तुम उस रस्ते से रोज गुजरतीं. वो मेरा मक्का से मदीना का सफर था. तुम्हारे पीछे मुग्धता से बंधे हुए चलना यही मेरे लिए हज था. उस वक्त प्यार वर्चुअल था, वर्चुअल स्पेस पर नहीं. बस नजरों से समझने भर के लिए. सिगमंड फ्रायड के सिद्धांत जो उस वक्त अनजाने थे, बेड़ियां बने थे. वर्जनाएं थीं. वरना हमारे मनों की ‘सांकरी गली’ में हम एक होकर चल रहे थे.
98 की उस दोपहर बूंदे तीर सी गिरीं. तुम्हारे तन के सूत की सारी गिरहें जैसे खुल गई थीं. तन आत्मा बन गया. हां तुमने की थी कोशिश अपने बस्ते में सिमट जाने की. हां बस्ता ही था, स्कूल बैग नहीं. लेकिन बस्ती की गर्म नजरों से बस्ता भी मोम की तरह पिघल गया. तुम अध्यात्म सी निर्मल और पारदर्शी हो गईं थीं. मन किया था कि तुम्हें उसी पल चौपाइयों में पिरो दूं. तुम्हारे चेहरा बिसूरने लगा था. उस रास्ते को तुम उड़कर पार करना चाहती थीं. पैरों में पंख लग गए थे और शोहदे सिर के बल चल रहे थे. मैं भीतर भीतर धुंआ हो रहा था. तुम भीतर भीतर पिघल रही थीं. सच, कस्बों की बरसातें शोहदों का फेस्टिवल होती हैं.