'साहित्य तक: बुक कैफे टॉप 10' पुस्तकों की शृंखला जारी है. वर्ष 2023 में कुल 17 श्रेणियों की टॉप 10 पुस्तकों में 'इतिहास-गल्प' श्रेणी की टॉप 10 पुस्तकों में पुरुषोत्तम अग्रवाल, नमित अरोरा, नमिता गोखले, वीके सिंह, कूमी कपूर, अली अनवर और कृष्ण कल्पित के अलावा और किनकी पुस्तकें शामिल हैं.
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शब्द की दुनिया समृद्ध हो और बची रहे पुस्तक-संस्कृति इसके लिए इंडिया टुडे समूह के साहित्य, कला, संस्कृति और संगीत के प्रति समर्पित डिजिटल चैनल 'साहित्य तक' ने पुस्तक-चर्चा पर आधारित एक खास कार्यक्रम 'बुक कैफे' की शुरुआत वर्ष 2021 में की थी... आरंभ में सप्ताह में एक साथ पांच पुस्तकों की चर्चा से शुरू यह कार्यक्रम आज अपने वृहद स्वरूप में सर्वप्रिय है.
साहित्य तक के 'बुक कैफे' में इस समय पुस्तकों पर आधारित कई कार्यक्रम प्रसारित हो रहे हैं. इन कार्यक्रमों में 'एक दिन, एक किताब' के तहत हर दिन एक पुस्तक की चर्चा, 'शब्द-रथी' कार्यक्रम में किसी लेखक से उनकी सद्य: प्रकाशित कृति पर बातचीत और 'बातें-मुलाकातें' कार्यक्रम में किसी वरिष्ठ रचनाकार से उनके जीवनकर्म पर संवाद होता है. इनके अतिरिक्त 'आज की कविता' के तहत कविता पाठ का विशेष कार्यक्रम भी बेहद लोकप्रिय है.
भारतीय मीडिया जगत में जब 'पुस्तक' चर्चाओं के लिए जगह छीजती जा रही थी, तब 'साहित्य तक' पर हर शाम 4 बजे 'बुक कैफे' में प्रसारित कार्यक्रमों की लोकप्रियता बढ़ती ही गई. हमारे इस कार्यक्रम को प्रकाशकों, रचनाकारों और पाठकों की बेपनाह मुहब्बत मिली. अपने दर्शक, श्रोताओं के अतिशय प्रेम के बीच जब पुस्तकों की आमद लगातार बढ़ने लगी, तो यह कोशिश की गई कि कोई भी पुस्तक; आम पाठकों, प्रतिबद्ध पुस्तक-प्रेमियों की नजर से छूट न जाए. आप सभी तक 'बुक कैफे' को प्राप्त पुस्तकों की जानकारी सही समय से पहुंच सके इसके लिए सप्ताह में दो दिन- हर शनिवार और रविवार को - सुबह 10 बजे 'किताबें मिलीं' कार्यक्रम भी शुरू कर दिया गया. यह कार्यक्रम 'नई किताबें' के नाम से अगले वर्ष भी जारी रहेगा.
'साहित्य तक' ने वर्ष 2021 में ही पूरे वर्ष की चर्चित पुस्तकों में से उम्दा पुस्तकों के लिए 'बुक कैफे टॉप 10' की शृंखला शुरू की थी, ताकि आप सब श्रेष्ठ पुस्तकों के बारे में न केवल जानकारी पा सकें, बल्कि अपनी पसंद और आवश्यकतानुसार विधा और विषय विशेष की पुस्तकें चुन सकें. तब से हर वर्ष के आखिरी में 'बुक कैफे टॉप 10' की यह सूची जारी होती है. 'साहित्य तक बुक कैफे टॉप 10' की यह शृंखला अपने आपमें अनूठी है, और इसे भारतीय साहित्य जगत, प्रकाशन उद्योग और पाठकों के बीच खूब आदर प्राप्त है.
'साहित्य तक के 'बुक कैफे' की शुरुआत के समय ही इसके संचालकों ने यह कहा था कि एक ही जगह बाजार में आई नई पुस्तकों की जानकारी मिल जाए, तो पुस्तकों के शौकीनों के लिए इससे लाजवाब बात क्या हो सकती है? अगर आपको भी है किताबें पढ़ने का शौक, और उनके बारे में है जानने की चाहत, तो आपके लिए सबसे अच्छी जगह है साहित्य तक का 'बुक कैफे'.
हमें खुशी है कि हमारे इस अभियान में प्रकाशकों, लेखकों, पाठकों, पुस्तक प्रेमियों का बेपनाह प्यार मिला. हमने पुस्तक चर्चा के कार्यक्रम को 'एक दिन, एक किताब' के तहत दैनिक उत्सव में बदल दिया है. वर्ष 2021 में 'साहित्य तक- बुक कैफे टॉप 10' की शृंखला में केवल अनुवाद, कथेतर, कहानी, उपन्यास, कविता श्रेणी की टॉप 10 पुस्तकें चुनी गई थीं. वर्ष 2022 में लेखकों, प्रकाशकों और पुस्तक प्रेमियों के अनुरोध पर कुल 17 श्रेणियों में टॉप 10 पुस्तकें चुनी गईं. साहित्य तक ने इन पुस्तकों को कभी क्रमानुसार कोई रैंकिंग करार नहीं दिया, बल्कि हर चुनी पुस्तक को एक समान टॉप 10 का हिस्सा माना. यह पूरे वर्ष भर पुस्तकों के प्रति हमारी अटूट प्रतिबद्धता और श्रमसाध्य समर्पण का द्योतक है. फिर भी हम अपनी सीमाओं से भिज्ञ हैं. संभव है कुछ बेहतरीन पुस्तकें हम तक पहुंची ही न हों, संभव है कुछ श्रेणियों में कई बेहतरीन पुस्तकें बहुलता के चलते रह गई हों. संभव है कुछ पुस्तकें समयावधि के चलते चर्चा से वंचित रह गई हों. पर इतना अवश्य है कि 'बुक कैफे' में शामिल ये पुस्तकें अपनी विधा की चुनी हुई 'साहित्य तक बुक कैफे टॉप 10' पुस्तकें अवश्य हैं.
पुस्तक संस्कृति को बढ़ावा देने की 'साहित्य तक' की कोशिशों को समर्थन, सहयोग और प्यार देने के लिए आप सभी का आभार.
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साहित्य तक 'बुक कैफे-टॉप 10' वर्ष 2023 की 'इतिहास-गल्प' श्रेणी की श्रेष्ठ पुस्तकें हैं-
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* 'कबीर ग्रंथावली: परिमार्जित पाठ' - सम्पादक: श्यामसुंदर दास, भूमिका एवं परिमार्जन- पुरुषोत्तम अग्रवाल
- कबीर-पंथियों में जो स्थान 'बीजक' का है, अकादमिक हलक़ों में वही स्थान श्यामसुन्दर दास द्वारा सम्पादित 'कबीर-ग्रंथावली' का है. तमाम विवादों और असहमतियों के बावजूद आज भी कबीर के प्रामाणिक पाठ के लिए अध्येता 'ग्रंथावली' का ही सहारा लेते हैं. ऐसे में अगर यह पता चले कि 'ग्रंथावली' में संकलित कबीर भले ही अन्य संग्रहों के मुक़ाबले ज़्यादा पूरे हों, लेकिन जो पाठ इस पुस्तक में प्रकाशित है, उसमें अनेक ऐसी भूलें हैं, जो अर्थ का अनर्थ ही नहीं कर रहीं, बल्कि कवि के मंतव्य को ही उलट दे रही हैं, तो क्या हो... आश्चर्य नहीं कि लगभग एक सदी से अनेक संस्करणों में व्यवहृत 'ग्रंथावली' के इस पक्ष पर प्रोफेसर पुरुषोत्तम अग्रवाल की निगाह रुकी और उन्होंने अपने विशद अध्ययन और कबीर के प्रति अपने असाधारण प्रेम के चलते इसके परिमार्जन का बीड़ा उठाया. यह संस्करण उसी परिमार्जित एवं शुद्धतम पाठ की प्रस्तुति है जिसका आरम्भ उनकी एक सुदीर्घ भूमिका से होता है. इस भूमिका में प्रो अग्रवाल ने पाठ-परिमार्जन की पूरी श्रम-साध्य प्रक्रिया पर तो प्रकाश डाला ही है, कबीर पर अपने अब तक के अध्ययन से प्राप्त अद्यतन धारणाओं को भी सूत्र रूप में दे दिया है.
- प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन
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* 'इंडियंस: एक सभ्यता की यात्रा' - नमित अरोरा
- भारतीय सभ्यता- एक विचार, एक हकीकत और एक पहेली है. लेखक इस पुस्तक के साथ पाठकों को इतिहास की हज़ारों साल की अविस्मरणीय यात्रा पर ले जाते हैं. इस दौरान वे भारतीयों के सामाजिक और सांस्कृतिक पड़ावों का ब्योरा देने के साथ ही उनकी राजनीतिक उथल-पुथल और प्रतिद्वन्दिता, उनके रीति-रिवाज, व्यवसाय और पर्व-त्योहारों पर गौर करते हैं. इस क्रम में अरोरा छह ऐतिहासिक स्थलों की यात्रा करते हैं- हड़प्पा कालीन धोलावीरा, नागार्जुनकोंडा में इक्ष्वाकुओं की राजधानी, बौद्धों का ज्ञान केंद्र नालंदा, रहस्यपूर्ण खजुराहो, हम्पी में विजयनगर साम्राज्य की राजधानी और ऐतिहासिक और प्राचीन शहर बनारस. सुस्पष्ट विश्लेषण, स्थानीय कहानियों और चित्रों के साथ ही वे भारत आने वाले मशहूर यात्रियों मसलन मेगस्थनीज़, ह्वेनसांग, अलबरूनी, मार्को पोलो और बर्नियर के विवरण के माध्यम से इसे जीवंत बनाते हैं. ये वे यात्री हैं, जिन्होंने हमारे देश के बारे में आश्चर्यजनक बातें कहीं. लेखक ऐसे समय में हमारे पूर्वजों के विचारों, विश्वासों और मूल्यों की पड़ताल करते हैं- जिनमें कुछ अभी भी आधुनिक भारत को आकार दे रहे हैं, जबकि अन्य खो गए हैं. एक ऐसी मौलिक, शोधपूर्ण और विचारोत्तेजक पुस्तक, जो हमारी नसों में प्रवाहित हो रहे इतिहास पर प्रकाश डालती है.
- प्रकाशक: पेंगुइन स्वदेश
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* 'महाभारत: नई पीढ़ी के लिए' - नमिता गोखले
- प्राचीन भारत भूमि को भारतवर्ष के नाम से जाना जाता था. उस समय दो परिवारों के बीच एक झगड़ा शुरू हुआ, जो धीरे-धीरे रक्तपात में बदल गया. कुरु वंश के चचेरे भाइयों के बीच लड़ा गया यह भयानक युद्ध अब भारत की पौराणिक कथाओं और इतिहास का हिस्सा बन चुका है. तब से यह कथा लाखों बार बताई और दोहराई गई है. यह हार और जीत के बारे में तो है ही, साथ ही विनयशीलता और साहस के बारे में भी है. यह कथा गंगा नदी और उसके उद्गम स्रोत हिमालय से निकली सभी कथाओं के नमन से शुरू होती है. यह दुनिया के इतिहास में अब तक सुनाई गई सबसे महान गाथाओं में से एक है. लेखिका ने भारत के सबसे समृद्ध साहित्यिक खज़ाने में से एक- मनुष्यों और देवताओं की इस कालातीत कहानी को- नई पीढ़ी के लिए साफ-सुथरे ढंग से फिर से प्रस्तुत किया है, ताकि उसमें छिपी छल, षड्यंत्र, आशा - निराशा, महिमा और वीरता की ये कहानियां उन्हें फिर से प्रेरित कर सकें. चित्रकार और एनिमेटर शुद्धसत्व बसु द्वारा विचारशील चित्रों की शानदार कड़ी और मनोहारी दृश्य इस पुस्तक को और भी उपयोगी बनाते हैं. यह पुस्तक The Puffin Mahabharata के नाम से पहले अंग्रेजी में प्रकाशित हो चुकी है.
- प्रकाशक: पेंगुइन स्वदेश
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* 'भारत में ट्रेड यूनियन आंदोलन के सौ वर्ष' - वीके सिंह
- यह पुस्तक भारत में ट्रेड यूनियन आंदोलन के पिछले सौ वर्षों की यात्रा को दर्शाती है. 1920 के दशक में ब्रिटिश साम्यवादियों ने मजदूर संघों के गठन के बाद अधिकांश महासंघों पर नियंत्रण पा लिया. हालांकि कई विरोधी दल बाद में इससे अलग हो गए. द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान साम्यवादियों का इन संगठनों पर पूर्ण नियंत्रण हो गया, लेकिन सोवियत संघ के युद्ध में शामिल न होने के बाद ब्रिटेन के युद्ध प्रयासों को समर्थन देने के कारण इनकी लोकप्रियता कुछ कम हो गई. बाद में सुधारवादी और क्रांति समर्थक आपस में बंट गए. श्रम और पूंजी के केंद्रीकरण के बीच हड़ताल, उत्पादन, तकनीक और श्रमिक कानूनों के बीच ट्रेड यूनियन आंदोलन की यात्रा देश के उद्यम, श्रम और उनके संयोजन की परख भी करती है. यह पुस्तक देश में ट्रेड यूनियन आंदोलन की सकारात्मकता को सहेजते-समेटते जहां उससे जुड़ी जानकारी से समृद्ध करती है, वहीं उसकी भूलों-असफलताओं और नकारात्मकता से सबक लेने को भी प्ररित करती है, जिससे आज की चुनौती का मुकाबला किया जा सके और नई राह तलाशी जा सके.
- प्रकाशक: प्रलेक प्रकाशन
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* 'पारसी समाज का रोचक इतिहास' - कूमी कपूर
- पारसी समुदाय आठवीं और दसवीं शताब्दी के बीच मध्य एशिया से भारत आया था, और जो यहां बस गए, उन्होंने इसे ही अपना देश मान लिया, और भारत के विकास में असाधारण योगदान दिया. पिछली शताब्दी में भारतीय इतिहास का हर क्षेत्र इस समुदाय के योगदान से भरा हुआ है. चाहे वह चीन के साथ व्यापार पर हावी होने से लेकर बॉम्बे का पर्याय बनने की कहानी हो या परमाणु भौतिकी और स्वतंत्रता आंदोलन, विज्ञान हो या सेना, अभिनय हो या रेस्त्रां, यहां तक कि रॉक एंड रोल भी इसमें शामिल है. भारतीय इतिहास को समृद्ध करने वाली इन हस्तियों में दादाभाई नौरोज़ी से लेकर, दिनशॉ पेटिट, होमी भाभा, सैम मानेकशॉ, जमशेदजी टाटा, अर्देशिर गोदरेज, साइरस पूनावाला, ज़ुबिन मेहता, फारोख़ बलसारा उर्फ फ्रेडी मर्करी, नुस्ली वाडिया, साइरस मिस्त्री तक शामिल हैं. फिर भी देश में पारसियों की तेजी से घट रही है. भारत में इस समुदाय के लगभग 50,000 सदस्य ही बचे हैं. लेखिका ने व्यक्तियों, कहानियों, उपलब्धियों के माध्यम से इस छोटे लेकिन असाधारण अल्पसंख्यक समुदाय के आकर्षक, सुलभ और अंतरंग इतिहास के साथ ही उनकी निरंतर सफलता का उल्लेख किया है. यह पुस्तक अंग्रेजी में लिखी 'Tatas, Fredie Mercury and Other Bawas' का हिंदी अनुवाद है. अनुवादक - मनीष शर्मा.
- प्रकाशक: मंजुल पब्लिशिंग हाउस
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* 'विजयनगर' - नवीन पंत
- भारतीय इतिहास में अहम स्थान रखने वाला 'विजयनगर' एक ऐसा साम्राज्य है, जिसने तुर्क आक्रांताओं से भी भरपूर लोहा लिया. यह पुस्तक विजयनगर की भौगोलिक, आध्यात्मिक, ऐतिहासिक, व्यावसायिक, सामाजिक और आर्थिक पक्षों पर विस्तार से बात करती है और बताती है कि तुर्कों की लूटपाट और तोड़फोड़ के बावजूद यह नगर कैसे एक लंबे कालखंड तक न केवल अनुपम ऐश्वर्य का केंद्र रहा, बल्कि आश्चर्यजनक रूप से समृद्ध रहा. इसकी स्थापना हरिहर एवं बुक्का नामक दो भाइयों ने 1336 में की थी. लेखक बताता है कि जिस समय तुगलक और मुगल उत्तर भारत में पैर जमाए हुए थे, उसी समय दक्षिण में विजयनगर नामक यह भारतीय साम्राज्य बेहद समृद्ध, उन्नत और अपने चरमोत्कर्ष पर था. इसकी समृद्धि दुनिया भर के यात्रियों, व्यापारियों और शासकों को चौंकाती थी. आखिर ऐसा क्या हुआ, वे कौन से आक्रमण थे, जिसने इस साम्राज्य को खंडहरों में बदल दिया और आधुनिक काल में पुरातत्ववेत्ताओं ने जब इसकी खुदाई की, तो जो ऐतिहासिक अवशेष पाए, उन्हें देख पूरी दुनिया दंग रह गई. एक शोधपरक ऐतिहासिक पुस्तक जिसमें दक्षिण भारत के इस गौरवशाली साम्राज्य का पूरा अतीत और वर्तमान शामिल है.
- प्रकाशक- सर्वभाषा प्रकाशन
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* 'भवभूति कथा' - महेश कटारे
यह पुस्तक आठवीं सदी में जन्मे नाटककार, कवि भवभूति के जीवन पर आधारित है, जिसकी मुख्य कथाधारा ब्राह्मण होने के बावजूद नाट्य-कर्म में उनकी प्रवृत्ति और उसके चलते अपने समाज में उनके संघर्ष के साथ-साथ चलती है. भवभूति कश्यपगोत्र तथा कृष्ण-यजुर्वेद के तैत्तिरीय शाखा के अनुयायी एवं ब्रम्हवादी थे. उदुम्बर उनका उपनाम था. उन्हें 'श्रीकंठ' की उपाधि प्राप्त थी; जिसका अर्थ था कि 'सरस्वती उनके कंठ में निवास करती हैं'. संस्कृत में लिखे उनके नाटकों को कालिदास की रचनाओं के बराबर माना जाता है. 'महावीरचरित', 'मालतीमाधव' और 'उत्तररामचरित' जैसी कृतियों से उन्होंने भारतीय साहित्य को समृद्ध किया. औपन्यासिक शैली में लिखी यह कृति भारत के सांस्कृतिक इतिहास के उल्लेखनीय पड़ावों, तत्कालीन तथ्यों के साथ ही आज के प्रश्नों पर भी ध्यान देती है. देश, काल और पात्रानुकूल भाषा तथा जीवन-व्यवहार का विस्तृत विवरण जहां अतीत को मूर्तिमान कर देता है, वहीं मानव-समाज और व्यवस्था के लिए हमेशा प्रासंगिक रहने वाले मुद्दे भी सामने रखता है.
- प्रकाशक: राजकमल पेपरबैक्स
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* 'सम्पूर्ण दलित आन्दोलन: पसमान्दा तसव्वुर' - अली अनवर
-इस पुस्तक के माध्यम से लेखक ने देश के एक बड़े तबके की उस पीड़ा को आवाज दी है, जिसके नाम पर सियासत तो खूब होती है, पर जिनके हालात बदलने के लिए कोई कुछ ठोस नहीं करता. लेखक कहता है कि गुलामी भले ही विदा हो गई हो, जाति मुसलमानों में अब भी क़ायम है. 1901 में जनगणना अधीक्षक ने बंगाल के मुसलमानों के बारे में यह रोचक तथ्य दर्ज किया था कि- मुसलमानों का चार वर्गों - शेख़़, सैयद, मुग़ल और पठान- में परंपरागत विभाजन इस बंगाल में प्रायः लागू नहीं है. यहां मुसलमान दो भागों में विभक्त हैं- अशराफ़ अथवा शरफ़; तथा अज़लाफ़. अशराफ़ से तात्पर्य है 'कुलीन'- जिसमें विदेशियों के वंशज तथा ऊंची जाति के धर्मांतरित हिंदू शामिल हैं. अज़लाफ़ में व्यावसायिक वर्ग और निचली जातियों के धर्मांतरित शेष अन्य मुसलमान अर्थात नीच अथवा निकृष्ट व्यक्ति माने जाते हैं. उन्हें कमीना अथवा इतर कमीना या रासिल, जो 'रिज़ाल' का भ्रष्ट रूप है, कहा जाता है. कुछ स्थानों पर एक तीसरा वर्ग 'अरज़ाल' भी है, जिसमें आनेवाले व्यक्ति सबसे नीच समझे जाते हैं. उनके साथ कोई भी अन्य मुसलमान मिलेगा-जुलेगा नहीं और न उन्हें मस्जिद और सार्वजनिक क़ब्रिस्तानों में प्रवेश करने दिया जाता है.... मुसलमानों में इन बुराइयों का होना दु:खद है, किन्तु उससे भी दु:खद तथ्य यह है कि भारतीय मुसलमानों में इन बुराइयों के उन्मूलन के लिए, समाज-सुधार हेतु कोई संगठित आन्दोलन नहीं उभरा... दूसरी ओर, मुसलमान इसे बुराई मानते ही नहीं, इसलिए वे उनके निवारण का प्रयास नहीं करते और अपनी मौजूदा प्रथाओं में किसी भी परिवर्तन का विरोध करते हैं. पुस्तक बुनियादी अधिकारों के लिए जूझते एक बड़े वर्ग की विसंगतियों, उसकी अनदेखी, उसे लेकर चल रही सियासत की मार्मिक दास्तां बयां करती है.
- प्रकाशक: राजकमल पेपरबैक्स
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* 'आदिवासीः इतिहास और संस्कृति' - अनुराधा सिंह
यह पुस्तक आदिवासी इतिहास और संस्कृति को समझने के लिए महत्त्वपूर्ण है. आदिवासी समाज में इतिहास और संस्कृति का विकास साहित्य व अन्य कला-माध्यमों के समान दूसरी मुख्य धाराओं से पहले हो चुका था परन्तु इनके साहित्य सृजन की परम्परा मूल रूप से मौखिक रही है. ठेठ जनभाषा में होने और सत्ता प्रतिष्ठानों से इनकी दूरी की वजह से यह इतिहास और साहित्य अपने समाज की तरह ही उपेक्षा का शिकार रहा है. आज भी सैकड़ों देशज जनभाषाओं में आदिवासी इतिहास रचा जा रहा है, जिसमें से अधिकांश से हमारा व हमारे इतिहास-लेखन का संवाद शेष है. वर्तमान समय में इतिहास-लेखन की अधुनातन परम्पराओं में आदिवासी इतिहास-लेखन समय व काल के सन्दर्भों में सर्वाधिक प्रासंगिक व महत्त्वपूर्ण लेखकीय आयाम है. वस्तुगत रूप से आदिवासी इतिहास-लेखन अब तक के सरकारी-सर्वेक्षणों, घटना-वृत्तों, व्यक्तिगत-विवरणों के आस-पास टिका रहा है. आदिवासी इतिहास और संस्कृति पर आधारित इस संग्रह में नवीन सारस्वत, प्रभात रंजन, अमरेंद्र कुमार ठाकुर, प्रियंका कुमारी एवं रोहित कुमार, शुभनीत कौशिक, वर्षा रानी, प्रभाकर सिंह, पंकज कुमार सिंह, गोपाल जी सिंह, सीमा तिवारी, दीपक सिंह और संजीदा ख़ातुन के लेख शामिल हैं.
- प्रकाशक: वाणी प्रकाशन
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* 'जाली किताब' - कृष्ण कल्पित
- अपने ढंग ऐसा पहला और अकेला उपन्यास, जिसमें आलोचना भी है और आलोचना की आलोचना भी. हिंदी के इतिहास के साथ भारतीय इतिहास की छवियां, लोक और शास्त्र भी इसमें हैं. लेखक के अनुसार उपन्यास का कथानक किताब पर किताब पर किताब है. एक महाकाव्य लिखा गया 'पृथ्वीराज रासो'. कुलीन विद्वानों ने उसे नितान्त साहित्येतर कारणों से जाली कह दिया. 'रासो' की प्रतिष्ठा को जनमानस में अखंड रखने के लिए 'चंद छंद बरनन की महिमा' नामक ग्रंथ की रचना हुई, जिसे खड़ी बोली गद्य की प्रथम कृति भी कहा जाता है. पर विद्वज्जनों ने उसे भी जाली ठहरा दिया. इन्हीं दोनों पुस्तकों को, जो अपनी अन्तर्वस्तु, कल्पनाशील रचनात्मकता और शिल्प के चलते आज भी बची हुई हैं, उक्त आरोपों से बरी करने के लिए यह किताब लिखी गई है, जो इससे पहले कि पंडित कुछ बोलें, ख़ुद ही ख़ुद को जाली कह रही है. यह आलोचना होती, लेकिन उपन्यास हो गई. इसमें किताबें ही पात्र हैं और उन किताबों के पात्र भी, उनके लेखक, यहां तक इस किताब का लेखक ख़ुद भी इसका पात्र है... एक बेहतरीन गद्य, नई उपन्यास शैली और हिंदी साहित्येतिहास के कुछ अहम इलाक़ों की पुनर्यात्रा - जो पाठों, विधाओं और काल की सीमाओं का अतिक्रमण करती है.
- प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन
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वर्ष 2023 के 'साहित्य तक बुक कैफे टॉप 10' में शामिल सभी पुस्तक लेखकों, प्रकाशकों, अनुवादकों और प्रिय पाठकों को बधाई!