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'तवायफों का साहित्य, जिसका जिक्र तक नहीं होता...' लेखकों ने बताए बनारस से लाहौर तक की उन गलियों के किस्से

Sahitya AajTak 2024: साहित्य आजतक के मंच पर तीसरे दिन रविवार की शाम एक सत्र 'बनारस से लाहौर तक की उन बदनाम गलियों की कहानियों' पर हुआ, जहां कभी बड़े घर के बच्चे तहजीब और तमीज सीखने जाया करते थे.

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साहित्य आजतक
साहित्य आजतक

Sahitya AajTak: दिल्ली की एक शाम मेजर ध्यानचंद स्टेडियम में साहित्य आजतक 2024 के साथ शुरू हुई. रविवार को यहां एक ऐसे सत्र का आयोजन किया गया, जिसके बारे में लोगों ने काफी कुछ सुना होगा, लेकिन उन चीजों को जानने-समझने का मौका यहां मिला, जब तवायफों और कोठे वालियों की जिंदगी पर किताब लिखने वाले और रिसर्च करने वाले प्रख्यात शख्सियतों ने कुछ अनकही कहानियां सुनाई. 
 
'बनारस से लाहौर तक कोठे वालियों की कहानियां' सत्र में जानी मानी गायिका और लेखिका विद्या शाह, मंजरी चतुर्वेदी और लेखक यतींद्र मिश्रा ने अपने-अपने अनुभवों का पिटारा खोला. साथ ही इन महिलाओं की जिंदगी से जुड़े कई राज खोले और किस्से सुनाए. 

बनारस से लाहौर तक की वो बदनाम गलियां...
कवि और लेखक  यतीन्द्र मिश्रा ने शुरूआत करते हुए बताया कि बनारस से लाहौर तक की बदनाम गलियों के किस्से तो बहुत हैं. लेकिन इससे पहले मैं  भारतीय समाज की एक दिक्कत के बारे में बताना चाहूंगा. यहां कई सारी कहानियां बिखरी पड़ी हैं. लेकिन हमलोगों ने इसे कभी लिपिबद्ध नहीं किया. आज भी जब हमें पुरानी चीजों की जरूरत होती है, तो हम ब्रिटिश गजेटियर के पास जाते हैं. 

उन्होंने कहा कि ऐसे में उन बदनाम गलियों को जिनको बदनाम किया गया. जो दरअसल, एक संस्थान थें. जहां से कला, संगीत, अदब, मौशिकी की रवायते शुरू हुई. अंग्रेजों ने इन पर बैन लगा रखा था. ऐसे में उनकी कहानी कहना मुश्किल होगा. 

सिनेमा में नाम बदलकर गाती थीं तवायफें
यतींद्र मिश्रा ने बताया कि एक बार लखनऊ के इतिहासकार सलीम किदवई ने बताया था कि गाने वाली बाईयां जब सिनेमा में गाना चाहती थीं, तो  उन्हें डर लगता था कि कहीं उनका पेशा उन्हें वहां बदनाम न कर दे. इसलिए उनलोगों ने वहां जाकर अपना नाम बदल लिया. जो हीरा बाई थीं, जो तमंचा बाई थीं, वो मिस रोज और मिस लोटस बन गईं. इन लोगों ने अपने हकीकत को आगे नहीं आने दिया. 

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बड़े घर के बच्चों को तमीज सीखने के लिए भेजा जाता था तवायफों के पास
उन्होंने कहा कि पहले एक परंपरा थी कि बड़े घर यानी नवाबों, सामंतों, राज-रजवाड़ों के बच्चों को तहजीब सीखने के लिए तवायफों के कोठों पर जाना पड़ता था. वो एक हाई लेवल की जगह थी, जहां पर लोग तमीज सीखते थे. आज इसी काम के लिए कई पेशेवर होते हैं. 

कैसे खत्म हो गया अटरिया का कल्चर?
जहां तवायफें अपनी कला पेश करती थीं.  यानी नाच, गान, संगीत या जहां रहती थीं. उन जगहों को अटरिया कहा जाता था. उस जमाने में समाज के बड़े लोग सामंत वर्ग, बड़े व्यापारी, जमींदार इस संस्कृति को संरक्षित करते थे और वह अपने गति से अपनी तरह से विकसित हो रहा था. बाद के समय में इसे संरक्षित नहीं रखा गया और इसे देखने का नजरिया बिगड़ता गया.एक दौर तो वो भी था कि लोग फिल्मों की बात तक घर में करना बुरा मानते थे. लेकिन आज वैसी स्थिति नहीं है.

रेडियो पर गाने के लिए नाम बदलने को किया गया मजबूर
देश आजाद हुआ तो रेडियो सेशन और आकाशवाणी के लिए एक सर्कुलर जारी करते हैं कि वैसी जो महिलाएं जो भी गायिकाएं या नॉच गर्ल्स हैं, वे अपने नाम से बाई शब्द हटा ले और देवी या बेगम लगाए. या फिर वो विवाह कर लें. जिन्होंने ऐसा नहीं किया, उनके गाने तो रिकॉर्ड किये गए, लेकिन उन्हें पीछे के दरवाजे से बुलाया जाता था. 

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उन महिलाओं का नाच-गान उस समय मनोरंजन का एक साधन था
तवायफों पर काफी काम करने गायिका और लेखिका विद्या शाह ने बताया कि  एक जमाना था. जब इस कम्युनिटी से जो महिलाएं जुड़ी हुई थीं, चाहे वो उनके बीच जन्मीं हो, या अडॉप्ट कर ली गई थी. उन्हें ऐतिहासिक दृष्टिकोण से हमेशा मनोरंजन के लिए नृत्य या संगीत परोसने वालों के रूप में देखा गया. वे उस समय राजा-महाराजाओं और जमींदारों के मनोरंजन के लिए ही तो नाच-गान करती थीं.  लेकिन इनका एक कल्चर था और वो बहुत ही समृद्ध था. इस संस्कृति को कई फिल्मों में दिखाया भी गया है, जैसे 'पाकिजा' में. 

समय गुजरा और नजरिया भी बदलता गया
उन्होंने बताया कि जैसे जैसे समय गुजरता गया, इन्हें देखने के नजरिए भी बदलते गए और इनकी नैतिकता को लेकर भी बदलाव होते गए. जैसे ही सवाल उठते गए, उसको लेकर अलग नजरिया बनने लगा. इनके साथ पॉलिटिक्स भी जुड़ गए, कि ये सही नहीं है या गलत है. धीरे-धीरे 20वीं सदी आते-आते इसकी एक अलग छवि बन गई और इसे नैतिकता के साथ जोड़कर देखा जाने लगा. 

पहले सम्मान के साथ अटरिया को देखा जाता था
इससे इन चीजों के लिए बकायदा एक जगह होती थी, जिसे अटरिया कहा जाता था. जहां लोग जाकर इन कलाओं को देखते थे. आज संगीत को देखने का जो नजरिया हो गया है. वो अलग है.   दिल्ली की एक बाई थीं काली जान, उन्होंने क्या गया है- ऐ री यशोदा तो से करूंगी लड़ाई... तोरे कुंवर ने धूम मचाई.अब ये गाना एक प्रसंग है. इस पर तो कोई ठप्पा नहीं लगाया जा सकता ना, कि ये तवायफ का गाना है और ये उस्ताद का गाना है.

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उन महिलाओं ने एक से बढ़कर एक गाने बनाए
एक बार दिल्ली में मेरा एक कार्यक्रम हुआ था. वहां एक बुजुर्ग आए मेरे पास और मुझे दो कैसेट पकड़ाएं. उन्होंने कहा असली गाना ये होता है. काफी समय तक मैंने देखा भी नहीं कि इसमें क्या लिखा है. उसमें मैंने देखा कई सारे नाम थे और उसके साथ बंदिशें भी थी. जैसे जोहरा बाई आगरावाली के साथ लिखा हुआ था अरज सुनों मोर पीर.. रागपुरिया. मैंने सोचा ये कौन हैं जो गाकर चली गई हैं. 

सिर्फ उनके नाम सुनकर बना लेते हैं धारणा
जब हम इनका नाम लेते हैं, गौहर जान, किट्टी जान, मलका जान तो हमारे मन में ये धारणा होती है कि ये तो वो वाली महिलाएं हैं. लेकिन जब हम उनका गाना सुनें तो लगता है कि उनकी भी जबरदस्त तालिम रही होगी. उन्होंने भी काफी रियाज किया होगा. इन सबको सिर्फ 3 मिनट में समेट लेना वाकई में जबरदस्त है. प्लेबैक सिंगिंग की शुरुआत भी एक महिला ही लेकर आईं. 
 
'आज के सिनेमाघर कोठे हैं और सिनेमा मुजरा'
क्लासिकल डांसर और लेखिका मंजरी चतुर्वेदी ने कहा कि आज जो बड़े-बड़े पीवीआर और मल्टीप्लेक्स सिनेमाघर हैं, ये कोठे हैं और आप जो सिनेमा देखते हैं वो मुजरा है. आप वहां जाते हैं 500 या 1000 रुपये का टिकट लेते हैं. आपके सामने 10 लोग नाचते गाते हैं. उसके बाद आप वहां से निकलकर किसी बार या रेस्टोरेंट में जाते हैं ड्रिंक्स और डिनर लेते हैं और कहते हैं मेरी इवनिंग बन गई. इसमें आपको कुछ भी गलत नहीं दिखता है.
 
मंजरी ने कहा कि अब आप सिर्फ इसलिए उन तवायफों और बाई जी को सिर्फ इसलिए की वो गलत समय में पैदा हुईं कटघरे में क्यों खड़ा करते हैं. उस दौर में न सिनेमा था, न टेक्नोलॉजी थी, न रिकॉर्डिंग हो सकती थी. उस वक्त किसी को मनोरंजन चाहिए था, तो उसके सामने किसी को नाचना पड़ता था. 

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इनकी आज जो छवि है उसके लिए हमारा नजरिया जिम्मेदार है
उन्होंने कहा कि जहां तक इस संस्कृति के देखने के नजरिये में गिरावट आने की बाद है, तो इसके लिए आप और हम जिम्मेदार है. हम अंग्रेजों की बात करते हैं, लेकिन उनके जाने के बाद भी हमनें अपनी परफार्मर और कलाकार महिलाओं के लिए क्या किया. उन्हें अंग्रेजों के नजर से ही देखा. हमनें नॉच गर्ल, गाने वाली बाई जी, नाचने वाली बाई जी, तवायफ और प्रोस्टीच्यूट सब को एक ही साथ कर दिया. 

कभी तवायफों के साहित्य पर नहीं हुई चर्चा
आज क्या कभी तवायफों के साहित्य पर कोई चर्चा नहीं होती. मैं आपको 1920 के आसपास का एक किस्सा बताती हूं. गांधी जी ने सभी तवायफों से कहा कि आप अपने यहां आजादी के लिए भी गानें गाइये. तब विद्याधरी बाई ने गाना लिखा- 

चुन-चुनकर फूल ले लो, अरमान रह न जाए
ये हिंद का बगीचा गुलजार रह न जाए... 

देश की आजादी के लिए भी इन महिलाओं ने लिखे थे गीत
हिंदुस्तान आजाद हो गया, लेकिन इसके बाद कभी विद्याधरी बाई का ये गीत पढ़ा. नहीं पढ़ा होगा. क्योंकि हमनें साहित्य में उसे जगह ही नहीं दी. 70 - 80 साल पहले एक मलका जान थी, वो हीरामंडी वाली मलका जान नहीं. वो बिलकुल फेक कैरेक्टर थीं. तवायफें पढ़ी लिखी होती थीं. वो फारसी में शायरी लिखती थीं. मलका जान वाजिद अली शाह के दरबार में कोलकाता में थीं और गौहर जान की मां थीं. उन्होंने अपना कविताओं का संग्रह लिखा दीवान-ए- मलका जान. हमनें कभी इसे नहीं पढ़ा. 

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कई तवायफों के कविता और शायरी का मौजूद है संग्रह
इससे और 100 साल पीछे चले जाईए. चंदा बीबी. महालका बाई चंदा हैदराबाद से थीं, निजाम के दरबार में. दीवान-ए-महालका उन्होंने लिखा. लेकिन, क्या किसी साहित्यिक कार्यक्रमों में इनकी बातें होती है, नहीं. क्योंकि हमनें इन्हें इतिहास में जगह ही नहीं दी. चंदा बीबी ने जितनी जितनी भी शायरी लिखी थी, हजरत अली के लिए थी. वो पोलो खेलना जानती थी, जैवलिन करती थी, वो निजाम के साथ तीन युद्धों में भी गई थी. 

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