्वरूप को  गुरुवायुरप्पन कहा जाता है. मंदिर की वेबसाइट के मुताबिक यहां गुरुवायुरप्पन के गले में पवित्र तुलसी की माला और मोतियों का हार है.
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बताया जाता है कि ये मंदिर हजारों साल पुराना है. मंदिर की वेबसाइट के मुताबिक 1716 ईस्वी में डच आक्रांताओं ने इस मंदिर के खजाने को लूटने के साथ यहां आग लगा दी थी. 1747 ईस्वी में मंदिर का पुनर्निर्माण किया गया. 1766 ईस्वी में हैदर अली ने कालीकट और गुरुवायुर शहर पर कब्ज़ा कर लिया. 
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मंदिर की वेबसाइट के अनुसार 1789 ईस्वी में हैदर अली के बेटे और वारिस टीपू सुल्तान के कमान संभालने के बाद मंदिर की मूर्तियों के क्षतिग्रस्त किए जाने के ख़तरे को देखते हुए मूलाविग्रह (मुख्य मूर्ति) को ज़मीन के नीचे छुपा दिया गया. वहीं उत्सवाविग्रह (जुलूस वाली मूर्ति) को अंबालापुझा पहुंचा दिया गया.
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मंदिर की वेबसाइट के मुताबिक टीपू के काल में मंदिर को आग लगाई गई लेकिन तब तेज बारिश ने इसे बचा लिया. अंग्रेज़ों की ओर से टीपू को खदेड़े जाने के बाद मंदिर में दोनों विग्रहों (मूर्तियों) की दोबारा स्थापना की गई.
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यहां तुलाभाराम का रिवाज काफी लोकप्रिय है. तुलाभारम को तुला-दान, तुला-पुरुष आदि भी कहा जाता है. यह रिवाज हिन्‍दू धर्म के सबसे पुराने अनुष्‍ठानों में से एक है. इसमें श्रद्धालु के वजन के बराबर वस्‍तु (सोना, अनाज, फूल या कोई अन्‍य वस्‍तु) तौली जाती है. इसके बाद उस वस्‍तु को दान कर दिया जाता है. यह अनुष्‍ठान ‘षोडश महादान’ में से एक हैं. पुराणों में दान के 16 प्रकार के तरीके बताए गए हैं, जिनमें से एक ‘तुलाभारम’ भी है.
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कौन हैं भगवान गुरुवायुरुप्पन?
गुरुवायूर मंदिर में भगवान गुरुवायुरप्पन की पूजा होती है. गुरुवायुरप्पन को भगवान विष्णु का ही रूप माना जाता है. इसी वजह से इस मंदिर को गुरुवायूर श्रीकृष्ण मंदिर भी कहते हैं. केरल के इस पवित्र स्थान को दक्षिण भारत का द्वारका भी कहा जाता है.
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क्या है मंदिर का ड्रेस कोड?
गुरुवायूर मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं के लिए एक खास ड्रेस कोड भी बनाया गया है. यहां आने वाले श्रद्धालुओं को मुंडु नाम की पोशाक पहननी पड़ती है. जबकि बच्चों को वेष्टी पहनाई जाती है. इसके अलावा औरतों को सिर्फ सूट-सलवार या साड़ी में ही एंट्री मिल सकती है.
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