तो आंखों से अश्कों की बरसात होगीः शीन काफ़ निज़ाम जन्मदिन विशेष
उनका असली नाम शिव किशन बिस्सा है, पर जब वह शायरी लिखने लगे तो उर्दू में शीन काफ़ निज़ाम से इस कदर मशहूर हुए कि उनका असली नाम लोग भूल गए. निज़ाम साहब के ग़ज़ल संग्रह 'दश्त में दरिया' से ली गईं चुनिंदा गज़लें
उनका असली नाम शिव किशन बिस्सा है, पर जब वह शायरी लिखने लगे तो उर्दू में शीन काफ़ निज़ाम से इस कदर मशहूर हुए कि उनका असली नाम लोग भूल गए. निज़ाम साहब इस दौर के उन चुनिंदा शायरों में से हैं जो मंच पर होकर भी मंचीय हल्केपन से बचे रहे. राजस्थान के जोधपुर में 26 नवंबर, 1947 को जन्मे शीन काफ़ निज़ाम ख़ालिस हिंदुस्तानी तहज़ीब की नुमाइंदगी करते हैं.
उनके पास इस्लामी तौर तरीकों, धर्मग्रंथों, मिथकों का इतना गहरा अध्ययन है कि आप आसानी से उन्हें मौलवी या उलेमा मान सकते हैं। उनकी गज़लें जिस संवेदन संसार में हमें आमंत्रित करती हैं, वह हमारा जाना-पहचाना क्षेत्र हैं और उसमें वह बड़ी सहजता से प्रवेश करते हैं! नाद, लम्हों की सलीब, दश्त में दरिया, साया कोई लम्बा न था, सायों के साए में जैसे संग्रहों की अहमियत ऐसे भी समझिए कि उन्हें लेखन के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से भी नवाजा जा चुका है.
कहने की जरूरत नहीं कि शीन काफ़ निज़ाम की रचनाओं में जो देश-काल गूंजता है वह भी हमारा अपना सुपरिचित देश-काल है! उन्हें पढ़ते हुए हमें अपने को यह याद नहीं दिलाना पड़ता कि हम किसी सुन्दर मगर पराये बगीचे में झाँक रहे हैं! निज़ाम साहब के काव्य में एक और बात विशेष आकृष्ट करती है; वह है उसमें भावना और विचार का विलक्षण सामंजस्य ! निजाम दूर की कौड़ी लाने वाले या उड़ती चिड़िया के पर काटने वाले शायर नहीं हैं ! चमत्कारी बात उनकी अभीष्ट नहीं है.
आज उनके जन्मदिन पर साहित्य आजतक पर पढ़ें उनके ग़ज़ल संग्रह 'दश्त में दरिया' से ली गईं चुनिंदा गज़लें-
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मंज़िलें ख़्वाब और सफ़र अब तक मिट गया दश्त रहगुज़र अब तक
है कोई साथ हमसफ़र अब तक खौफ के साथ है ख़तर अब तक
आईने सैकड़ों मयस्सर हैं। खुद को पहचानने का डर अब तक
हो चले ज़र्द सब्ज़ साये भी बेख़बर को नहीं ख़बर तक
कितने दीवारो-दर से गुज़रा हूँ ज़हन में है मगर शजर अब तक
याद कर कर के जाने वालों को फोड़ते हैं किवाड़ सर अब तक
जाने किस को सदायें देता है बिन किवाड़ों का एक दर अब तक
शाख़ को एक बार छोड़ा था ढूँढता हूँ घना शजर अब तक
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वो गुनगुनाते रास्ते ख़्वाबों के क्या हुए वीरान क्यूँ हैं बस्तियाँ बाशिन्दे क्या हुए
वो जागती जबीनें कहाँ जा के सो गईं वो बोलते बदन जो सिमटते थे क्या हुए
जिन से अँधेरी रातों में जल जाते थे दिये कितने हसीन लोग थे, क्या जाने, क्या हुए
ख़ामोश क्यूँ हो कोई तो बोलो जवाब दो बस्ती में चार चाँद से चेहरे थे, क्या हुए
हम से वो रतजगों की अदा कौन ले गया क्यूँ वो अलाव बुझ गए वो क़िस्से क्या हुए
पूरे थे अपने आप में आधे-अधूरे लोग जो सब्र की सलीब उठाते थे क्या हुए
मुम्किन है कट गए हों वो मौसम की धार से उन पर फुदकते शोख़ परिन्दे थे क्या हुए
किसने मिटा दिये हैं फ़सीलों के फ़ासले वाबस्ता जो थे हम से वो अफ़साने क्या हुए
खंभों पे ला के किस ने सितारे टिका दिए दालान पूछते हैं कि दीवाने क्या हुए
ऊँची इमारतें तो बड़ी शानदार है पर इस जगह तो रैन बसेरे थे क्या हुए
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तो आँखों से अश्कों की बरसात होगी अगर ज़िन्दगी से मुलाक़ात होगी
मैं बहती नदी हूँ तू वादी का सीना ख़ुदा जाने फिर कब मुलाक़ात होगी
मुसाफ़िर हैं लेकिन नहीं कोई मंज़िल जहाँ दिन ढलेगा वहीं रात होगी
सरे-शाम ही दिल घुमड़ने लगा है लगे है कि इस रात बरसात होगी
दरख़्तों के दामन से उलझेंगी किरनें कहीं दिन उगेगा कहीं रात होगी
जमीं जब ज़माने सभी खा चुकेगी परिन्दों की आवाज़ सौगात होगी
जहाँ साँस टूटेगी अपनी वहीं से नए इक सफ़र की शुरूआत होगी
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आज हर सम्त भागते हैं लोग गोया चौराहा हो गए हैं लोग
हर तरफ़ से मुड़े-तुड़े हैं लोग जाने कैसे टिके हुए हैं लोग
अपनी पहचान भीड़ में खो कर ख़ुद को कमरों में ढूँढ़ते हैं लोग
बंद रह रह के अपने कमरों में टेबिलों पर खुले खुले हैं लोग
ले के बारूद का बदन यारो! आग लेने निकल पड़े हैं लोग
हर तरफ़ इक धुआँ-सा उठता है आज कितने बुझे-बुझे हैं लोग
रेस्तॉरानों की शक्ल कह देगी और क्या सोचते रहे हैं लोग
रास्ते किस के पाँव से उलझे खूँटियों पर टँगे हुए हैं लोग. *** पुस्तक: दश्त में दरिया लेखक: शीन काफ़ निज़ाम विधा: ग़ज़ल/ नज़्म प्रकाशन: राजकमल प्रकाशन मूल्य: 150/- रुपए, पेपरबैक पृष्ठ संख्या: 144