वाराणसी के मणिकर्णिका घाट पर निरंतर चिताएं जलती रहती हैं. यहां के श्मशान कभी खाली नहीं होते. 2-3 मिनट के फासले पर यहां एक-न-एक पार्थिव देह अंतिम संस्कार के लिए आती है. लेकिन होली के पहले यहां की मसाने की होली अपने आप में अद्भुत होती है. जिसमें रंग की जगह यज्ञ, हवन कुंडों और अघोरियों का धुनियों की राख होती है. मान्यता है कि रंगभरी एकादशी के दिन माता पार्वती का गौना करवाने के बाद देवता और भक्तों के साथ महादेव होली खेलते हैं. जिसके चलते वे भूत-प्रेत, पिशाच आदि के साथ होली नहीं खेल पाते हैं. इसलिए अगले दिन बाबा मणिकर्णिका घाट पर नहाने आते हैं और अपने गणों के साथ चिता भस्म से होली खेलते हैं.