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पहला नवरात्रा आज, लाल वस्त्र धारण कर करें मां शैलपुत्री की पूजा

नवरात्रि के प्रथम दिन देवी के शैलपुत्री स्वरुप की उपासना की जाती है. इस दिन मूलाधार चक्र से जुड़ी हुई समस्याओं को दूर किया जा सकता है.

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 नवरात्रि वर्ष में चार बार पड़ती है- माघ, चैत्र, आषाढ़ और आश्विन.
नवरात्रि वर्ष में चार बार पड़ती है- माघ, चैत्र, आषाढ़ और आश्विन.

नवरात्रि में आहार और दिनचर्या का विशेष महत्व है. बिना इसके नवरात्रि का शुभ फल नहीं मिल सकता. नवरात्रि के पहले दिन का महत्व क्या है और इस दिन देवी के किस स्वरुप की उपासना की जाती है? नवरात्रि वर्ष में चार बार पड़ती है- माघ, चैत्र, आषाढ़ और आश्विन. नवरात्रि से वातावरण के तमस का अंत होता है और सात्विकता की शुरुआत होती है. मन में उल्लास, उमंग और उत्साह की वृद्धि होती है.

दुनिया में सारी शक्ति, नारी या स्त्री स्वरुप के पास ही है. इसलिए इसमें देवी की उपासना ही की जाती है. नवरात्रि के प्रथम दिन देवी के शैलपुत्री स्वरुप की उपासना की जाती है. इस दिन मूलाधार चक्र से जुड़ी हुई समस्याओं को दूर किया जा सकता है. इस बार नवरात्रि का प्रथम दिन 29 सितम्बर को होगा.

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नवरात्रि के और कलश स्थापना के नियम क्या हैं?

- नवरात्रि में जीवन के समस्त भागों और समस्याओं पर नियंत्रण किया जा सकता है

- नवरात्रि के दौरान हल्का और सात्विक भोजन करना चाहिए

- नियमित खान पान में जौ और जल का प्रयोग जरूर करना चाहिए

- इन दिनों तेल, मसाला और अनाज कम से कम खाना चाहिए

- कलश की स्थापना करते समय जल में सिक्का डालें

- कलश पर नारियल रखें और कलश पर मिट्टी लगाकर जौ बोएं

- कलश के निकट अखंड दीपक जरूर प्रज्ज्वलित करें

कलश स्थापना का मुहूर्त क्या है?

- कलश की स्थापना आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को की जाती है

- इस बार प्रतिपदा तिथि 29 सितम्बर को प्रातःकाल से रात्रि 08.14 तक है

- इसलिए कलश की स्थापना रात्रि 08.14 के पूर्व कर ली जाएगी

अगर मूलाधार चक्र कमजोर है तो इसके लक्षण क्या हैं?

- व्यक्ति का स्वास्थ्य सामान्यतः कमजोर रहता है

- कुछ न कुछ बीमारियां लगी रहती हैं

- व्यक्ति के अंदर पशुता का भाव रहता है

- व्यक्ति जीवन में कभी कभी स्वार्थी भी हो जाता है

नवरात्रि के पहले दिन क्या करें उपाय कि मूलाधार चक्र मजबूत हो जाए?

- दोपहर के समय लाल वस्त्र धारण करें

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- देवी को लाल फूल और लाल फल अर्पित करें

- देवी को ताम्बे का सिक्का भी अर्पित करें

- इसके बाद पहले अपने गुरु का स्मरण करें

- तत्पश्चात अपने आज्ञा चक्र पर ध्यान लगाएं

- ध्यान जितना लम्बा और गहरा होगा, लाभ उतना ही ज्यादा होगा

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